अपने में अलग थे अतुल जी

 

अतुल जी (अतुल माहेश्वरी जी) से कुछ सा अपनापन हो गया था कि जब भी मन होता शाम को प्रेस की टैक्सी से मेरठ चले जाते। प्रेस की टैक्सी से आने –जाने में कुछ खर्च नहीं होता था। आठ बजे के आसपास मेरठ आफिस पंहुचते और टैक्सी निकलने तक रात लगभग दो बजे तक उनके  पास बैठते।   उनके पास बैठने से सीखने को बहुत कुछ मिलता।खबरों पर, राजनीति पर और   समाज पर उनके विचार पता चलते। मेरा ये रहा कि मैं उनके पास बैठकर बोलता कम था। सुनता ज्यादा था।

वे मेरा नाम न लेकर मुझे पंडित जी कहते थे।वे अपना परिचय  अतुल कहकर देते थे। कभी उन्होंने अतुल माहेश्वरी नही कहा।

मेरे एक साथी नजीबाबाद के पत्रकार मुकेश सिंहा ने अतुल जी को शिकायत की कि बिजनौर के अधिकारी बिजनौर के इंचार्ज अशोक मधुप को पहचानते हैं, मुझे  नहीं। अतुल ने मुझे मेरठ बुलाया। मुकेश सिंहा वहां आए हुए थे। अतुल जी ने मेरे सामने मुकेश को समझाया कि जो जहां काम करता है, उसे ही तो  जाना जाएगा।दूसरे को नहीं। नजीबाबाद के अधिकारी तुम्हे पहचानते होंगे,अशोक मधुप को नहीं।उन्होंने  एक किस्सा सुनाया। कहा कि यहां तनाव के कारण कुछ रास्ते बदं थे। एक रास्ते पर वह कार से जा रहे थे। कार भी खुद चला रहे थे। चौराहे पर एक दरोगा ने रोक लिया। रास्ता बंद है।कहां जा रहा हैकार पर प्रेस कैसे लिख रखा है। नाम बता। मैने बताया− मेरा नाम अतुल है।अमर उजाला में हूं।उसने  कहा− अमर उजाला में तो राही  (नीरज कांत राही तत्कालीन क्राइम रिर्पोटर ) है।मैने कहा हां। उसने कहा− उनसे बात करा। मैने नंबर लगाया।राही बाथरूम में थे। उनकी पत्नी ने फोन उठाया। बताया बाथरूम में हैं। दरोगा मेरी और राही जी की पत्नी की बात सुन रहा था। वह बोला− ठीक है। पता चल गया,तू राही को  जानता है। जा।

उन्होंने मुकेश  सिंहा को समझाया।इसमें मेरे बुरा मानने की क्या बात है जो फिल्ड में काम करेगा, वहीं तो जाना जाएगा। जो नही करेगा,उसे कौन जानेगा। मेरा फिल्ड से वास्ता है नहीं। राही  का है,वे क्राइम रिर्पोटर हैं, तो उन्हें पुलिस में सब जानते हैं।

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अतुल जी खबर में छेड़छाड़ करने के खिलाफ थे। वे कहते थे, जो  जैसा है,वैसा लिखो।वह कहते थे। कहीं एक कमरे में चार लोग कोई मीटिंग कर रहे हैं। या कोई हादसा होता है। हादसे के समय चार लोग हैं। ये समाचार अखबार में छपता  है। घटना या मीटिग की कार्रवाई से अलग कुछ छपता है। मौका या मीटिंग में मौजूद खबर पठते हैं। वे पढते हैं कि था कुछ और छपा कुछ ।वह इसकी मिलने वालों से चर्चा करेंगे। गलत बताएंगे। वह कहते थे। इसलिए कंफर्म करो। कार्यक्रम की विज्ञप्ति हो तो कार्यक्रम में मौजूद एक− दो से बात कर लो।तथ्य और मीटिंग में शामिल होने वालों के नाम  कंफर्म कर लो।कई बार विज्ञप्ति में उन लोगों के नाम भी भेज दिए जाते हैं, जो मीटिंग में होते थे। गलत नाम छपने से विज्ञप्ति भेजने वाले पर कोई असर नही पड़ता। अखबार की इमेज खराब होती है।

मई 1987 में मेरठ में दंगा हुआ। 21 मई 1987 को हाशिमपुरा और 22 मई 1987 में मेरठ में  मलयाना कांड हुआ। ये दोनों जगह मुस्लिम रहते  हैं । हाशिमपुरा में पीएसी ने मुस्लिम युवकों को एक जगह एकत्र किया और बस्ती से बाहर लेकर गोली  मार दी।  शव पास की नहर में फेंक दिए।  मलयाना में 22 की रात में सेना ने 50 मुस्लिम युवकों को एकत्र किया। पकड़कर उन्हें अपने साथ ले गई। बाद में पीएसी ने उन्हें दो अलग− अलग स्थान पर ले जाकर गोलीमार दी।

इस कांड  की सच्चाई अमर उजाला  ने जनता को बताई। उसने तथ्यों के साथ खबर की । रिपोर्टर को घटना स्थल तक दौड़ाया।एक्सक्लूसिव स्टोरी की। मेरठ प्रशासन और मेरठ के बहुसंख्यक नही चाहते थे कि ये दोनों कांड खुलें। अतुल जी ने मेरठ के कुछ सलाहकार ने भी इस पर चुप्पी साधने का कहा ।  आदरणीय अतुल जी ने किसी की परवाह नही की। अन्य अखबार इन कांड पर चुप्पी साध गए। अमर उजाला कि वजह से यह घटनांए राष्ट्रीय स्तर पर उठीं। जांच और कार्रवाई  हुई।

 इन खबरों के छपने का परिणाम यह हुआ कि अमर उजाला  से मेरठ के बहुसंख्यकों ने  दूरी बनाली। जिनकी  आवाज उठाई उन  अल्पसंख्यकों की आर्थिक हालत ठीक नही थी।  वह खरीद कर अखबार नहीं पढते थे। वह चाय की दुकान, पान की दुकान और नाई की दुकान पर आने वाले अखबार पढते थे। इन दुकान पर सस्ते अखबार होते हैं, अमर उजाला नहीं। इसी कारण अब तक मेरठ के बहुसंख्यक में अमर उजाला अपनी पकड़ नही बना सका।

अयोध्या का राम मंदिर आंदोलन चल रहा था। मुलायम सिंह मुख्यमंत्री थे।कार सेवा के दौरान पुलिस ने कार सेवकों पर गोली चलाई।इस कांड को में अखबारों ने मरने वालों को बढ़ा− चढ़ाकर छापा। किसी ने मरने वाले दो सो छापी तो किसी ने एक हजार। अमर उजाला ने छापा कि पुलिस की गोली से आठ *मरे।  हिंदुओं में इस कांड को लेकर आक्रोश था। वे मान  रहे  थे कि हजारों मरे हैं। मरने वालों की सबसे ज्यादा संख्या छापने वाले अखबार उनके सबसे ज्यादा प्रिय हुए। मृतकों की संख्या आठ छापने पर अमर उजाला को लोगों विशेषकर हिंदुओं ने गलत माना। इससे चार −पांच दिन में अमर उजाला की चार− पांच हजार प्रतियां कम हुईं पर अतुल जी  अपनी बात से पीछे नहीं हटे। इस घटना की जांच हुई । जांच में मरने वालों  संख्या , वही निकली जो अमर उजाला ने छापी थी।   

 

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बरेली संस्करण में बिजनौर के शायर और लेखक निश्तर खानाकही के व्यंग्य छपते थे। सप्ताह में उनका एक व्यंग्य छपता। बरेली के बाद मेरठ से अखबार छपना शुरू हुआ तो  उनके व्यंग्य छपने बंद हो गए।एक दिन मैंने निश्तर साहब से पूछा। वह बोले− कुछ व्यंग्य के पैसे नहीं आए। इसलिए नहीं भेजे।मैंने ये बात अतुल जी से कही।अतुल जी ने कहा कि सा था तो मुझे वे एक पोस्टकार्ड तो भेज सकते थे। बाद में पता चला कि क्षेत्र के  लेखक, पत्रकार और कवि ने अपनी जरूरत के बारे में पत्र लिख दिया तो उसके पास तक मदद पंहुच जाती थी।

अतुल जी की एक खासियत थी। वे पुराने साथियों को भूलते नहीं थे। जब मिलते बात चलती तो एक −एक कर सब पुराने परिचित को पूछते। उनके हालचाल जानते। चाहे वे अमर उजाला में अब हों या नहीं। एक −एक हॉकर, एजेंट तक के बारे में पूछते।उनसे मिलने की कोशिश भी करते।

अतुल जी ने कभी गलत काम को बढ़ावा  नहीं दिया।कभी गलत  रास्ता अपनाने का  सुझाव नही दिया।लगभग 25 साल पुरानी बात हो गई। अमर उजाला का आफिस बिजनौर में रानी की धर्मशाला में द्वितीय तल पर था। मेरठ आफिस में अतुल जी से बात चल रही थी। उन्होंने कहा कि आफिस की बिजली का कैसे करते हो।मैंने बताया− धर्मशाला की बिजली इस्तमाल करते हैं।उन्होंने इसे गलत बताया। कहा कि अपना कनेक्शन लो। हमारे आश्चर्य से देखने पर वह बोले – अपना बिजली नही होगी तो अखबार की सही लागत कैसे पता चलेगी अखबार के सही नफे या नुकसान की जानकारी कैसे होगी  फिर समझाते हुए बोले− जब मैं किसी को अपना दो रूपये का अखबार फ्री देने को तैयार नही हूं ,तो दूसरे का सामान फ्री क्यों लूं

अतुल  जी ने कभी अपने को अमर उजाला का  मालिक बताने और उसका रूआब डालने का प्रयास नहीं किया। मेरे जनपद के   नगीना शहर में इनके मामा जी होते थे। इन्होंने कभी बताया नहीं। मुझे इस बात की जानकारी थी। उनका किरतपुर में पेट्रोल पंप था। मैं  जानकर प्रत्येक छह माह में पेट्रोल पंप के खिलाफ  खबर छाप देता था। अतुल जी के  मामा जी ने अतुल जी से शिकायत तो की होगी  पर अतुल जी ने मुझसे कभी नहीं कहा। लगभग 20 साल पुरानी बात होगी । मैं  दफ्तर में बैठा था। अतुल जी का फोन आया।पंडित जी हमारी मामी नगीना से चेयरमैनी का चुनाव लड़ रही हैं। मैं मामा जी को आपके पास भेज रहा हूं, मदद कर देना।अतुल जी सीधे भी आदेश कर सकते थे। नगीना से मामी चुनाव लड़ रही हैं। मदद करनी है। किंतु  उनका बड़प्पन था कि सीधे  नही कहा। उनके मामा जी मेरे से मिले । मदद करने का अनुरोध किया । वे अपने छोटे से छोटे कर्मचारी का सम्मान करते थे।   

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बिजनौर में दंगा चल रहा था। डीएम की प्रेस कांफ्रेस के लिए मैं और साथी कुलदीप सिंह दुपहर लगभग ढाई बजे साथ निकले। तीन बजे प्रेस कांफ्रेस पुलिस लाइन में थी। वहां से चार बजे के आसपास निकले। पांच बजे डाक लेकर टैक्सी मेरठ जाती थी।  शहर में कर्फ्यू लगा था। उसे शहर के बाहर हाईवे पर समाचार का पैकेट दिया।वहां से निकले डीएम की कोठी चले गए। डीएम से  बातचीत में सात बज गए। कर्फ्यू  पास हमारे पास था नही। रास्ते में फोर्स ने रोक लिया। कुछ देर बाद उधर से निकल रहे एक अधिकारी ने हमें निकलवाया। आठ बजे के आसपास घर पहुंचे। पत्नी निर्मल ने बताया −अतुल जी का फोन आया था। मैंने बता दिया – दो बजे से गए हैं, तब से पता नहीं हैं। उस समय मोबाइल नही होते थे। मैंने अतुल जी को फोन मिलाया।बात हुईं। उन्होंने कहा – पंडित जी खबर छूट जाएगी । कोई बात नहीं। अपना ध्यान रखो। मुझे तुम्हारी जान ज्यादा प्रिय है। अपने को खतरे में मत डालो।  

 

अशोक मधुप

 

 

 

*कृपयायह संख्या एकबार कंफर्म कर लें।

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