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मेरा सरकारी जन्मदिन

 सरकारी जन्म दिन सकूल के प्रमाण पत्र के हिसाब से आज मेरा जन्म दिन है। एक तरह से इसे सरकारी जन्मदिन भी कहा जा सकता है। सरकारी रिकार्ड में  होने के कारण सरकारी जन्म दिन ही होगा।  गुरूजन,मित्रों और शुभचिंतकों द्वारा बधाई  देने का सिलसिला जारी है । बच्चे मेरा जन्म दिन दो बार मनाते  हैं। आज के दिन और  मीठी ईद के दिन। हम तो उस पीढ़ी की पैदायश हैं। जब जन्म दिन न मनाया जाता था। न किसी को याद होता है। रोजमर्रा की कशमकश से जूझते कब जन्म दिन  निकल जाता, पता ही नहीं चलता था। स्कूल सर्टिफिकेट  में होने के कारण जन्म दिन १७ जुलाई हो गया ।  वैसे क्या है किसी को  पता नहींं? मां-पिता बुजुर्ग बताते थे कि मंै   मीठी ईद के दिन पैदा हुआ था। हमारे समय में बुजुर्ग ज्यादा पढ़े लिखे तो होते नहीं थे। छह सात साल की उम्र होने पर  बच्चे को पकड़कर स्कूल ले जाते। हेडमास्टर के बताने पर कह देते उम्र छह साल है। हेडमास्टर अपने हिसाब से जन्म तिथि लिख लेते। मेरा पहली में प्रवेश किस परिवार जन ने स्कूल जाकर कराया पता नहीं।  सर्टिफिकेट में उम्र  १७ जुला...

रात में साढ़े पांच घंटे गंगा में नौकायन

  अशोक मधुप बिजनौर,स्वामी  अच्युतानंद मिश्र और पीएसी उत्तर प्रदेश के द्वारा चलाए जा रहे निर्मल गंगा अविरल प्रवाह यात्रा के साथ सोमवार को गंंगा में बिताए आठ से ज्यादा घंटे किसी रोमांचक यात्रा से कम नहीं। रात के छह बजे से ११ बजे तक गंगा में घुंप अधेरे में नौकायन के महारथ  की बदौलत रात साढ़े ग्यारह बजे ं गढ़मुक्टेश्वर के गंगा घाट पर सकुशल  पंहुचना एक करिश्मा जैसा ही है। वह तो उस हालत में जब एक एक कर वोट के पेट्राल टैँक खाली होते जा रहे थे। इस यात्रा में हमारे एक साथी की तो तबियत बहुत ज्यादा खराब हो  गई  और उसे रास्ते के एक गंाव के एक परिवार में शरण लेनी पड़ी । बिजनौर गंगा  बैराज से साढ़े तीन बजे हमने जब यात्रा शुरू की तो हमने सोचा भी नहीं था कि  गंगा के बीच में घुप अंधेरे मेंं हमें कई घंटे ऐसे भी बिताने होंगे , जब पल पल मोटर वोट के पेट्राल के खत्म होने का भय लगा हो। एक जगह तो रास्ता भटकने पर हम गोल गोल घूमने लगे और सब वोट आमने सामने पानी में  फैल गई। मुझे याद आ गया महाभारत  सीरियल का  दृष्य।   इसमें भी गीता उपदेश के समय भी सा...

हाथघड़ी

  कभी हाथ घड़ी   की बड़ी महत्ता थी। हाथ घडी वाला   सम्मान से देखा जाता था। अब तो मोबाइल में घड़ी आ गई। माबाइल की घड़ी ने अलग से घड़ी   जरूरत ही खत्म कर दी। इसके बावजूद आज भी काफी व्यक्ति – महिलांए घड़ी बांधती हैं। महात्मा गांधी के समय में घड़ी प्रचलन में आ गई थी। पर वह हाथ में नही बंधती थी। जेब में रखी जाती थी।घड़ी की सुरक्षा के लिए उसमें चैन पड़ी होती। ये चैन घड़ी स्वामी की जेब के छेद मे बांध    जाती ।   ताकि गिर न पड़े। घड़ी के डायल पर सुरक्षा   कवर भी होता।   इसी को   हटाकर समय देखा जाता। धीरे – धीरे हाथ में बांधने वाली घड़ी प्रचलन में आ गईं।पर हमारी पढ़ाई के समय तक   सबकी घड़ी तक पंहुच नहीं हो सकी थी। मैं तो बहुत गरीब परिवार से रहा। इसलिए परीक्षा में किसी न किसी की घड़ी मांग कर काम चलाया जाता। मेरे चाचा राजेंद्र शर्मा की आर्थिक हालात हमसे काफी बेहतर थी। मैं परीक्षा काल में प्रायः उनकी घड़ी अपने पास रखता।           

जुगाड कैलास यात्रा

  एक जुगाड़ 2012 में हम कैलाश यात्रा कर गए। दो सीनियर सिटीजन के लिए ट्रैवल एजेंट एक शेरपा की व्यवस्था करता है ताकि वह उनकी देखरेख करें। हमारे साथ भी एक शेरपा यात्रा में था। कैलाश यात्रा में सबसे कठिन है , कैलाश की परिक्रमा करना । लगभग 45 किलोमीटर की   परिक्रमा तीन चरणों में तीन दिन में पूरी होती है। दूसरा और तीसरा चरण बहुत कष्ट होता है। दूसरे चरण में आठ 10 किलोमीटर के ट्रैक पर बर्फ ही बर्फ होता है। एक स्थान पर मेरी पत्नी को समस्या हुई। हमारे साथ चल रहे शेरपा ने अपनी कमर में बंधे   हवा भरने वाले तकिए में लगा पाइप मेरी पत्नी की नाक में लगा दिया।   । मेरे पूछने पर उसने बतलाया कि तकिए में वह जरूरत के लिए ऑक्सीजन लेकर चलते है। सिलेंडर लेकर चलना बहुत कठिन होता है। हम तकिए में ऑक्सीजन भर लेते हैं। ताकि यात्रा में श्रद्धालुओं को परेशानी होने पर इसका उपयोग करते हैं। एक सिलेंडर में कई सौ तकिए ऑक्सीजन से भरे जा सकते हैं।

नहटौर के पत्रकार असलम का संस्मरण

  दो दशक तक मुझे अमर उजाला नहटौर में संवाददाता के रूप में काम करने का मौका मिला।इसका सारा श्रेय अशोक मधुप जी   जिला प्रभारी को जाता है। उनके सानिध्य औ र छत्रछाया में रहकर पत्रकारिता के गुर सीखे औ र खबरों की दुनिया के कटु अनुभव को आत्मसात किया। खबरों के   संकलन औ र   लेखन में उनकी नसीहत सदैव मार्गदर्शक बनीं। परन्तु पत्रकार साथियों के साथ समय− समय पर   होने वाली शत्रुवत   हिंसक घटनांए सबको विचलित कर डालतीं। उक्त घटना ओ ं को ज्यादा दिनों तक महत्ता देना हमारे अखबार का ट्रेड भी नहीं था। इन विषम परिस्थितियों में मधुप   जी अपने आला अफसर से अपने   पसर्नल संबंध, सूझबूझ औ र अथक प्रयास से    कोई न कोई रास्ता   निकाल ही लेते।   इससे पत्रकार साथी का   मान सम्मान बच जाता। जिले के अफसर में मधुप जी का बेहद सम्मान औ र रूतबा था। अधिकारी उनके मुंह से निकले शब्दों का पूरा करने में गर्व महसूस करते थे। ऐ से अनेक मसलों का   लेखक स्वयं साक्षी रहा है। ऐ सा ही एक वाक्या अचानक मुझे   याद आ गया। बोर्ड परीक्षा ओ ं में नकल की खबर उस ज...

झालू में माकपा का धरना

झालू में माकपा का धरना मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का जब मैं सदस्य था। तो हमारी पार्टी के एक पदाधिकारी के चाचा जी का हल्दौर के थानाध्यक्ष बरन सिंह सिद्धू से किसी बात पर झगड़ा हो गया। बताया  गया के महानुभाव नशे में थाने चले गए थे । इसपर  सिद्धू साहब ने उन्हें डॉट दिया। बात पार्टी के  बड़े नेताके चाचा जी के अपमान की थी। सो पुलिस ज्यादती को लेकर पार्टी की ओर से झालू में  बरन सिंह सिद्धू को हटाने के लिए छतरी वाले कुएं के आगे  धरना शुरू कर दिया गया। बरनसिंह सिद्धू  की क्षेत्र और विभाग में बहुत अच्छी छवि थी। अपराधों  पर नियंत्रण लगाने के लिए वह विख्यात थे। उन्होंने कई एनकाउंटर में किए थे। उनके  समर्थन में झालू के क्रेशर मालिक करण सिंह राणा औ र  उनके साथी हमारे सामने  धरने पर बैठ गए। आमने −सामने धरना चला। मेरे चाचा राजेंद्र शर्मा मुझे बहुत प्यार करते थे वह मेरे कम्युनिस्ट पार्टी के जाने से नाराज थे। इसका कारण झालू के चेयरमैन कामरेड जफर  थे। ये मुझे बहुत बाद में पता चला कि  मेरे चाचा जी किसी कार्य से जफर के पास गए थे। जफर ने  ठीक...

अखबार का टाईटि

नहटौर जैन कालेज में पढ़ाने के दौरान वहां के प्रधानाचार्य के नजदीकी एक शिक्षक ने मुझे बहुत परेशान किया।वह चाहता था इंटर में पढ़ने वाले उसके लड़के को मैं   संस्कृत में   गाइड करूं।मैंने उनसे कहा कि मेरा पांचवा पीरियड खाली होता है।वे अपने बेटे को चौथा पीरियड   बीतने पर कालेज बुला लें। मैं   इंटरवल और पांचवे पीरियड में उसे गाइड कर दिया करूंगा। उन्होंने   कहा कि उनका बेटा कालेज में नही आएगा। मैंने कहा कि स्कूल के अवकाश के बाद मैं   कालेज के हिंदी प्रवक्ता सीपी शर्मा की बेटी को उनके घर पढ़ाता हूं। वहां अपने लड़के को भेज दिया करें।   उसने कहा कि वह वहां भी नही आएगा। ऐसे में मैंने असमर्थता जता दी।कहा कि मैं रोज झालू से आता जाता हूं।इसलिए उसे पढ़ाना मेरे लिए संभव नही है।   मेरे उत्तर से झल्लाकर उसने मुझे परेशान करना शुरू कर दिया।कभी कहता −अपने हेडक्वार्टर पर रहने का पता आफिस में लिखवाओ। कभी प्रिंसीपल से उल्टी −सीधी शिकायत करता। ज्यादा होने पर मैंने एक दिन कह दिया कि मैं   नहटौर रहना शुरू कर दूंगा , पर तेरे बेटे को नही पढ़ाऊंगा।   इसी दौरा...