Posts

हाथघड़ी

  कभी हाथ घड़ी   की बड़ी महत्ता थी। हाथ घडी वाला   सम्मान से देखा जाता था। अब तो मोबाइल में घड़ी आ गई। माबाइल की घड़ी ने अलग से घड़ी   जरूरत ही खत्म कर दी। इसके बावजूद आज भी काफी व्यक्ति – महिलांए घड़ी बांधती हैं। महात्मा गांधी के समय में घड़ी प्रचलन में आ गई थी। पर वह हाथ में नही बंधती थी। जेब में रखी जाती थी।घड़ी की सुरक्षा के लिए उसमें चैन पड़ी होती। ये चैन घड़ी स्वामी की जेब के छेद मे बांध    जाती ।   ताकि गिर न पड़े। घड़ी के डायल पर सुरक्षा   कवर भी होता।   इसी को   हटाकर समय देखा जाता। धीरे – धीरे हाथ में बांधने वाली घड़ी प्रचलन में आ गईं।पर हमारी पढ़ाई के समय तक   सबकी घड़ी तक पंहुच नहीं हो सकी थी। मैं तो बहुत गरीब परिवार से रहा। इसलिए परीक्षा में किसी न किसी की घड़ी मांग कर काम चलाया जाता। मेरे चाचा राजेंद्र शर्मा की आर्थिक हालात हमसे काफी बेहतर थी। मैं परीक्षा काल में प्रायः उनकी घड़ी अपने पास रखता।           

जुगाड कैलास यात्रा

  एक जुगाड़ 2012 में हम कैलाश यात्रा कर गए। दो सीनियर सिटीजन के लिए ट्रैवल एजेंट एक शेरपा की व्यवस्था करता है ताकि वह उनकी देखरेख करें। हमारे साथ भी एक शेरपा यात्रा में था। कैलाश यात्रा में सबसे कठिन है , कैलाश की परिक्रमा करना । लगभग 45 किलोमीटर की   परिक्रमा तीन चरणों में तीन दिन में पूरी होती है। दूसरा और तीसरा चरण बहुत कष्ट होता है। दूसरे चरण में आठ 10 किलोमीटर के ट्रैक पर बर्फ ही बर्फ होता है। एक स्थान पर मेरी पत्नी को समस्या हुई। हमारे साथ चल रहे शेरपा ने अपनी कमर में बंधे   हवा भरने वाले तकिए में लगा पाइप मेरी पत्नी की नाक में लगा दिया।   । मेरे पूछने पर उसने बतलाया कि तकिए में वह जरूरत के लिए ऑक्सीजन लेकर चलते है। सिलेंडर लेकर चलना बहुत कठिन होता है। हम तकिए में ऑक्सीजन भर लेते हैं। ताकि यात्रा में श्रद्धालुओं को परेशानी होने पर इसका उपयोग करते हैं। एक सिलेंडर में कई सौ तकिए ऑक्सीजन से भरे जा सकते हैं।

नहटौर के पत्रकार असलम का संस्मरण

  दो दशक तक मुझे अमर उजाला नहटौर में संवाददाता के रूप में काम करने का मौका मिला।इसका सारा श्रेय अशोक मधुप जी   जिला प्रभारी को जाता है। उनके सानिध्य औ र छत्रछाया में रहकर पत्रकारिता के गुर सीखे औ र खबरों की दुनिया के कटु अनुभव को आत्मसात किया। खबरों के   संकलन औ र   लेखन में उनकी नसीहत सदैव मार्गदर्शक बनीं। परन्तु पत्रकार साथियों के साथ समय− समय पर   होने वाली शत्रुवत   हिंसक घटनांए सबको विचलित कर डालतीं। उक्त घटना ओ ं को ज्यादा दिनों तक महत्ता देना हमारे अखबार का ट्रेड भी नहीं था। इन विषम परिस्थितियों में मधुप   जी अपने आला अफसर से अपने   पसर्नल संबंध, सूझबूझ औ र अथक प्रयास से    कोई न कोई रास्ता   निकाल ही लेते।   इससे पत्रकार साथी का   मान सम्मान बच जाता। जिले के अफसर में मधुप जी का बेहद सम्मान औ र रूतबा था। अधिकारी उनके मुंह से निकले शब्दों का पूरा करने में गर्व महसूस करते थे। ऐ से अनेक मसलों का   लेखक स्वयं साक्षी रहा है। ऐ सा ही एक वाक्या अचानक मुझे   याद आ गया। बोर्ड परीक्षा ओ ं में नकल की खबर उस ज...

झालू में माकपा का धरना

झालू में माकपा का धरना मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का जब मैं सदस्य था। तो हमारी पार्टी के एक पदाधिकारी के चाचा जी का हल्दौर के थानाध्यक्ष बरन सिंह सिद्धू से किसी बात पर झगड़ा हो गया। बताया  गया के महानुभाव नशे में थाने चले गए थे । इसपर  सिद्धू साहब ने उन्हें डॉट दिया। बात पार्टी के  बड़े नेताके चाचा जी के अपमान की थी। सो पुलिस ज्यादती को लेकर पार्टी की ओर से झालू में  बरन सिंह सिद्धू को हटाने के लिए छतरी वाले कुएं के आगे  धरना शुरू कर दिया गया। बरनसिंह सिद्धू  की क्षेत्र और विभाग में बहुत अच्छी छवि थी। अपराधों  पर नियंत्रण लगाने के लिए वह विख्यात थे। उन्होंने कई एनकाउंटर में किए थे। उनके  समर्थन में झालू के क्रेशर मालिक करण सिंह राणा औ र  उनके साथी हमारे सामने  धरने पर बैठ गए। आमने −सामने धरना चला। मेरे चाचा राजेंद्र शर्मा मुझे बहुत प्यार करते थे वह मेरे कम्युनिस्ट पार्टी के जाने से नाराज थे। इसका कारण झालू के चेयरमैन कामरेड जफर  थे। ये मुझे बहुत बाद में पता चला कि  मेरे चाचा जी किसी कार्य से जफर के पास गए थे। जफर ने  ठीक...

अखबार का टाईटि

नहटौर जैन कालेज में पढ़ाने के दौरान वहां के प्रधानाचार्य के नजदीकी एक शिक्षक ने मुझे बहुत परेशान किया।वह चाहता था इंटर में पढ़ने वाले उसके लड़के को मैं   संस्कृत में   गाइड करूं।मैंने उनसे कहा कि मेरा पांचवा पीरियड खाली होता है।वे अपने बेटे को चौथा पीरियड   बीतने पर कालेज बुला लें। मैं   इंटरवल और पांचवे पीरियड में उसे गाइड कर दिया करूंगा। उन्होंने   कहा कि उनका बेटा कालेज में नही आएगा। मैंने कहा कि स्कूल के अवकाश के बाद मैं   कालेज के हिंदी प्रवक्ता सीपी शर्मा की बेटी को उनके घर पढ़ाता हूं। वहां अपने लड़के को भेज दिया करें।   उसने कहा कि वह वहां भी नही आएगा। ऐसे में मैंने असमर्थता जता दी।कहा कि मैं रोज झालू से आता जाता हूं।इसलिए उसे पढ़ाना मेरे लिए संभव नही है।   मेरे उत्तर से झल्लाकर उसने मुझे परेशान करना शुरू कर दिया।कभी कहता −अपने हेडक्वार्टर पर रहने का पता आफिस में लिखवाओ। कभी प्रिंसीपल से उल्टी −सीधी शिकायत करता। ज्यादा होने पर मैंने एक दिन कह दिया कि मैं   नहटौर रहना शुरू कर दूंगा , पर तेरे बेटे को नही पढ़ाऊंगा।   इसी दौरा...

नार्मल के बीटीसी बनने का सफर

  नार्मल के बीटीसी बनने का सफर   जब मैने जूनियर हाई स्कूल यानी कक्षा आठ की परीक्षा जूनियर हाई स्कूल झालू से पास की तो मेरे बाबा ( ग्रांड फादर) ने मुझ से कहा था , जानार्मल की ट्रेनिंग कर ले। मास्टर बन जाएगा। पंडित केशव शरण शर्मा जी जिला परिषद के चैयरमैन है , तो तेरा चयन भी हो जाएगा। मैने उनकी बात मानी और नार्मल की ट्रेनिंग के होने वाले साक्षात्कार में गया। पंडिंत जी उस साक्षात्कार में बैठे किंतु मेरी उम्र कम होने के कारण मेरा चयन न हो सका और मै प्राइमरी स्कूल का मास्टर बनते बनते रह गया। पंडित जी रिश्ते के मेरे बाबा लगते थे , वे जिला पंचायत के च े यरमैन होते थे पर मेरा नार्मल की ट्रेनिंग में चयन न हो सका। हां एम. ए करने के बाद में मैने बीएड किया पर शिक्षण का व्यवसाय रास न आया और तीन साल बाद उसे अलविदा कह पत्रकार बन गया।   आज जिस बीटीसी की परीक्षा के लिए प्रवेश परीक्षा   हो रही है,   इतनी मारामारी मची हुई है , और बीटेक , एमबीए , एमसीए , पीएचडी डिगरीधारक तक इसे करने के लिए आवेदन कर रहे हैं , प्राय मैरिट भी सत्तर प्रतिशत से ज्यादा रही है। मेरी किशोर...

बिजनौर में बनाया प्रेस क्लब

वरिष्ठ   पत्रकार राजेंद्र पाल सिंह कश्यप ने प्रेस क्लब बनाया।   उनकी इच्छा थी कि बिजनौर मुख्यालय   पर प्रेस क्लब बने।उन्होंने इसका रजिस्ट्रेशन कराया।   मेरे से कहा कि इसे   बनाने के लिए काम करो। मैंने मन −मन में इसके लिए काम करने की तैयारी शुरू कर दी। बिजनौर के डीएम डीएस बैंस   हमारे बहुत नजदीक थे।वे मंडलायुक्त बनकर मुरादाबाद   आ गए। इसी दौरान यूनियन ने श्रमजीवी पत्रकार यूनियन का   बिजनौर में प्रशिक्षण   शिविर लगाने का   निर्णय लिया।इसके लिए   मुझे संयोजक बनाया गया।समस्या ये थी कि इसके लिए धन   कहां से आए। कभी   चंदा लिया नही था।फिर भी   इरादे बांध लिए तो काम शुरू हो   गया।हमने   तीन दिन में एक लाख इक्यावन हजार रूपये   एकत्र किए।सात से नौ   जनवरी 1994   तक तीन दिवसीय शिविर लगाना   तै   हुआ।डीएस बैंस को उदघाटन के लिए आमंत्रित किया।कार्यक्रम के उदघाटन के दौरान मैंने   डीएस बैंस से मांग की कि   बिजनौर में प्रेस क्लब के लिए भवन   दिलाएं।उन्होंने डीएम को आदेश कर दिए। ...