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Showing posts from September, 2024

नार्मल के बीटीसी बनने का सफर

  नार्मल के बीटीसी बनने का सफर   जब मैने जूनियर हाई स्कूल यानी कक्षा आठ की परीक्षा जूनियर हाई स्कूल झालू से पास की तो मेरे बाबा ( ग्रांड फादर) ने मुझ से कहा था , जानार्मल की ट्रेनिंग कर ले। मास्टर बन जाएगा। पंडित केशव शरण शर्मा जी जिला परिषद के चैयरमैन है , तो तेरा चयन भी हो जाएगा। मैने उनकी बात मानी और नार्मल की ट्रेनिंग के होने वाले साक्षात्कार में गया। पंडिंत जी उस साक्षात्कार में बैठे किंतु मेरी उम्र कम होने के कारण मेरा चयन न हो सका और मै प्राइमरी स्कूल का मास्टर बनते बनते रह गया। पंडित जी रिश्ते के मेरे बाबा लगते थे , वे जिला पंचायत के च े यरमैन होते थे पर मेरा नार्मल की ट्रेनिंग में चयन न हो सका। हां एम. ए करने के बाद में मैने बीएड किया पर शिक्षण का व्यवसाय रास न आया और तीन साल बाद उसे अलविदा कह पत्रकार बन गया।   आज जिस बीटीसी की परीक्षा के लिए प्रवेश परीक्षा   हो रही है,   इतनी मारामारी मची हुई है , और बीटेक , एमबीए , एमसीए , पीएचडी डिगरीधारक तक इसे करने के लिए आवेदन कर रहे हैं , प्राय मैरिट भी सत्तर प्रतिशत से ज्यादा रही है। मेरी किशोर...

बिजनौर में बनाया प्रेस क्लब

वरिष्ठ   पत्रकार राजेंद्र पाल सिंह कश्यप ने प्रेस क्लब बनाया।   उनकी इच्छा थी कि बिजनौर मुख्यालय   पर प्रेस क्लब बने।उन्होंने इसका रजिस्ट्रेशन कराया।   मेरे से कहा कि इसे   बनाने के लिए काम करो। मैंने मन −मन में इसके लिए काम करने की तैयारी शुरू कर दी। बिजनौर के डीएम डीएस बैंस   हमारे बहुत नजदीक थे।वे मंडलायुक्त बनकर मुरादाबाद   आ गए। इसी दौरान यूनियन ने श्रमजीवी पत्रकार यूनियन का   बिजनौर में प्रशिक्षण   शिविर लगाने का   निर्णय लिया।इसके लिए   मुझे संयोजक बनाया गया।समस्या ये थी कि इसके लिए धन   कहां से आए। कभी   चंदा लिया नही था।फिर भी   इरादे बांध लिए तो काम शुरू हो   गया।हमने   तीन दिन में एक लाख इक्यावन हजार रूपये   एकत्र किए।सात से नौ   जनवरी 1994   तक तीन दिवसीय शिविर लगाना   तै   हुआ।डीएस बैंस को उदघाटन के लिए आमंत्रित किया।कार्यक्रम के उदघाटन के दौरान मैंने   डीएस बैंस से मांग की कि   बिजनौर में प्रेस क्लब के लिए भवन   दिलाएं।उन्होंने डीएम को आदेश कर दिए। ...

सच के लिए दी कुर्बानी, किसी को मौत तो किसी को मिली जेल अमर उजाला के 25 वे स्थापना दिवस पर

  सच के लिए दी कुर्बानी ,  किसी को मौत तो किसी को मिली जेल हर मुश्किल वक्त की कसौटी पर खरा उतरा अमर उजाला ,  दफ्तर में आग लगी तब भी अखबार का प्रकाशन नहीं होने दिया प्रभावित   बिजनौर में बरेली से अमर उजाला आता था। बरेली की दूरी ज्यादा होने के कारण समाचार समय से नहीं जा पाते थे। सीधी फोन लाइन बरेली को नहीं थी। कभी मुरादाबाद को समाचार लिखाने पड़ते तो कभी लखनऊ को। एक-दो बार दिल्ली भी समाचार नोट कराने का मौका मिला। ऐसे में तय हुआ कि बिजनौर को सीधे टेलीपि्रंटर लाइन से जोड़ा जाए। इसके लिए कार्य भी प्रारंभ हो गया। एक दिन श्री राजुल माहेश्वरी जी का फोन आया कि टीपी लाइन बरेली से नहीं मेरठ से देंगे। वहां से नया एडीशन शुरू होने जा रहा है। मेरठ में कहां ,  क्या हो रहा है ?,  यह जानने की उत्सुकता थी तो मै और मेरे साथी कुलदीप सिंह एक दिन बस में बैठ मेरठ चले गए। मेरठ में वर्तमान आफिस की साइड में पुराना आफिस होता था। उसके हाल में एक मेज पर राजेंद्र त्रिपाठी बैठे मिले। राजेंद्र त्रिपाठी ने पत्रकारिता बिजनौर से ही शुरू की थी ,  इसलिए पुराना परिचय था। उन्होंने मेर...

उर्दू के जाने माने पत्रकार- लेखक शम्स कंवल

  धनाभाव से जूझते रहे पर टूटेे नहीं गगन के हिंदुस्तानी मुसलमान नंबर ने उन्हें मशहूर कर दिया फोटो अशोक मधुप उर्दू के जाने माने पत्रकार- लेखक    शम्स कंवल   1925  में बिजनौर के एक मुस्लिम जमींदार ख़ानदान में पैदा हुए । बचपन में सुंदर होने के कारण उनके दादा शम्सुद्दीन     को जमील कह कर बुलाते थे।  1945  में बिजनौर के गवर्मेंट हाई स्कूल से मैट्र‌िक पास किया। शम्स कवंल का स्कूल की किताबों से अधिक साहित्यिक पुस्तकों में    मन लगता था।  1945  में मुरादाबाद इंटर काॅलेज से इंटर तथा लखनऊ से  1951  ग्रेजुएट किया। अपना नाम शम्स कंवल रख लिया । इसी नाम से कोमी आवाज़ लखनऊ में फिल्म एडिटर के तौर पर नौकरी करने लगे। 1952  में उन्होंने लखनऊ से अपनी फ़िल्मी  15  दिवसीय पत्रिका  ‘  साज़ ‘  निकाली। क़रीब डेढ़ साल के बाद ये पत्रिका बंद हो गई।  1953  में दिल्ली आ गए और  ‘ फ़िल्मी दुनिया ‘  में    सहायक संपादक बने । 1954  में  ‘  रियासत ‘  साप्ताहिक ...