बिजनौर में बनाया प्रेस क्लब


वरिष्ठ  पत्रकार राजेंद्र पाल सिंह कश्यप ने प्रेस क्लब बनाया।  उनकी इच्छा थी कि बिजनौर मुख्यालय  पर प्रेस क्लब बने।उन्होंने इसका रजिस्ट्रेशन कराया।  मेरे से कहा कि इसे  बनाने के लिए काम करो। मैंने मन −मन में इसके लिए काम करने की तैयारी शुरू कर दी।

बिजनौर के डीएम डीएस बैंस  हमारे बहुत नजदीक थे।वे मंडलायुक्त बनकर मुरादाबाद  आ गए। इसी दौरान यूनियन ने श्रमजीवी पत्रकार यूनियन का  बिजनौर में प्रशिक्षण  शिविर लगाने का  निर्णय लिया।इसके लिए  मुझे संयोजक बनाया गया।समस्या ये थी कि इसके लिए धन  कहां से आए। कभी  चंदा लिया नही था।फिर भी  इरादे बांध लिए तो काम शुरू हो  गया।हमने  तीन दिन में एक लाख इक्यावन हजार रूपये  एकत्र किए।सात से नौ  जनवरी 1994  तक तीन दिवसीय शिविर लगाना  तै  हुआ।डीएस बैंस को उदघाटन के लिए आमंत्रित किया।कार्यक्रम के उदघाटन के दौरान मैंने  डीएस बैंस से मांग की कि  बिजनौर में प्रेस क्लब के लिए भवन  दिलाएं।उन्होंने डीएम को आदेश कर दिए।

टाउन हाल के  पर प्रथम तल पर नगर पालिका ने हमें दो कमरे आंवटित कर दिए।मैंने  प्रेस  क्लब् के लिए  एक मेज चार कुर्सी के अलावा  ज्यादा लोगों के बैठने के लिए दोनों साइड में शानदार सैटी बनवाईं। इन पर    बढिया  गद्दी लगवांई। दीवार पर बड़ा डिस्पले बोर्ड लगाया कि कौन −कौन किस −किस समय में प्रेस क्लब का अध्यक्ष  और सचिव रहा।दोनों कमरों में शानदार छत के पंखे लगवाए। बढ़िया  क्राकरी  मंगाकर रखी। पत्रकार सुरेंद्र गर्ग जी ने प्रेस क्लब के लिए शानदारअलमारी गिफ्ट की।

प्रेस  क्लब बना  तो दिया  किंतु  इसका अनुभव अच्छा नहीं रहा ।  तै  हुआ कि अब पत्रकार वार्ताएं प्रेस  क्लब में होंगी।पत्रकार वार्ता के लिए प्रेस क्लब बुक होने लगा। वार्ता के लिए नेतागण  आने लगे । मुझे  सबसे बड़ी परेशानी तब होती कि समय  से सूचना  देने के बाद भी पत्रकार नही होते। वार्ता  करने वाले महानुभाव समय से आकर बैठ जाते। कई बार तो  वार्ता के निर्धारित समय के आधा घंटे बांद तक भी  कोई  पत्रकार नही आता।  वार्ता करने वाला  और मैं  बैठे रहते।अफसोस ये होता कि जो मेरे अपने  मित्र थे,यूनियन के सक्रिय सदस्य थे,वह भी समय से नही आते थे।

कुछ पत्रकार साथी शाम को  चाबी लेकर प्रेस  क्लब का  ताला खोल लेते और शराब पीनी शुरू कर देते।बाद में ये हुआ कि यहीं स्टोब रख लिए गया।मुर्गा यहीं बनता  और देशी शराब पी जाती। शहर के काफी शराबी यहां  आने लगे। नगर पालिक से कह कर बरांडे के एक कोने में रेष्ट रूम बनवाया हुआ था,किंतु ये शराबी प्रेस  क्लब के कमरे से बाहर निकलते और छज्जे  पर खड़े  होकर पेशाब करने लगते।पेशाब नीचे   आने− जाने  वालों पर गिरता,  वे  आकर मेरे से शिकायत करते।

ये सब चल रहा था कि राजेंद्र  पाल सिहं कश्यप के बेटे पारेश कश्यप की कारगुजारी से मेरा  मन खट्टा  हो गया।उनके एक दोस्त के बेटे की टाउन हाल में शादी थी।उन्हें कमरों की जरूरत पड़ी।  पहले यह होता था कि जिसे  जरूरत होती वह मेरे आफिस से  चाबी ले जाता। प्रेस क्लब की चाबी मेरे आफिस पर ही रखीं रहतीं। पारेश कश्यप  ने  प्रेस  कलब के कमरों के ताले   तुड़वा  दिए।मुझे  बताया भी नही। मुझे  नगरपालिका के एक स्टाफ ने बताया कि  प्रेस  क्लब के कमरे  कई  दिन से खुले  हैं।पता करने पर सच्चाई  मालूम हुई।उस दिन से  मेरा मन खट्टा हो गया। मैने रूचि लेनी बंद कर दी।  पांच साल के लिए हमें नगरपालिका ने ये कमरे लीज पर दिए थे,मेरे रूचि न लेने पर नगर पालिका ने लीज खत्म कर कमरे अपने कब्जे में ले लिए।  

आज साथी ज्योति लाल  प्रेस  क्लब चला रहे हैं, किंतु मेरे बाद से न आज तक रजिस्ट्रेशन का रिनुवल हुआ, नही  कोई कार्यकारिणी बनी। बस वह होली पर एक कार्यक्रम करा लेतें हैं।

हालाकि पत्रकार स्थाई  समिति की बैठक में कई बार प्रेस क्लब के भवन बनाने   का मामला आया। तत्कालीन जिलाधिकारी एस के वर्मा न तो   सूचना कार्यालय के पर भवन बनाने की स्वीकृति दे दी। तै  हुआ कि विधायक निधि और सांसद निधि से सहयोग लेकर ये भवन बनाया जाएगा, किंतु उस मीटिंग के बाद बात आगे नही बढ़ी ।

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