जब सलूजा पर हुआ हमला ।उनपर ही दर्ज हुआ हत्या का मुकदमा
पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी -6
जब सलूजा पर हुआ हमला ।उनपर ही दर्ज हुआ हत्या का मुकदमा
11 मार्च 19 94 । बिजनौर सूचना आई कि धामपुर में अमर उजाला के पत्रकार महेंद्र सलूजा के खिलाफ धारा 302 में मुकदमा दर्ज हुआ है। कुछ लोगों से सलूजा को हमला कर घायल कर दिया है।
मैँ और वरिष्ठ साथी जनसत्ता संवाददाता ओपी गुप्ता जी टैक्सी कर धामपुर पंहुच गए। यहां के के शर्मा इंस्पैक्टर थे। के के शर्मा अलग तरह के पुलिस अधिकारी रहे। ऐसे अधिकारी जो बड़े - बड़े अधिकारी के दबाव के आगे भी नहीं झुके। वे दंगा रोकने के स्पेशलिस्ट थे। संभल दंगों के लिए मशहूर था। वे संभल में छह साल तैनात रहे। जबकि तीन साल से ज्यादा पुलिस अधिकारी का एक स्थान पर तैनाती का नियम नहीं था।
के के शर्मा हमारे बहुत नजदीक थे। सलूजा धामपुर थाने में ही मिले। डीएम अशोक कुमार चतुर्थ और कप्तान निरंजन लाल भी मौजूद थे।
पता लगा कि एक दलित युवक को कहीं से सांप मिल गया था। युवक नसेड़ी था।वह उससे खेल रहा था। जैतरा के पास तालाब में उसे एक और सांप मिल गया। वह उससे भी खेलने लगा । तालाब में मिला सांप जहरीला था। उसने एक दो जगह काट लिया । पर ध्यान नहीं दिया। सलूजा को पता चला । वे मौके पर गए। फोटो खींचे। इसी दौरान थाने के दरोगा रविंद्र कुमार भी दो सिपाही के साथ मौके पर आ गए।
उन्होंने समझाया। युवक की समझ में नहीं आया। काफी भीड़ एकत्र थी। सांप से खेलते युवक की मौत हो गई। युवक के परिजनों को लोगों ने चढ़ा दिया। यहां कि अखबार वाले फोटो खींचकर ले गए हैं । ये अखबार में छापेंगे। तो तुम फंस जाओंगे। महेंद्र सलूजा सरदार हैं। सरल हैं। दिन रात सड़क पर घूमने वाले कबीर परम्परा के पत्रकार।युवक के परिवार जनों से सलूजा को पकड़ लिया। उसे बुरी तरह मारा- पीटा। पकड़ कर थाने ले आए। सलूजा, दरोगा रविद्र सिंह थाने के दो सिपाही सहित कई लोगों के खिलाफ आई पीसी की धारा 147, 302, 323 के अंतर्गत मुकदमा लिखाया कि इन्होंने षडयंत्र कर उनके परिवार जन को मारा। वह सांप से खेल रहा था। तालाब में दूसरा जहरीला सांप दिखाई दिया। इन्होंने एक राय की। दरोगा रविंद्र कुमार ने सांप को लाठी से उठाया। युवक के गले में डाल दिया। कहा खेल । इससे खेल। ये सांप जहरीला था। इसके काटने से सांप से खेलने वाले की मौत हो गई।
प्रदेश में बसपा की सरकार थी। लगभग एक सप्ताह बाद मुख्यमंत्री मायावती जी को बिजनौर आना था। अतः दलित नेताओं ने पीड़ित परिवार को चढ़ा दिया। डटे रहना। इसकी पत्नी को सरकारी नौकरी भी मिलेगी । मुआवजा भी। हम पंहुचे । बात हुई। डीएम अशोक कुमार ने कहा कि मरने वाले की पत्नी को नौकरी दिलाई जाएगी। हमने कहा कि हमारे पत्रकार सलूजा पर हमला हुआ है। उसे क्या मिलेगा? डीएम ने कहा कि पांच हजार रुपये दिए जाएंगे।
हम सलूजा केे इलाज के लिए बिजनौर को लेकर चलने लगे । एसपी निरंजन लाल ने कहा कि उपचार करा कर भिजवा देना। मैंने कहा कि हम माने की सलूजा मुलजिम है? इस पर इंस्पैक्टर के के शर्मा ने कहा कि कोई जरुरत नहीं। सलूजा मुलजिम नहीं हैं। आप जहां चाहें ले जांए। जहां रखे। निरंजन लाल अलग तरह के अधिकारी थे। पर के के शर्मा के सामने वे कुछ नहीं बोले।
मुख्यमंत्री मायावती बिजनौर आई। चलीं गईं। इस प्रकरण का जिक्र भी नहीं हुआ। 11 मार्च 1994 को दर्ज मुकदमा एक माह बाद 12अप्रेल 94 को ही खत्म ही गया।
सलूजा पर हमले की आशंका को देख एसपी ने उन्हें तीन माह के लिए एक सशस्त्र गार्ड दिया। तीन माह के बाद मंडलायुक्त की संस्तुति से इनके पास तीन माह और गार्ड रहा।
सलूजा फक्कड़ रहे । शुरू से लेकर । अब भी ऐसे हीं हैं। गार्ड रहा। कोई वाहन तो था नहीं। सलूजा जी दिन भर गार्ड को साइकिल पर लिए घूमते। कभी सलूजा साइकिल चलाते । कभी गार्ड। गार्ड भी सलूजा जी की सरलता देख उनमें रम गया था।
सलूजा जी आज अमर उजाला में नहीं हैं,पर सरलता वैसी ही है।
अशोक मधुप
Comments
Post a Comment