पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी -12
पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी -12
1984 का मध्यावधि चुनाव होना था। इस चुनाव में कांग्रेस की प्रत्याशी मीरा कुमार ,दमकीपा से राम विलास पासवान और बसपा से मायावती चुनाव लड़ रहीं थीं । चुनाव की खास बात यह थी कि रामविलास पासवान की बड़ी हवा थी। पूरे क्षेत्र में धूम थी। वे स़ड़क पर दो मिनट को खड़े हो जाते तो भीड़ एकत्र हो जाती।उनकी शाम को पहली सभा होती थी और उसमें ही घोषणा होती कि अगली सभा कहां होगी। इस सभा की भीड़ नारे लगाती हुई उनकी गाड़ी के पीछे -पीछे जाती। हालत यह रहती कि पहली सभा की भीड़ रात 11 बजे की अंतिम सभा तक साथ -साथ रहती।
रामविलास पासवान का चुनाव लड़ाने के लिए बिजनौर में शरद यादव और मुलायम सिंह आए थे। ये दोनों नेता पूरे चुनाव में बिजनौर ही रहे।रामविलास पासवान का कार्यालय रेलवे स्टेशन के सामने बना जानी भाई का होटल था। आज इसमें ऊपर के हिस्से में लोगों के आवास हैं । नीचे दुकान हैं। उस समय होटल के नीचे सड़क के किनारे पर एक टूटा खटोला पड़ा रहता था। मुलायम सिंह प्रायः इस पर लेटे रहते थे।
मीरा कुमार का कैंप-- कार्यालय पीडब्लूडी का डाक बंगला था। केंद्र से कई मंत्री उनका चुनाव लड़ाने आए थे। मीरा कुमार को प्रदेश सरकार लड़ा रही थी। वीर बहादुर सिंह उस समय मुख्य मंत्री थे। उन्होंने चुनाव की कमान संभाल रखी थी।
इस चुनाव के मतदान की पहली रात में ही पासवान को च़ुनाव लड़ा रहे कई दिग्गज नेता रातों रात दल बदल गए थे। भाजपा को समर्पित एक पूर्व विधायक भी कांग्रेस के साथ हो गए थे। उनकी जिम्मेदारी अफजलगढ़ क्षेत्र के सभी बूथ पर बस्ते लगवाने और वोट डलवाने की थी। उनके पाला बदल जाने से इस क्षेत्र में रामविलास पासवान के बस्ते बूथों तक नहीं पहुुॅच पाए थे। मुख्यमंत्री कालागढ़ में टिके थे।नतीजा यह हुआ कि पासवान लगभग पांच हजार मत से चुनाव हार गए ।
चुनाव के दौरान मीडिया को भी खरीदने की कोशिश हुई। खबरें बिकीं। एक खबर छापने के मुझे पांच हजार रुपये दिए जा रहे थे। मैने नहीं लिए। दो दिन बाद वही खबर लखनऊ से ,अमर उजाला के पहले पन्ने पर छप गई। मुझे बड़ा धक्का लगा । मैंने क्रोध में अतुल जी को त्याग पत्र भेज दिया। रात में अखबार लेकर टैक्सी आयी। अतुल जी द्वारा उसके चालक से कहा गया था कि अशोक मधुप को हर हाल में अपने साथ लेकर आना है।
टैक्सी चालक बंडल संभालने वाले चौकीदार को बता गया कि मैं लौटकर आ रहा हूं। चौकीदार का मुझे फोंन आ गया। मैं टैक्सी से बरेली चला गया। प्रेस प्रांगण में प्रेस से पहले अतुल जी की कोठी होती है। वे कोठी के बाहर ही अपनी कार पर खड़े मिल गए। मुझसे बात की । त्याग पत्र का कारण जानने पर अखबार मंगाकर खबर पढ़ी। कहा -खबर छपने योग्य नहीं थी ,फिर छप कैसे गई? पता लगाते हैं।
नवंबर या दिसंबर का माह था। ठंड बहुत थी। मैने उनसे कहा कि मुझे तीन सौ रुपये की बहुत जरुरत है किंतु मैंने पांच हजार रुपये नहीं लिये और लखनऊ वाला बिक गया। उन्होंने पूछा - तीन सौ रुपये की क्या जरुरत है? मैने पांव की ओर इशारा कर के हॅसकर कहा- इस ठंड में चप्पल पहने हूँ । जूते खरीदने को पैसे नहीं है। अतुल जी भी हॅस पड़े और मुझे समझा दिया ।यही होता है। मैं लौट आया। काम शुरू हो गया।
एक बात कहता चलूं कि अतुल जी अपने साथ काम करने वाले हर आदमी की जरूरत समझते थे।उसीके हिसाब से मदद करते थे।कभी गिनकर पैसे नही दिए।कई बार आपके पास से गुजरते आप के हाथ में इस तरह रुपये दे जाते की आपके पास खड़े व्यक्ति को पता नहीं होता था।
अशोक मधुप
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