मैंने खबर रोकने के लिए रिश्वत नहीं ली
पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी दस
मैंने खबर रोकने के लिए रिश्वत नहीं ली
1990 गल्फ वॉर। इराक की सद्दाम सरकार के खिलाफ 34 राष्ट्र युद्ध कर रहे थे। अमेरिका इनका अगुआ था।ये ल़ड़ाई लगभग सात माह चली।
पूरी दुनिया को तेल खाड़ी के देश आपूर्ति करते हैं। युद्ध होने के कारण तेल की आपूर्ति रुक गई।इस लड़ाई में दुनिया में तेल का संकट पैदा हो गया। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा।सरकार के आदेश पर देश भर में पेट्रोल और डीजल के परमिट जारी हुए।अपने जनपद में भी ऐसा ही हुआ। नगर क्षेत्र में एसडीएम और देहात में बीडीओ को पेट्रोल डीजल के परमिट देने के अधिकार दिये गए। व्यवसायिक वाहनों के लिए डीजल की मासिक सीमा निर्धारित कर दी गई।
कोतवाली देहात में जबर सिंह बीडीओ हुआ करते थे।उन्होंने विश्वास में कोरे परमिट पर अपने हस्ताक्षर कर स्टाफ को दे दिए। ताकि उनकी अनुपस्थिति में भी किसी वाहन चालक को परेशानी न हो। उनके स्टॉफ ने व्यवसायिक वाहनों के लिए जारी होने वाले ये खाली हस्ताक्षर किये मुहर युक्त परमिट 200- 300 रुपये में बेच दिए। किसी ने मुझे इन परमिट की छाया प्रति लाकर दे दी। मैने इन्हें अखबार में छापना शुरु कर दिया।मेरे पास काफी सारे अलग -अलग नंबर की फोटो स्टेट आईं थी। मैने तीन - चार दिन समाचार छापा।
किसी ने जबर सिह को सूचना दे दी कि अमर उजाला के पास अभी परमिट की काफी प्रति हैं। उनका संदेश आया । खबर छापना बंद कर दें। वह 70- 75 हजार तक देने को तैयार हैं।मैंने मना कर दिया।मैं खबर छापता रहा।कई माह बाद एक दिन जबर सिंह कलेक्ट्रेट में मिल गए। परिचय हुआ। वे पतले सांवले रंग के थे। बोले आपका आभार। आपने मेरे 75 हजार रुपये बचवा दिए।मैंने कहा। कैसे ?मुझे कुछ पता नहीं। वह बोले कि आप मेरे द्वारा जारी कोरे परमिट छाप रहे थे। मैंने आपको मामला निपटाने के 75 हजार तक देने का अपनी ओर से आफर किया था। आप और कहते तो मैं बीस- पचीस हजार और दे देता। एक लाख रुपया में आराम से आपको दे सकता था।आपने लेने से मना कर दिया।आपने नहीं लिए। डीएम साहब से 25 हजार रुपये लेकर फाइल बंद कर दी। इस तरह मेरे लगभग 75 हजार रुपये बच गया। धन्यवाद देकर वे चले गए।
मैं उन्हें देखता रह गया। काफी देर सोचता रहा कि डीएम जैसा अधिकारी भी इतना सस्ता हो सकता है। मेरे साथ के साथी पत्रकार ने मुझे खूब उल्टा -सीधा कहा। बने रहो ईमानदार। इस जमाने में सब बिकाऊ हैं। आप नही बिकेंगे। कोई और बिक जाएगा। पर मुझे संतोष रहा। आज भी संतोष है।
बाद में जबर सिंह जी यदा- यदा मिल जाते। धीरे - धीरे एक अच्छे मित्र बन गए।एक बार संकट में उन्होंने मेरी बहुत मदद की।
अशोक मधुप
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