जब मेरा अपहरण हुआ

 पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी  -9


जब मेरा अपहरण  हुआ 

अमर उजाला में सिख  आतंकवादियों की आपसी टकराव की खबर छपने से पुलिस  अधिकारी मुझसे नाराज थे। उस समय  नेता जी मेरे नजदीक थे। उनके कहने पर बिजनौर पुलिस क्षेत्राधिकारी बिजनोर के खिलाफ  मैने दो-तीन खबर छापी। शायद सीओ साहब का  नाम  दिनेश शर्मा था। पहले छोटी - छोटी खबर पर बहुत असर होता था। सीओ साहब का तबादला हो गया।

 उनकी जगह बरेली से केके त्रिपाठी आए। मैं  उस उत्तर भारत टाइम्स में बैठता  था। वहां काम करने के दौरान अमर उजाला को खबर भी भेजता था। रात लगभग दस बजे के के ‌त्रिपाठी जी का फोन आया। आदरणीय अतुल जी का संदर्भ दिया। कहा मेरे मित्र हैं। मैं  बरेली से आया हूं। अभी ज्वाइन किया है। थाने में बैठा हूं ।मिल जाओ।

मैं और पारेश कश्यप दोनों थाने पहुंच गए। पारेश कश्यप उत्तर भारत टाइम्स के मालिक और राजेंद्र पाल सिह कश्यप के  बेटे थे।त्रिपाठी थाने के बीच प्रांगण में कुर्सी डाले बैठे थे। हम और पारेश उनके मिले। उन्होंने बैठा लिया। चाय मंगा ली। हम चाय पी रहे थे। कि हल्के चेचक के मुंह दाग सांवले रंग का  एक दरोगा  उनके पास आया। त्रिपाठी जी को उठाकर ले गया। कोने में वह और ‌त्रिपाठी जी बात करते रहे। मुझे लगा कि मेरी और इशारा कर भी कुछ बात की। मैंने ध्यान नहीं दिया।

पारेश कश्यप मेरे घर से कुछ आगे ही रहते थे। लगभग 12 बजे उन्होंने घर के पास छोड़ ‌दिया। गर्मी के दिन थे। लाइट थी नही। मैं और निर्मल आंगन में लेट रहे थे। लगभग एक बजे  किसी ने दरवाजा खटखटाया।

मैने दरवाजा खोला। एक सिपाही खड़ा था। उसने कहा कि मंडी में सुभाष बुला रहा है। मैने कहा कि मैं किसी सुभाष को नहीं जानता। वह चला लगा। कुछ देर बाद  आया। कि उसकी तबियत खराब है। वह वहीं बुला  रहा है। मैने कहा कि पहले तो मैं  उसे जानता नहीं। और  अगर  जानता भी हूं तो वह मेरे घर आए। वह चला गया। आधे घंटे बाद फिर आया कि वह चौराहे पर खड़ा है। मैने  कहा -खड़ा होगा। दरवाजा बंद कर लिया। पता नहीं क्या  दिमाग में आई कि देखूं । कौन हैं। क्या चाहता है।मैरे घर से सटा मंदिर है। मंदिर के सामने क्रेशर वाले चुन्नी लाल अरोड़ा जी का मकान। इसके बाद सड़क। मैं  गली से बाहर आया। चुन्नी लाल के  चबुतरे पर खड़ा था । वह सिपाही मुझे दीख गया। निर्मल भी मेरे पीछे आ गई थी। इतनी देर में तीन -चार पुलिस वाले एकत्र हो गए। उन्होंने मुझे बातों में लगा लिया। आसपास छिपे  छह -सात पुलिस वाले और निकल आए। फिर क्या था ? मुझे पकड़कर खींचने लगे । मैने शोर मचाया। निर्मल ने शोर मचाया ।गर्मी  उस रात  थी। आसपास के सब जग रहे थे। हमारा शोर सुनकर चुन्नी लाल अरोड़ा जी और मुहल्ले वाले निकल आए। भीड़ इकट्ठी हो गई। हंगामें की आंशका देख उनका इंचार्ज  आया। पुलिस वालों से मुझे छुड़ाया । सॉरी कर जाने लगा। मैने गौर से देखा। ये वहीं दरोगा था जो कुछ देर पहले थाने में मेरे सामने से केके त्रिपाठी को उठाकर ले गया था। अलग में जाकर मेरी और इशारा कर बात कर रहा था।

खैर घर आ गए। समझ नहीं आया। क्या मामला था। नींद तो आनी ही नहीं थीं।  किसी तरह दिन निकला। मित्रोंं को बताया । कुछ पत्रकार और मित्र थाने पहुंच गए।

थाने में मौजूद स्टाफ  ने बताया कि वह इस दरोगा से थाने के सब बहुत परेशान है। पुलिस लाइंस का ट्रेनीज है। अधिकारियों के मुंह चढ़ा है। नाम है  नैपाल ‌सिंह। मैने तहरीर दी। मैने लिखा था कि अपहरण का  प्रयास किया। हेड मोहर्रिर ने कहा । दुबारा लिखो। कि मुझे लटका लिया। पांच - छह कदम घसीट कर ले गए। भीड़ इकट्ठा होने पर विरोध देख छोड़कर गए।  आपने जो लिखा है, उससे  अपहरण नहीं बनता। ये बढ़ने पर अपहरण बनेगा।

किसी अधिकारी को क्या थाना इंचार्ज  तक को पता नहीं लगा। रिपोर्ट लिखकर हाथों -हाथ नकल हमें पकड़ा दी गई। रिपोर्ट  लिखे जाने  पर पुलिस अधिकार‌ियों को पता लगा। खूब  शोर मचा।भाग -दौड़ शुरु  हुई। दबाव दिया जाने लगा।  नैपाल सिंह जाट नहीं था। किंतु उसके नाम के आगे सिंह लगा था। इसलिए मेरे नजदीकी सारे  जाट मित्र उसे जाट समझ सब अलग हो गए।जबकि वह पिछड़ी जाति से  था।कोई मेर साथ उस समय खड़े  रहे तो मेरे मित्र विरेश बल ।  विरेश बल सिविल के वकील हैं। लंबे समय  तक नव भारत टाइम्स के रिपोर्टर रहे।

उनकी मेरी बात हुई। उन्होंने कहा। अशोक आज तुम शून्य हो। शुरूआत कर रहे हो । पुलिस अधिकारी तुमसे भले ही नाराज हों। थाना पुलिस तुम्हारे साथ है। खोने को तुम्हारे पास कुछ नही। जीत गए ‌तो जय -जय । बाद में श्री नरेंद्र मारवाड़ी भी साथ आए। ये श्रमजीवी पत्रकार यूनियन की जिला इकाई के  अध्यक्ष थे। मेरे पक्ष कुछ बयान जारी किए । हालाकि ये बयान बिजनौर के पत्रों ने नहीं छापे ।

बिजनौर में पत्रकारों की और से  कुछ नहीं हुआ।अधिकतर पत्रकार पुलिस के दबाव में मेरा  साथ छोड़ गए। जो मेरे अपने थे। वह भी।

  इस घटना की अमर उजाला में खबर छपते ही  मुरादाबाद के पत्रकार उमेश पी कैरे मेरे संकट मोचन  बनकर सामने आए। मुरादाबाद में  पत्रकारों ने प्रदर्शन किया। दो -तीन दिन डीआईजी का घेराव हुआ ।आदरणीय अतुल जी ने मुझे बरेली बुलाया।   बरेली के साथी अरविंद उप्रेती, लक्ष्मण स‌िंह भंडारी,विपिन धूलिया और सुनील शाह मुझे लेकर आई जी के पास गए। आई जी ने सारा प्रकरण सुना। कहा - आप निश्चित होकर बिजनौर जाए। आपका कुछ नहीं होगा। इन साथियों में आज सुनील शाह हमारे बीच नहीं हैं।

अतुल माहेश्वरी सदा अपने स्टाफॅ के साथ रहे। पत्रकार उमेश डोभाल की मृत्यु की सीबीआई  जांच  होने और उनके हत्यारोपियों की गिरफ्तारी तक वे सक्रिय र‌हे।

   मैं बिजनौर पहुंचा।  सब अखबार में पुलिस का स्पष्टीकरण था  कि पुलिस अशोक मधुप के भाई की तलाश में उनके घर  गई थी। भाई की जगह गलती से उन्हें उठा लिया। गलती का पता चलने पर  छोड़ना  पड़ा। बताता चलें कि उस समय मेर छोटे भाई  की उम्र 15 साल के आसपास होगी। वह अपराध की और बढ़ रहा था। कई साल से मेरे साथ नहीं रहता था। 17 साल की उम्र में उसकी मौत हो गई।

नैपाल से नाराज थाना पुलिस ने कहा कि अध‌िकारियों  से पूछो -किसी मुलजिम को पकड़ने जाती तो थाना   पुलिस जाती। पुलिस लाइन्स का ट्रेनीज सब इंस्पैक्टर पुलिस लाइस फोर्स के साथ कैसे गया?  हम इस मांग को ही आगे  बढ़ाते  रहे। नैपाल मेरे घर लिखा -पढ़त में नहीं आया था। न आ सकता था। अधिकारियों ने   अपने को घिरते देख नैपाल सिंह के विरूद्ध जांच शुरु करा दी। पुलिस ऐसा विभाग है कि  ‌फंसने पर सब अ‌धिकारी बच  जातें हैं । आगे आने वाला ही झेलता है।    

दो -तीन दिन बाद थाना पुलिस ने नैपाल सिंह को  शक्त‌ि चौक पर वाहनों से वसूलयाबी करते  पकड़ लिया गया। उसके खिलाफ  कार्रवाई शुरू हुई। इसके  10- 15 दिन बाद   नजीबाबाद बस स्टैंड के सामने एक  वर्कशाप पर नैपाल सिंह ने मोटर साइकिल मरम्मत कराई थी।  मरम्मत के पैसों को लेकर विवाद हुआ । धक्का मुक्की हुई । नैपाल के खिलाफ  रिपोर्ट  हुई।

 सारे प्रकरण की   जांच हुई।मेरे और वाहनों से वसूलयाबी को लेकर नेपाल को  दो बैड एंट्री लगी। उसका ट्रेनिंग  पीरियड़ छह माह के लिए बढ़ गया। ये घोषणा तत्कालीन एसपी को प्रेस बुलाकर करनी पड़ा। नैपाल सिंह को जनपद से  जाना पड़ा । कहां गया फिर पता नहीं चला। के के ‌त्रिपाठी बिजनौर कुछ समय  रहे ।उन्होंने चाहा कि मैं ये किस्सा भुला दूं पर मैं  नही भुला पाया। बरेली के साथियों ने इतना जरूर बताया कि त्रिपाठी का यह रहा है कि अपने पूर्व साथियों का विरोध करने वालों को   जाते ही सबक सिखाने का प्रयास करता है।

अशोक मधुप

Comments

Popular posts from this blog

नार्मल के बीटीसी बनने का सफर

बिजनौर में बनाया प्रेस क्लब

सच के लिए दी कुर्बानी, किसी को मौत तो किसी को मिली जेल अमर उजाला के 25 वे स्थापना दिवस पर