कालागढ़ थानाध्यक्ष सुरेंद्र सिंह मलिक और कालागढ में सेना का आपरेशन
पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी -8
कालागढ़ थानाध्यक्ष सुरेंद्र सिंह मलिक और कालागढ में सेना का आपरेशन
1984 के आसपास कालागढ़ के थानाध्यक्ष सुरेंद्र सिंह मलिक होते थे। वे बिजनौर आते तो मिलते जरुर। हर बार अनुरोध होता - कालागढ़ घूमने आओ। तब कालागढ़ बिजनौर में होता था।मैं कहता -जब आना होगा तब आपको फुरसत नहीं होगी। समय निकलता रहा। 1984 का मध्यावधि चुनाव हो चुका था। चुनाव में कांग्रेस की मीरा कुमार विजयीं हुईं । उन्होंने राम विलास पासवान को हराया था। तीसरे नंबर पर मायावती रही थीं। ये मायावती का पहला चुनाव था।रिजल्ट घोषणा के तीन -चार दिन बाद रविवार पड़ा। उस सयम रविवार को रामायण सीरियल आता था। हमारे घर टीवी नहीं था।पड़ौस में एक परिवार में मैं रामायण देख रहा था। पत्नी निर्मल ने आकर बताया। मुरादाबाद से कैरे साहब का फोन है।
उमेश कैरे मुरादाबाद के प्रतिष्ठित पत्रकार हैं। पीटीआई समेत अंग्रेजी के कई अखबार के वे रिपोर्टर हैं। उस समय अमर उजाला का कार्यालय उनके घर पर था। आज भी मेरे बड़े भाई से भी वे मेरे लिए ज्यादा हैं। जब संकट आया। वे संकट मोचन बनकर आ खड़े हुए।कैरे साहब के पिता जी भी पीअीआई के रिपोर्टर होते थे। माता जी यूएनआई की रिपोर्टर रहीं।
मैंने बात कीं। वो बोले -क्या कर रह हो। मैंने कहा - टीवी देख रहां हूं।वह बोले कालागढ़ चले जाओ। वहां सिख आतकंवादियों के विरूद्ध आर्मी का आपरेशन चल रहा है। अभियान में हैलिकाप्टर भी लगें हैं।पंजाब में सिख आंतकवाद जड़ जमा चुका था। उत्तर प्रदेश में इस ट्रेंनिग कैंप के मिलने का पहला मामला था।
घर से मैं विशाल फोटो स्टूडियो पहुंचा। उस समय अमर उजाला का कोई कार्यालय नहीं होता था। मैं विशाल स्टूडियों पर ही बैठता। यहीं मेरी डाक आती।विशाल स्टडियों के स्वामी सलीम अच्छे फोटोग्राफर थे। मेरे बिलकुल छोट भाई की तरह थे।उनसे मैं अमर उजाला के लिए फोटो खिंचाता था। मैने सलीम को साथ लिया। दोनों बस में बैठ कालागढ़ के लिए निकल गए।
मन में बहुत घुकड़- पुकड़ थी। कैसे होगा? क्या होगा? सेना के अपरेशन के बीच कैसे कवरेज होगा। सेना और आंतकवादियों की गोली के बीच हम कैसे बचेंगे? मैं तनाव में नाखून चबाने लगता हूं। मैं नाखून चबा रहा था। सलीम मेरे पास खामोश बैठा था। मुझे अहसास हो रहा था कि सलीम को लाकर गलती की। मेरी तो पेशेगत मजबूरी थी।पत्रकारों के साथ तो कुछ भी हो सकता है। पर इसके साथ कुछ हो गया तो क्या जवाब दूंगा। ये तो मेरी एक आवाज पर चला आया। मैं तो घर निर्मल के बता कर आया हूं। इसने तो किसी से कुछ नहीं बताया। दुकान भी बंद नहीं की। सिर्फ शटर डालकर चला आया।
हम तीन बजे के आसपास कालागढ़ थाने पहुंचे। सुरेंद्र सिंह मिले। बहुत बिजी थे। वायरलैस पर मैसेज गूंज रहे थे। फोर्स की भागमभाग मची थी।उन्होंने चाय मंगा ली। खड़े - खड़े बातचीत होती रही। हमने कहा -मौके पर कैसे जाया जाएं। उन्होंने बताया कि बहुत दूर वन में है।ट्रेक्टर - ट्राली से भी फोर्स बहुत मुश्किल से पहुंच पा रही है। हैलिकाप्टर को कुछ नहीं मिला। कैंप की जगह धुंआ उठता मिला। आतंकवादी वहां से निकल गए। जगह थी कालागढ़ डेम के पीछे । लगभग एक घंटा हम रुके।
माहौल केे हलाक फुलका करने के लिए मैंने सुरेंद्र सिंह से कहा देखा- हमने क्या कहा था। जब हम आएंगे तो फुर्सत नही होगी। उनके सपाट चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आई। हम विदा लेकर चल दिए।वहां से हम धामपुर आए। धामपुर से बरेली खबर नोट कराई। बाद में घर आ गए।
ज्ञातव्य है कि कुछ दिन पूर्व उत्तर भारत टाइम्स से शाम को खाना खाने घर आ रहा था। आज जहां सीएमओ आफिस है, यहां पहले जिला अस्पताल होता था। मेरा नियम था कि घर आते - जाते अस्पताल देखकर जाता था। मैने देखा पुलिस और एसआईयू के अधिकारियों के साथ दो घायल सिख हैं। दोनों जवान , काफी तंदुरुस्त है। मैंने एलआईयू वालों से पूछा - क्या है? उन्होंने कहा कुछ नहीं। एक्सीडेंन्ट हैं।
बाहर निकला तो एक स्टाफ नर्स दिखाई दी। वह मझले से कद की कुछ भारी और सुदंर थी। बहुत मिलनसार । उसने इशाराकर मुझे बुलाया। कहा - आतंकवादी हैं। कालागढ़ के पास ट्रेनिंग कैंप चल रहा था। वहां से आपस में लड़ पड़े। गोली लगी है। घायल हालत में बस से आते धामपुर -अफजलगढ़ के बीच पकड़े गए हैं।उसने बताया कि अंंदर बीच के कमरे में इनसे पूछताछ होगी। मैं वहीं डयूटी पर हूं। रात को एक बजे के आसपास आना। एमरजैंसी में मिलूंगी। जो ये बताएंगे। तुम्हें बता दूंगी।
मैं चला आया। उस समय अखबार लेकर बरेली से टैक्सी तीन चार बजे के आसपास बिजनौर आती थी। यहां अखबार छोड़कर कोटद्वार जाती। वहां से सबेरे वापस बरेली।
रोडवेज का चौकीदार टैक्सी से अखबार उतरवाकर अपनी सुपुर्दगी में लेता। टैक्सी वाले को डाक (समाचार का) पैकेट छोड देता। नर्स द्वारा बताई जानकारी का पत्र आदरणीय अतुल जी के नाम बनाकर खबरों के लिफाफे में रख चौकीदार को दे दिया। एक दिन बाद सिख आंतकवादी कैंप में गोली चलने का समाचार मुरादाबाद से डीआईजी के हवाले से छपा।
उसके अगले दिन से बिजनौर से शुरु हो गया। क्योंकि घायलों से पूछताछ की सबसे ज्यादा जानकारी मुझे थी। बाद में पुलिस ट्रेनिंग कैंप की जगह गई। वहां खाई से दो आंतकवादियों की लाश निकालकर लाई। ये आपस की गोली बारी में मारे गए थे। इस खबर को लेकर बिजनौर पुलिस मुझसे नाराज हो गई। एक ट्रेनीज दरोगा ने आधी रात को मुझे घर से अपहृत करने का प्रयास भी किया। अपहरण के प्रयास पर आगे चर्चा होगी।
अशोक मधुप
Comments
Post a Comment