किरतपुर के व्यापारी का अपहरण

 यादें पत्रकारिता  लगभग 22 साल पुरानी बात होगी रात के लगभग 12:30 बजे फोन की घंटी बजी। फोन  पत्रकार साथी ज्योति लाल का था ।उन्होंने बताया किरतपुर के दो व्यापारी  का अपहरण हो गया है  ।  किरतपुर का रहने उत्तरांचल पुलिस का  निलंबित सिपाही इन दोनों को कार से लेकर जमींन दिखाने उत्तरांचल लेकर जा रहा था। काशीपुर बॉर्डर के पेड़ निलंबित सिपाही राणा ने इनसे कहा। तुम्हारा अपहरण हो गया है।घर बतादो रुपये का इंतजाम कर लें।कितने रुपये की बात थी ,ये अब याद नहीं। 

उन्होंने अपने घर बता दिया था।निलंबित सिपाही राणा कई गम्भीर अपराधों में उत्तरांचल में वांछित था।

राणा का नम्बर सर्विलांस पर लगा था।वह मोबाइल के नम्बर बदलता था।मोबाइल नही।इसीलिए पुलिस को उसकी लोकेशन मिल रही थी। काशीपुर बार्डर पर काफी तादाद में उत्तराचल पुलिस उसे घेरने को लगी थी। बॉर्डर पर जाते ही पुलिस ने कार घेरली दोनों व्यापारियों को मुक्त करा लिया सिपाही राणा ने भागने का प्रयास किया।वह एनकाउंटर में मारा गया। घटना चक्र काशीपुर की थी पुलिस कुछ कंफर्म नही कर रही थी।।। मैंने किरतपुर के रिपोर्टर श्रीविश्वास गिरी जी को टेलीफोन किया। विश्वास गिरी ने कहा कि मैं इनके  के घर पर ही बैठा हूं ।घटना सही है। मैंने मेरठ बतलाया। बिजनौर का अखबार छप चुका था ।संपादक शशि शेखर जी ने छपे अखबार को रद्दी करा दिया।  इस खबर के साथ नया अखबार छपवा कर बिजनौर भेजा। बिजनौर की येखबर बिजनौर के साथ-साथ अमर उजाला के हल्द्वानी संस्करण में भी छपी। सवेरे खबर पढ़कर काशीपुर और हल्दवानी के पत्रकार चोंके। क्योंकि उन्हें तब तक पता नहीं था। अगले दिन संपादक शशि शेखर जी ने अमर उजाला काशीपुर रिपोर्ट और हल्द्वानी के क्राइम रिपोर्टर को कलर तलब कर दिया। उनसे पूछा  तुम्हारे यहां की खबर बिजनौर वाले को पता लगती है तुम्हें क्यों नहीं। सही उत्तर ना देने पर उन्होंने उन दोनों के लिए त्यागपत्र ले लिए।साथी ज्योतिलाल न बताते तो ये खबर हमारे से चूक जाती।जबकि खबर छाप कर हम सबसे आगे रहे।ये खबर उसदिन किसी अखबार के पास नही थी।

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