पत्र कारिता की शुरुआत May 20, 2021

 

पत्र कारिता की शुरुआत

 पत्र कारिता की शुरुआत

1973 में मैंने संस्कृत से एमए किया। जनता उच्चतर माध्यमिक विद्यालय बागढ्पर में त्रिभाषा शिक्षक के पद पर नियुक्ति मिल गई। साक्षात्कार में शर्त  रखी गई कि आप को हाईस्कूल को हिंदी −स्ंस्कृत पढ़ानी पड़ेगी। यह भी बताया गया कि हाई स्कूल के लिए रखा शिक्षक योग्य नही है,क‌िंतु रखना प्रबंधन की मजबूरी है।

मैने एक साल वहां कार्य किया। गांव में बनी एक मित्र ने कहा बीएड कर लो। एक साल पूरा कर वर्धमान कॉलेज से मैने बीएड कर लिया। अगले साल भाषा शिक्षक के पद पर जैन कॉलेज नहटौर में नियुक्त‌ि मिल गई। 1400 के आसपास वेतन मिलता था। इस दौरान मैने विद्युल्लेखा नाम से साप्ताहिक शुरु किया।अखबार नबीसी का शौक ऐसा चर्राया कि नौकरी छोड़ दी। ये कंफर्म सरकारी सी नौकरी थी। 

अकेले अपने दम पर साप्ताहिक निकालना कभी लाभ का साधन नहीं हो सकता था। कुछ दिन बाद वह बंद हो गया। एक मित्र की सलाह पर बंद पड़े स्वतंत्र आवाज को चलाने की जिम्मेदारी मिली। तीन माह वहां काम किया। वहां से एक पैसा भी नहीं मिला। राष्ट्रवेदना के संपादक विश्वामित्र शर्मा की मुझपर नजर पड़ी। उन्होंने कृपा की । एक सौ रुपये माह पर अपने यहां संपादन के लिए रख लिया।ये सफर कई साल चला।

बिजनौर में कम्युनिष्ट पार्टी के प्रभाव में आकर प्रेस एम्पलाइज यूनियन बना ली। हमने यूनियन बनाई तो दक्षिणपंथी विचार धारा के विश्वामित्र शर्मा जी को सबसे ज्यादा बुरा लगा। वह प्रेस मालिक की यूनियन बना बैठे । इस दौरान में अमर उजाला से जुड़ चुका था। बिजनौर से खबर भेजने लगा था।एक दिन मित्रा जी ने कम्पोजीटर करन सिंह को हटाने का नोटिस दे दिया। इसी को लेकर हमने हड़ताल कर दी। लगभग 26 दिन हड़ताल चली। बिजनौर की सभी प्रेस में ताले लग गए।

 बिजनौर से निकलने वाले दो दैनिक बिजनौर टाइम्स और राष्ट्रवेदना भी नहीं छपे। 26 दिन बाद हड़ताल टूटी। इस दौरान मित्रा जी ने मुझे हटा दिया। 

प्रेस कर्मचारी मजदूर पेशा होतें हैं। उनके रोटी रोजी के संकट को देखते 

हुए। मैंने हड़ताल ख्रत्म होना ही बेहतर समझा।

अमर उजाला से भी कुछ नही आता था। आदरणीय अतुल जी विदेश चले 

गए। अमर उजाला से संपर्क टूट गया। इस दौरान मैने साप्ताहिक बारूद 

और विस्फोट शुरू कर दिया।यह साप्ताहिक जिले के कर्मचारियों की आवाज बना। कर्मचारी ग्राहक बनते गए। खर्च चलने लगा। इस दौरान मरे एक मित्र राजकीय कर्मचारी नेता नेतागिरी के कारण निलंबित कर दिए गए। वह भी मेरे साथ लग गए। अखबार के ग्राहक बनाते । आई राशि का बड़ा हिंस्सा उनके परिवार की जरूरत को जाने लगा।प्रेस की हालत यह थी कि वह बरसात में अखबार छापना पंसद करतीं। क्योकि उनके पास काम नहीं होता। जब शादी , स्कूल के पेपर आदि का समय होता तो अखबार नहीं छप पाता।

मुझे रेलवे स्टेशन पर अजय प्रिटींग  प्रेस मिल गई। उस पर ज्यादा काम नहीं था। प्रेस के अंदर के कक्ष में एक पलंग था । मैं घूमता फिरता आता। वहीं सौ जाता। एक तरह से अजय के परिवार का अंग बन गया।

इस दौरान कई साथियों ने बहुत मदद की। निजामतपुरे के डाक्टर सिद्दीकी थे। वह मेरे बेरोजगारी के इस समय में मुझे एक सौ रुपया प्रतिमाह देते। एडवोकेट विरेश बल मिल जाते तो जबरदस्ती घर ले जाकर खाना खिलाते। ओमपाल सिंह और शुगर मिल पर रहने वाले एक और साथी भी विरेश बल की तरह ही थे।

इस दौरान बिजनौर से उत्तर भारत टाइम्स की शुरूआत हुई।मैं इसमें डैक्स पर रख लिया गया। झालू से मैं सवेरे नौ बजे के आसपास आने वाली ट्रेन से बिजनौर आता। रात को तीन बजे की ट्रेन से वापस जाता।

ये सिलसिला चल रहा था कि एक दिन एक साहब आए। मुझसे मेरे बारे में पूछने लगे। बातचीत हुई। उन्होंने अपना परिचय सुबोध शर्मा के रूप में दिया ।बताया कि बरेली से आया हूं। अमर उजाला के मालिक अतुल माहेश्वरी जी ने बुलाया है।

उनके साथ में बरेली अतुल जी के पास चला गया। उनके कहने पर अमर उजाला के लिए भी काम करने लगा। अमर उजाला से फिर से जुड़ा तो ये सफर आज भी जारी है।

 

पत्रकारिता छपाई की तकनीक में  परिवर्तन

मेरे पत्रकारिता शुरू करने से अब तक बहुत बड़ा छपाई की तकनीक में  परिवर्तन आ गया। तकनीकी क्षेत्र में तो बड़ा बदलाव हुआ है। पहले प्रिंटिंग प्रेस में रांग के बना अलग-अलग अक्षर होता था ।उन्हें  चुन-चुन कर शब्द बनाये जाते।इस काम को करने वाला कंपोजीटर कहलाता। वह अक्षरों मात्राओं को इकट्ठा करता। उनसे शब्द बनाता।इन लोहे की स्टीक होती।उसे जरूरत  और मैटर के हिसाब से छोटा या बड़ा किया जा सकता। इसमें मैटर को बनाकर बाद में शीर्षक अलग से लगाए जाते हैं । उनके छोटे बड़े टाइप अलग होते।टाइप करने वाले हैडिंग अलग बनाते ।मैटर अलग। कंपोजिटर  इनकी छाप उठाकर हमें देते रहते।हम गलती सुधार कर उन्हें दे देते। गलती ठीक कर मैटर पेज के साइज के फ्रेम में कसा जाता।  आज तो 20 या इससे ज्यादा पेज के अखबार आने लगे। ये जैसे हमें पढ़ने को मिलते हैं,ऐसे ही प्रेस से छपकर निकलते हैं। पहले ट्रेडिल मशीन होती थी । उस पर एक बार में एक ही पेज छपता। मशीन पर छपने वाले मैटर को एक फ्रेम में कसकर मशीन के एक पल्ले पर लगा दिया।इस पल्ले के ऊपर एक तवा लगा होता। उस पर स्याही रहती।स्याही को तवे से पेज के मेटर पर लाने का काम रबर के रोलर करते। ये तवे से होकर छपाई के मेटर के ऊपर आकर उसपर स्याही लगा देते।

कुछ मशीन में मैटर का पल्ला आगे पीछे चलता। कुछ में पेज का। पल्ला आगे पीछे चलने वाला होता था। इस मशीन के साइड में ऊपर एक गोल तबा होता था ।इस पर स्याही लगाई जाती । रोलर मशीन पर इस तरह चलते कि मैटर  से रगड़ कर नीचे आते और मैटर वाले जगह पर स्याही लगा जाते ।दूसरे पल्ले पर कागज  लगाया जाता। छाप सही आए इसलिए कागज के नीचे कई कागज भरे जाते।  सही प्रिंट आए इसलिए छपाई वाले पल्ले पर लागए जाने वाले कागज कम ज्यादा किए  जाते। इस कागजों को लगाने ,कम या ज्यादा करने को दाब कहा जाता । रबर का स्याही का रोलर  इस मैटर पर आकर घूमता। नीचे लगे टाइप से रगड़ कर जाता ।दूसरी साइड के पल्ले पर लगा कागज से आकर टकराता और छप जाता । चार  पेज का अखबार का प्रत्येक पेज  अलग −अलग छपता  था।  फिर उसे बीच से मोड़ा  जाता और बंडल में लपेटकर एजेंट को भेज दिया जाता ।

 पहले फोटो छपना परेशानी कर होता था ।फोटो मुरादाबाद या मेरठ  भेजे जाते। वहां से उनका ब्लॉक बनकर आता ।फोटो की रांग की प्लेट बनाई जाती और उसके पीछे रांग के टाइप   की साइज की लकड़ी लगा कर जोड़ दिया जाता।  केंद्र और  सरकार प्रदेश सरकार के मंत्रियों के ब्लॉक सूचना निदेशालय उपलब्ध कराता था ।मंत्रियों के भाषण में उनके फोटो के साथ यह ब्लाँक जाते थे। जिससे फोटो छप जाता है। ब्लॉक की पहचान के लिए उनके पिछली साइड में मंत्रियों और नेताओं के नाम की स्लिप लगी होती थी। कई बार ये स्लिप  कट− फट जाती है तो पहचानने में बड़ी परेशानी है ।मैं बिजनौर में जब राष्ट्र वेदना में काम करता था ।उस दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री राम नरेश यादव बिजनौर आए।  उनकी सभा के  उनके भाषण में उनका फोटो लगना था ।इस काम के लिए तैनात कर्मचारी से ब्लॉक ढूंढ कर पेज  को लगाने पर कहा गया ।कर्मचारी ने ब्लॉक खोज कर पेज का लगा दिया। पेज का प्रिंट निकाल कर प्रूफ चैक करने को किसी और को दे दिया। प्रूफ पढने वाले ने ध्यान नहीं दिया। अखबार का पहला अंक चैक करने के लिए आया।  पता लगा कि फोटो मुख्यमंत्री राम नरेश यादव की जगह बिजनौर निवासी कुंवर सत्यवीर का लग गया है। ब्लॉक बदलने में 10-15 मिनट लगते ।समय नहीं था अखबार बंडल जिस ट्रेन से जाते ,उसका आने का समय हो गया था । उपाय सूझा कि  पेज के नीचे की कागज को काट दिया जाए।  फोटो के नीचे लगी बराबर की जगह की दाब   कटवा दी गई ग। दाब  कटने के बाद पता ही नहीं चला कि किसका फोटो है। मुख्यमंत्री ग्राम नरेश यादव का फोटो है या कुंवर सत्यवीर का ।। बस कुछ काला −काला  नजर आया ।

पहले चार पेज के अखबार छपते थे ।पहले पेज पर देश− प्रदेश की महत्वपूर्ण खबरें होतीं ।दूसरे पेज पर संपादकीय और लेख होते। तीसरे पीठ पर जनपद और आसपास के समाचार होते हैं और चौथे और अंतिम पेज पर स्थानीय समाचार होते। प्रथम पेज  के समाचार के लिए दोपहर 2:35 पर रेडियो से धीमी गति के समाचार आते। धीमी गति होने के कारण इन्हें आदमी आसानी से  नोट कर लेता ।बाद में साफ   लिखकर कंपोजिटर को टाइप करने को दे दिए जाते ।यह समाचार पहले पेज पर जगह पाते थे ।कई बार कोई आता जाता तो पॉइंट लिए जाते । बाद में उन्हें विस्तार दिया जाता। देश −विदेश के महत्वपूर्ण समाचार के लिए रेडियो ही सहारा होते । सवेरे 11:00 के दो  मिनट के समाचार आते। एक आदमी महत्वपूर्ण समाचार के पांइट नोट करता जाता। उसके बाद एक बजे  दो  बजे के बड़े बुलेटिन होते थे। इनसे खबर नोट की जाती है।

इसके बाद टू इन वन आए। इसमें रेडियों के समाचार बुलेटिन रिकॉर्डर किए  जाने लगे। बुलेटिन खत्म होने पर रिकार्ड किए समाचार को  बार-बार आगे पीछे कर नोट किया जाने लगा। इस तकनीक में सुधार आया ।टेलीप्रिंटर आ गए यह एक तरह का  टाइपराइटर होता ।मुख्यालय से आपके अखबार के दफ्तर तक इनकी टेलीफोन की तरह की लाइनें होती। मुख्यालय में बैठा आदमी टाइप करता रहता और बाद में यह आपके पास तक टाइप आता रहता। धीरे-धीरे मुख्यालय पर टाइप करने की जगह रीवन पर  टाइप होने लगी ।इस रीवन  को दोबारा भी प्रयोग किया जाता। रीवन में गोल −गोल छेद बने होते । टेलीप्रिंटर के लिए छोटे स्टेशनों पर मिस्त्री   भी नहीं होते थे। ट टेलीप्रिंटर जल्दी जल्दी खराब हो जाते। बिजनौर में (

मेरठ से मुरादाबाद से मिस्त्री मंगाया जाता। ये विभाग विभाग से खर्च  तो लेता ही, अखबार के दफ्तर से दारू और मुर्गा और मेहनताना अलग से चार्ज करता है। लाइट गायब होने पर यह टेलीप्रिंटर काम नहीं करते।

इस समय समाचार पत्र के प्रकाशन के लिए कंपोजिटर महत्व खड़ी होता। कई बार कंपोजिटर के न आने पर   प्रदेश सरकार के आए बड़े-बड़े  पुराने विज्ञापन लगाकर खाली जगह भरी जाती।  विज्ञापन एक-दो दिन के लिए आते लेकिन यह बाद में भी इसलिए छपते रहते कि अखबार में मैटर टाइप करने वाले नहीं होते। कई बार समाचार के लिए उपलब्ध नहीं होते। इसके लिए व्यवस्था थी कि दूसरे स्थान के आए अखबार से खबर लेकर कंपोज कराली जातीं।

आपके अखबार की प्रतियां दूसरे जिलों और प्रदेश  के छपने वाले अखबारों को भेजी जाती थी ।उसके बदले में वह अपने आप अपने अखबार  भेज देते। यह अखबार आने-जाने का सिलसिला डाक से होता। हम इन बाहर के अखबारों से समाचार और लेख ले लेते ।ऐसे की जरूरत पड़ने पर इन अखबारों के मुख्यालय पर हमारे समाचार पत्र के समाचार   लिए ए जाते हैं।

मेरे पत्रकारिता जीवन में संचार तकनीक में बड़ी क्रांति आई ।अब मोबाइल हो गए उन्हें हम कहीं भी लेकर घूम सकते हैं ,कहीं भी फोटो खींच सकते हैं कहीं से फोटो और समाचार तुरंत भेजे जा सकते हैं। पहले बेसिक फोन होते थे । आपके घर या दफ्तर पर एक जगह फिक्स रहते। थे नंबर डायल करने की व्यवस्था नहीं होती। आप अपने फोन का रिसीवर उठाते तो  टेलीफोन एक्सचेंज में आपके नंबर के सामने लगी लाइट जल जाती। वहां बैठा ऑपरेटर आपके नंबर में लीड लगाकर पूछता नंबर प्लीज। आप उस  टेलीफोन का नंबर बता देते, जहां  बात करनी होती। वह आपके नंबर में लगी लीड  का दूसरा सिरा आपके बताएं टेलीफोन नंबर में लगा देता। अपने हाथ से लीवर घुमा कर दूसरे नंगर पर  घंटी करता। टेलीफोन अटेंड होने पर आपकी बात शुरू हो जाती है ।दोनों साइड में से एक ओर की लाइट बंद होने पर ऑपरेटर लीड हटा देता । आपकी बात खत्म हो जाती  

शहर से बात बाहर बात करने के लिए आप ऑपरेटर को कॉल बुक कराते और उस शहर की लाइन ऐसे ही मिलती, जैसे आप अपने शहर के नंबरों से बात करते हैं। जब वहां ऑपरेटर आपके शहर के ऑपरेटर से बात करने के लिए नंबर मांगता तो वह आपरेटर उसके उपभोक्ता को बात कराने के साथ-साथ आपको भी उन शहरों में बात करा देता है। मुझे अमर उजाला बरेली के लिए खबर देने के लिए बरेली की  कॉल बुक करानी पड़ती। तब  बिजनौर से सीधे बरेली लाइन नहीं थी। बात कराने के लिए मुरादाबाद ,मुरादाबाद से  दिल्ली की लाइन देता। कई बार लखनऊ होकर बरेली हमारी बात होती। अमर उजाला की मुरादाबाद लखनऊ और दिल्ली में अपनी टेलीप्रिंटर लाइनें थी ।बरेली के मुकाबले में समाचार मुरादाबाद , लखनऊ और दिल्ली देने में सुविधाजनक रहते थे ,क्योंकि जल्दी बात हो जाती थी। मैं वहां समाचार नोट करा देता।

 

 

85 के आसपास की बात हुई ।  समाचार भेजने  की समस्या को देखाअमर उजाला ने मेरे आवास पर टेलीफोन  लगाने का निर्णय लिया । कमरुद्दीन साहब बिजनौर में एसडीओ टेलीफोन  थे ।मेरे उनसे बहुत अच्छे संबंध है ।मैंने उन्हें बताया ।उन्होंने कहा कि तुरंत अमर उजाला से लिखवा कर एक लेटर मंगवा लें । रात को अखबार के बंडल के साथ पत्र आ गया। अगले दिन मैं  फिर कमरूद्दीन साहब से मिला।उन्हें  अमर उजाला से आया पत्र सौंप दिया।उन्होंने फोन कनेंक्शान लेने का मेरे से फार्म भरवाया। अपने कार्यालय के बड़े बाबू से कहा कि जल्दी डिमांड नोट बनाओ और इन्हें दे दो ताकि पेमेंट जमा हो जाए ।एसडीओ ऑफिस उत्तर भारत के सामने प्रथम तल पर था। मैं  उत्तर भारत में उस समय काम करता था। उनके  ऑफिस के बड़े बाबू ने कहा कि मैं थोड़ी देर में इनके दफ्तर में डिमांड नोट पहुंचा दूंगा। कमरूद्दीन साहब ने कहा− तुरंत बनाओ अभी पैसा जमा कराओ। वीआईपी में हमारे पास एक कनेक्शन बकाया है। एक डॉक्टर साहब का बार-बार टेलिफोन आ रहा है नए कनेक्शन के लिए। उन्हें बताने से पहले इनका पेमेंट जमा करा दो। तुरंत  एस्टीमेट बना ।उन्होंने अपना ही आदमी पोस्ट ऑफिस में भेजकर पैसा जमा कराया।  मेरी एप्लीकेशन डिमांड नोट और जमा की रसीद अपन विभाग के एक अवर अभियंता से सीन कराई ।शनिवार का दिन था अगले दिन रविवार था लेकिन स्टाफ को आदेश थे । कल  ही इनका कनेक्शन लगना है। मेरे घर के आस-पास टेलीफोन लाइन  नहीं थी। राम के चौराहे से मेरे घर तक लगभग 6-7 फर्लांग  लंबा केबल डाल कर रविवार को ही टेलीफोन चालू कर दिया गया  ।उनके स्टाफ जो केबिल  डाला , वह घर के पास के  मंदिर से होकर मेरे घर तक आया था। कमरूद्दीन साहब अगले दिन घूमते हुए मेरी साइड से  निकले । सोमवार को  मैं उनके पास फोन लगने का धन्यवाद देने गया था। उन्होंने स्टाफ को बुलाया और कहा कि मंदिर से केवल हटाइए और बाहर गली से अंदर ले जाइएगा ।मंदिर धार्मिक स्थल है उसके अंदर से केवल जाना ठीक नहीं है।

अगले दिन उनके पास डाकटर  साहब आए तो कमरुद्दीन साहब ने बता दिया ।सामान्य में कोई कनेक्शन खाली नहीं है ।वीवीआइपी में एक कनेक्शन बकाया था ,वह कल चालू हो गया ।जब  कनेक्शन की नई  रैक आएगी। तब फोन लगेगा।इसी दौरान बिजनौर के तत्कालीन  विधायक विशन लाल जी के पुत्र अरविंद चौधरी को टेलीफोन की जरूरत हुई ।उन्होंने कहा तो कमरूद्न साहब ने मनाकर दिया। मामला जिलाधिकारी तक गया जिलाधिकारी होते थे डीएस बैंस   साहब । उनसे  शिकायत की गई।  मैं  बहुत दिन से कह रहा हूं, मुझे फोन नही दिया। किसी अशोक मधुप को एक दिन पहले आवेदन करने पर ही लगा दिया।  उन्होंने कमरूद्दीन साहब को  बुलाया ।उनसे अरविंद चौधरी साहब के यहां टेलीफोन लगाने का अनुरोध किया। कमरुद्दीन साहब ने आपने अपनी मजबूरी बताते हुए कहा कि मेरे पास कोई कनेक्शन खाली नहीं है ,जब नए कनेक्शन पड़ेंगे तब दिया जाएगा । उन्होंने मेरे यहां फोन लगाने के बारे में पूछा। कमरूद्दीन साहब ने उन्हें बता दिया− वीआईपी में एक कनेक्शनखाली था। अशोक मधुप मीडिया से होने के कारण  वीआईपी में हैं,इसलिए उन्हें दे दिया गया है। अब कोई कनेक्शन खाली नहीं हैं।इस तरह से मेरे घर पर टेलीफोन चालू हुआ।

 

लगभग 30 -35 साल पुरानी बात होगी। बिजनौर मुख्यालय से मैंने अमर उजाला के लिए खबरें भेजनी शुरू की थी ।वैसे मैं बिजनौर के राष्ट्र वेदना में काम करता था। इस समय अमर उजाला के रिपोर्टर एक अन्य महानुभाव होते  थे। एक प्रकरण में एसडीएम नजीबाबाद कोर्ट में पेश हुए हैं। न्यायाधीश ने उन्हें गिरफ्तार करने के लिए आदेश दिए ।मजिस्ट्रेट कोर्ट से निकल भागे। खबर मुझे मिली।बिना किसी को बताए मैने बरेली भेज दी।अगले दिन बिजनौर में आरजेपी इंटर कॉलेज भारत-पाकिस्तान टेबल टेनिस मैच था।मेरे पास कोई अधिकार पत्र नहीं था। इसलिए तय हुआ कि इस कार्यक्रम को दूसरे  साथी कवर करेंगे। मजिस्ट्रेट के कोर्ट से भागने का समाचार सुबह के  अमर उजाला में प्रथम पेज पर प्रमुखता से छपा।  मेरे बारे में प्रशासन को सूचना भी नहीं थी की मैंने अमर उजाला के लिए काम शुरू कर चुका हूं। इसलिए मैंने जाना गंवारा नहीं किया। मैच में दूसरे साथी पहुंचे। तत्कालीन कमिश्नर कार्यक्रम में आए हुए थे। दूसरे पत्रकार साथी  को देखकर वे उनपर नाराज हुए ।आजकल अमर उजाला में क्या चल रहा है। मिस्टर यह क्या खबर है कोर्ट से मजिस्ट्रेट भागा।  अब तक  दूसरे साथी  मेरी नियुक्ति  छुपाए हुए थे। मजबूरी में उन्हें  बताना पड़ा। अमर उजाला के लिए वे नहीं

अशोक मधुप खबरें भेज रहे हैं। इस तरह से हमारा सिलसिला शुरू हुआ।अब  अमर उजाला में खबर छपवाने  के लिए प्रशासन मुझे खोजने लगा।

 

अक्टूबर 1995 की एक शाम । उस समय अमर उजाला का रानी की धर्मशाला में ऑफिस होता था।अंधेरा हो गया था।ऑफिस में काम चल रहा था । मैं काम में लगा था।  ऑफिस में एक साहब ने प्रवेश किया ।उनके सिर पर आगे झुकने वाला  कैप लगा  रखा था।  गले में लिपटे मफलर से मुह भी ढका था। मैने समझा कि उन्होंने ठंड के कारण  ऐसा किया हुआ है। उन्होंने मुझे देखकर बाहर बुलाया  और एक कागजों का बंडल दिया। कागज अखबार में लिपटे हुए थे ।कहा आराम से पढ़ना।

 वह चले गए काम निपटा कर मैंने बंडल खोला। देखा तो पता लगा कि जिला सहकारी बैंक की  नांगल और मंडावली शाखा में एक करोड़ से ज्यादा का घोटाला हुआ है। इस घोटाले के कागजात हैं।इनमें बैंक के सभापति द्वारा मुख्यालय को इस घोटाले के बारे में भेजे गए पत्र भी थे।पत्र में कहा गया था की नांगल शाखा में एक करोड़ 18 लाख का नाबार्ड से करने के लिए आए धन का घोटाला है ।ऐसा ही घोटाला मंडावली शाखा में  हुआ है।बंडल देने वाले कौन थे चेहरा ढका न होने के कारण मैं उन्हें नही पहचान पाया। लगा कि पहचान छिपाने के लिए वह मुंह कैप औऱ मफलर में छिपाए थे। लेकिन खबर महत्वपूर्ण थी ,बैंक के अपने सूत्रों से कंफर्म किया। उन्होंने पुष्टि की। मैंने खबर छाप दी। मेरे खबर छापने के बाद पूरे जनपद में हंगामा मच गया ।अन्य अखबार  वाले भी सक्रिय हुए। सब अखबारों में घोटाला जमकर छापा। दोनों शाखाओं में दो करोड़  के आसपास का घोटाला हुआ ।इस घोटाले को खोलने वाले, मुझे को कागज देने वाले व्यक्ति कौन थे,मैं आज तक नहीं जान पाया ।लेकिन उनकी कृपा कहेंगे  या विश्वास कि जिले में और पत्रकारों के होते भी वह यह साक्ष्य मेरे पास लेकर आए और मुझे ही उपलब्ध कराएं। खबर भी सर्वप्रथम मैने ही छापी इसका क्रेडिट भी मुझे मिला। बाद में पता लगा कि घोटाला करने वाले महानुभव की डेथ हो गई।तब तक घोटाले राशि बढ़कर दो करोड़ हो गई थी। वह महानुभाव कौन थे जो मुझे कागज देने आए। जिन्होंने मेरा विश्वास किया, उनका आभार व्यक्त किया जा सकता है। उनको साधुवाद कहा जा सकता है ।


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