जब 26 दिन बंद रहीं बिजनौर की प्रेस ,,नहीं छपे अखबार

 

 प्रेस कर्मचारी हड़ताल


लगभग 41 साल पुरानी बात है। मैं दैनिक राष्ट्र वेदना बिजनौर में समाचार सम्पादक था। उस दौरान मैं भारत की कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी का सक्रिय सदस्य भी था।पार्टी ने तय किया कि प्रेस एम्प्लाइज यूनियन बनाली जाए। यूनियन का गठन हुआ। कामरेड बलवन्त सिंह एडवोकेट उसके अध्यक्ष बने और मैं सचिव बना।  हमारी यूनियन के गठित होते ही संघ से जुड़े राष्ट्र वेदना के संपादक विश्वामित्र शर्मा के पेट में मरोड़ होने लगी। उन्होंने प्रेस मालिकों की यूनियन खड़ी कर दी। बिजनौर टाइम्स  के स्वामी −संपादक बाबू सिंह चौहान वामपंथी थे लेकिन प्रेस मालिक होने के कारण  प्रेस मालिकों की यूनियन के  साथ उन्हें जाना पड़ा। एक दिन विश्वामित्र शर्मा ने कंपोजिटर करणसिंह को हटाने का नोटिस दे दिया। हमने तय कर लिया कि करनसिंह को  हटाया गया तो हम हड़ताल पर जाएंगे ।इसी समय प्रिंटिंग प्रेस में वोटर लिस्ट छप रही थी। इनके  प्रकाशन से प्रेस मालिकों की अच्छी आमदनी  हो जाती थी और कर्मचारियों को भी एक मुश्त पैसा मिल जाता था। प्रेस मालिकों पर  दबाव का समय था। उन्होंने मित्रा जी का समझाया भी। कहा बहुत नुकसान हो जाएगा,पर मित्रा जी अपनी हठधर्मी से नहीं माने। निर्धारित समय पर नोटिस पूरा होते ही उन्होंने करण सिंह को हटा दिया ।हम सभी प्रेस के कर्मचारी हड़ताल पर चले गए। उन्होंने प्रशासन का इस्तमाल करना चाहा। अपने संबधों की दुहाई दी, पर प्रशासन ने हाथ खड़े कर दिए। यूनियन को तोड़ने का  प्रयास किया। वह मतलब पड़े पर बेटा− भैया बनाने में माहिर थे। उनका ये  भी हुनर काम न आया।उन्होंने इधर – उधर से भी कर्मचारी लाकर प्रेस चलाने का प्रयास किया। क्योंकि इस हडताल की चर्चा जनपद के साथ− साथ आसपास के जिलों तक भी हो गई थी। इसलिए बाहर से  भी कोई कर्मचारी नहीं आया।  

 लगभग 26 दिन हड़ताल चली। मुख्यालय की प्रिंटिंग प्रेस ही इन दिनों बंद नहीं रहीं बल्कि बिजनौर मुख्यालय से छपने वाले अखबार राष्ट्र वेदना र बिजनौर टाइम्स भी पूरी तरह से बंद रहे



मैं राष्ट्रवेदना में काम करने के साथ−साथ    अमर उजाला बरेली के लिए भी काम कर रहा था।अपना साप्ताहिक भी निकाल रहा था ।बरेली से अमर उजाला प्रसार के साथी श्याम लाल वर्मा का बिजनौर आना -जाना रहता था। वे अमर उजाला के प्रसार विभाग में काम करते थे ।मैंने उनसे कहा कि अगर  अमर उजाला  प्रेस कर्मचारियों को कुछ आर्थिक सहयोग दें तो यह हड़ताल और बढ़ सकती है। अमर उजाला लोकल अखबार जैसा है।इस समय लोकल खबर देने वाला अमर उजाला ही     बिजनौर आ रहा है,उसको अपना प्रसार बढ़ाने का अवसर  मिल सकता है ।अगले दिन लौट कर श्यामलाल जी आए और बोले कि मालिक अतुल माहेश्वरी जी ने कहा है कि हमें फेयर गेम खेलना चाहिए ।अखबार बढ़ाने के लिए इस तरह ओच्छे हथकंडे ठीक नहीं है।

 वोटर लिस्ट छपने में देरी हो रही थी। प्रेस मालिकों के दबाव था। इसके बावजूद मित्रा जी नही मान रहे थे। उनके हठी रूख को देखते हुए स्वर्ग बाबू सिंह चौहान ने सबसे पहले कर्मचारियों की मांग मानी । चौहान साहब के समझौता करते ही  मिश्रा जी को झुकना पड़ा ।समझौता हुआ कर्मचारियों को बंदी के दौरान का पैसा भी दिया गया ।कर्ण सिंह को भी वापिस रखा गया।समझौते से पहले मिश्रा जी ने मुझे हटाने का निर्णय ले लिया था। मैंने भी कर्मचारियों के हित में शांत रहने का निर्णय लिया क्योंकि मेरे और अड़ने पर हड़ताल और बढ़ सकती थी। प्रेस एक्सप्रेस एंप्लाइज की आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं होती थी। उनके परिवार कुछ ज्यादा आर्थिक दबाव में नहीं रखा जा सकता था। यह समय  प्रिंटिंग प्रेस के लाभ का भी था और कर्मचारियों के भी के भी ।इसीलिए उनका हित तो देखते हुए हमने समझौता कर लिया। 17 सिंतबर 1980 को समझौता हुआ।प्रकार 26 दिन बाद सिंतबर  बिजनौर के अखबार शुरू हुए ।प्रिंटिंग प्रेस के भी चक्के घूमने लगे।

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