सुनील शाह

 

सुनील शाह

 

जीवन में मित्र , पत्रकार , संपादक तो बहुत मिले, पर सुनील शाह जैसा नहीं मिला।

बरेली से अमर उजाला के बिजनौर आने के समय सुनील शाह मेरी डैस्क के इंचार्ज होते थे। उनके कुछ र साथी भी थे। गोपाल विनोदी, अशोक वैश्य, अनुपम मार्कंडेय अरविंद उप्रेती, विपिन धूलिया र लक्ष्मण सिंह भंडारी। सुनील शाह,अरिवंद उप्रेती,लक्ष्मण सिंह भंडारी र विपिन धूलिया की चौकड़ी प्रेस में मशहूर थी।सुनील शाह पतले− दुबले मस्त मौला। इन्हें पुराने सिक्के संग्रह का शौक था।

सुनील शाह के डेस्क प्रभारी होने के नाते मैं  उनके संपर्क में ज्यादा रहा। एक− दो बार बरेली उनके निवास पर भी रूकना हुआ।वे अमर उजाला छोड़ जनसत्ता चले गए, तब भी बात होती रही। लौट फिर कर वे फिर अमर उजाला मेरठ में आ गए अपकंट्री हैड  बने। बिजनौर भी उनके अंडर में था, तो खूब बातें होतीं। वे मुझे सदा भाई साहब या मधुप जी कहते।उन्होंने कई से  विषय पर खबर कराई कि दूसरा सोच भी नहीं सकता था।

उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद का रिजल्ट आने को था। पहले रिजल्ट का अखबार छपता था। स्पेशल एडीशन होता। इटरनेट की दुनिया में यह नेट पर आने लगा था। इन्होंने कहा− इस रिजल्ट पर खबर करो। मैंने अपने समय की कहानी लिखी – कभी रिजल्ट के इंतजार में  लगते थे मेले। इन्होंने दिल्ली के किसी अंग्रेजी अखबार के पढ़ा कि बिजनौर के उपन्यास की दुनिया का बड़ा नाम अजहर असर का  निधन हो गया। मुझे बताया। अजहर असर साहब का   जन्म किरतपुर में  हुआ था। मैंने उनपर बढ़िया स्टोरी की।इश्कीया फिल्म आई। इसमें एक गाना है− इब्ने बतूता पहन के जूता। इस फिल्म के  निर्माता बिजनौर के विशाल भारद्वाज हैं। सुनील शाल में मेरे से विशाल भारद्वाज पर स्टोरी करने को कहा। मैंने उनपर ही स्टोरी नहीं की। इब्ने बतूता पर भी स्टोरी की। इब्ने बतूता अपने सफर नामें में लिखते हैं कि वह दिल्ली से मुजफ्फरनगर होकर गंगापार कर मंडावर ( बिजनौर ) होकर अमरोहा गया। मैंने उनके सफरनामे पर भी स्टोरी की। मुजफ्फरनगर के साथी का फोन आया। इब्ने बतूता  इधर से होकर गया− यह कहां से पता चला। मैंने कहा कि  मैंने इब्ने बतूता का सफरनामा पढ़ा है ।उनके बताए टापिक पर मैंने क्या− क्या खबर नहीं की। 

सुनील शाह को सिक्के संग्रह करने का शौक था। उनसे जब भी मिलना हुआ, पुराने सिक्कों की ही उन्होंने मांग की। मैंने उनके लिए सिक्के संग्रह करन शुरू किए। पर कभी सा अवसर नही मिला कि सिक्के उन्हें दे पता ।आज मेरे पास सिक्कों का बड़ा भंडार है।

एक दिन मैंने सुनील शाह को बताया कि बड़ा बेटा अंशुल कल अमेरिका से इंडिया आ रहा है।शाह जी ने कहा कि उससे कहना मेरे लिए एक बोटल व्हिस्की ले आए। अंशुल से शिकागो से फ्लाइट में बैठते मुझे बताया।मैंने उससे कहा कि व्हिस्की की एक बोतल लेते  आना। वह चौंका।क्योंकि वह जानता था कि मैं नही पीता। उसने कहा कुछ नहीं।दिल्ली एयर पोर्ट पर उतरने के बाद सबसे पहले उसने मुझे व्हिस्की की बोतल पकड़ाई।   मैंने  पूछा− कैसे ली। तू तो शराब के बारे में कुछ जानता ही नहीं।उसने कहा− पापा प्लेन में जो सब ले रह थे , वहीं मैने ली।

मेरठ से उन्हें हल्द्वानी का संपादक बनाकर भेज दिया गया। सब ठीक था। वे  उस क्षेत्र के रहने वाले थे। घर के पास पहुंचकर प्रसन्न थे।28 अप्रेल का मन्हूस दिन मेरठ से आईटी के साथी गगन दुग्गल को फोन आया।कहा सुनील शाह जी नही रहे।एक धक्का सा लगा।कुछ देर बाद मेरठ से सुभाष गुप्ता का फोन आया। भाई साहब सुनील शाह जी नही रहे।मैं  देहरादून से निकल रहा हूँ, दो घंटे बाद नगीना रेलवे स्टेशन पर मिलो। अमर उजाला नगीना के रिपोर्टर अनुज शर्मा बरेली रहकर सुनील शाह र अतुल माहेश्वरी जी के साथ पढ़े हैं, सो उन्हें भी  साथ ले लिया।

हल्द्वानी  पंहुचे सुनील शाह जी का

 उनका अंतिम संस्कार कर साथी लौट रहे थे, उन्होंने कहा कि शाह जी के घर पहुंचों।हम घर पंहुचे। उनकी पत्नी बच्चों से मिले । उन्हें धीरज बंधाया। शाम हो गई थी । मजबूरी थी। लौटना था। वापस लौट आए।सुनील शाह जी कभी नहीं भुलाए जा सकेंगे।सदा स्मृति में रहेंगे।

 

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