अन्य अखबार को भी समाचार भेजे
उत्तर भारत में काम
करने के दौरान मैं बाहर के अखबार को भी
खबर भेजता था।उत्तर भारत टाइम्स में बड़ा फायदा यह था, कि उसमें दूर दूर के अखबार
डाक से आते थे। इन आने वाले अखबार को बदले में हम अपना अखबार भेजते थे।
हरिद्वार से वहां के
सेठ अच्छू मल ने अखबार निकाला। भागीरथी संदेश। काफी अच्छा अखबार था। उस समय तक आफसेट मशीन नहीं आई थी। यह
सिलेंडर मशीन पर छपता था । इस अखबार की एक दिन प्रति डाक से आई। मुझे पंसद आया और मैंने उसे समाचार भेजने शुरू कर दिए।समाचार
छपने लगे।काफी दिन
अखबार चला। एक दिन
पता चला कि अखबार के आफिस में गोली चली।
एक प्रमुख व्यक्ति की मौत हो गई। अखबार बंद हो गया। आपातकाल था। संजय गांधी का
युग।अगले दिन संजय संदेश नाम से अखबार निकला। नया टाइटल एक दम मिलना मेरे लिए नई
बात थी। लगा प्रबंधकों को तजुरबा नहीं था। उन्होंने बिना टाइटिल लिए, बिना
डिकलरेशन भरे अखबार निकाल दिया। प्रशासन
की नजर में आया, वह भी बंद हो गया।
दिल्ली से नवजीवन
निकलना शुरू हुआ। मैं दिल्ली गया। उसके
संपादक किदवई जी से मिला। वे मिलनसार हंसमुख थे। बात हुईं। मैंने बिजनौर से खबर भेजने का अनुरोध किया। उन्होंने तुरंत स्वीकृति दे दी।काफी दिन
सिलसिला चलता रहा,फिर ये भी बंद हो
गया।उत्तर भारत में हिंदुस्तान समाचार की टेलीप्रिंटर सेवा थी। इसका भी मैं
संवाददाता बन गया। राष्ट्रवेदना में भी इसकी सेवा शुरू कराई।अर्थाभाव में से सेवा
भी बदं हो गई।मैंने भाषा और पंजाब केसरी को भी खबर भेजीं। खूब छपीं। पर मैं
किसी अखबार के दफ्तर के चक्कर नही लगा
पाया, इसलिए ये सिलसिला ज्यादा नहीं चल
सका।
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