पत्रकारिता की शुरुआत
1973 में
मैंने संस्कृत से एम.ए किया। जनपद के जनता उच्चतर माध्यमिक विद्यालय बागड़पुर में त्रिभाषा शिक्षक के पद पर नियुक्ति मिल गई।
साक्षात्कार में शर्त वह रखी गई कि आपको हाईस्कूल को हिंदी स्ंस्कृत पढ़ानी
पड़ेगी। यह भी बताया गया कि हाई स्कूल के लिए रखा शिक्षक योग्य नहीं है,किंतु
रखना प्रबंधन की मजबूरी है।मैंने एक साल वहॉ कार्य किया।वेतन मात्र 115 रुपये था
उस समय। गांव में बनी एक मित्र ने कहा -बीएड कर लो। शिक्षण सत्र पूराकर मैंने
बीएड कर लिया।इसके बाद
भाषा शिक्षक के पद पर जैन कॉलेज नहटौर में नियुक्ति मिल गई। यह पद
स्थायी था। 400 के
आसपास वेतन मिलता था। इस दौरान मैंने विद्युललेखा नाम से साप्ताहिक शुरु
किया।अखबार नबीसी का शौक ऐसा चर्राया कि नौकरी छोड़ दी। डेढ वर्ष अकेले ही अपने दम पर साप्ताहिक निकाला। साप्ताहिक का
प्रकाशन कभी लाभ का साधन नहीं हो सकता था।
कुछ दिन बाद वह बंद हो गया।
जनता पार्टी की सरकार थी।
बिजनौर के रामकुमार वैद्य ने गंज में आयुर्वेद महाविद्यालय शुरू
किया। मैं एम.ए संस्कृत से था, मुझे संस़्कृत पढ़ाने और आफिस
का काम संभालने की जिम्मेदारी मिली। स्वामी विशोकानंद की गंगा घाट की खाली पड़ी
गोशाला के शेड में विद्यालय शुरू हो गया।
यह विद्यालय स्याना बुलंदशाहर की एक संस्था से संबद्ध था। वैद्य जी
ने मुझे स्याना एक कार्य के लिए भेजा।
बातो −बातों में संस्था के प्रमुख ने बताया कि पिछले साल उन्होंने सरकार को लिखकर
दे दिया। घोषणा की गर्इ कि अगले साल से वह आयुवेर्दिक कोर्स नहीं चलाएंगे।
इसलिए चल रहा हैं कि सरकार इस साल भी अनुमति
दे देगी। मैंने यह बात वैद्य जी को
बतार्इ। वे चौकस हो गए । कुछ ही माह विद्यालय चलाया था, कि बंद हो गया। बिजनौर में चक्कर वाली सड़क पर नगर के आयुर्वेद
चिकित़सक डाक्टर शशिकांत शर्मा अपनी मां
के नाम पर मां मुगियादेवी आयुर्वेद महाविद्यालय
कर्इ साल से चला रहे थे। इस विद्यालय के छात्रों को मान्यता न होने की
जानकारी मिली। डा शशिकांत तो फरार हो गए।
छात्रों ने नगर में जुलूस निकाला। गवर्मेंट कॉलेज मार्ग पर डा शाशिकांत के पिता जी की लोहे के सामान की
बिक्री की बड़ी दुकान थी। ये लोहे वाले पंडित जी के नाम से विख्यात थे।ये गाय पालते थे। प्रसिद्ध था कि इनके पास सदा
बढ़िया गाय होती थी। मौसम में आए फल का शुरू में ही ये
पूरा टोकरा खरीद लेते। ये सारे फल अपनी गाय को खिलाते।छात्रों ने इन्हें दुकान
से उठा लिया।मुंह काला कर पूरे नगर में जुलूस निकाला।बाद में ये मामला तो निपट गया। पंडित जी अपमान न बर्दाश्त कर सके।
कुछ दिन में इनकी मौत हो गर्इ।
इसी दौरान एक मित्र की सलाह पर बंद पड़े स्वतंत्र आवाज को चलाने की
जिम्मेदारी मिली। स्वतंत्र आवाज के
स्वामी उमेश चंद सोती होते थे।तीन माह
वहां काम किया। वहां से एक पैसा भी नहीं मिला। राष्ट्रवेदना के संपादक विश्वामित्र
शर्मा की मुझपर नजर पड़ी। उन्होंने ने कृपा की । एक सौ रुपये माह पर अपने यहां
संपादन के लिए रख लिया।यह सफर कई साल चला।बिजनौर में कम्युनिष्ट पार्टी मार्क्सवादी
के प्रभाव में आकर प्रेस एम्पलाइज यूनियन बना ली। हमने यूनियन बनाई तो दक्षिणपंथी
विचारधारा के विश्वामित्र शर्मा जी को सबसे ज्यादा बुरा लगा। वह प्रेस मालिक की
यूनियन बना बैठे । इस दौरान मैं अमर उजाला बरेली से जुड़ चुका था। बिजनौर से खबर
भेजने लगा था।एक दिन विश्वामित्र जी ने कम्पोजीटर करन सिंह को हटाने का नोटिस दे
दिया। इसी को लेकर प्रेस कर्मचारी ने हड़ताल कर दी। लगभग 26 दिन
हड़ताल चली। बिजनौर की सभी प्रेस में ताले लग गए। बिजनौर से निकलने वाले दो दैनिक
बिजनौर टाइम्स और राष्ट्रवेदना भी नहीं छपे। 26 दिन बाद
हड़ताल टूटी। काम शुरू होने पर मित्रा जी
ने मुझे हटा दिया। प्रेस कर्मचारी मजदूर पेशा थे। उनके रोटी -रोजी के संकट को
देखते हुए। मैंने हड़ताल ख्रत्म होना ही बेहतर समझा। अमर उजाला से भी कुछ नहीं आता
था। आदरणीय अतुल जी विदेश चले गए। अमर उजाला से संपर्क टूट गया।
मैंने अपना साप्ताहिक बारूद और विस्फोट शुरू कर दिया।वह जिले के
कर्मचारियों की आवाज बना। कर्मचारी ग्राहक बनते गए। खर्च चलने लगा। इस दौरान मेरे
एक मित्र राजकीय कर्मचारी नेता नेतागिरी के कारण निलंबित कर दिए गए। वह भी मेरे
साथ लग गए। अखबार के ग्राहक बनते । आई राशि का बड़ा हिस्सा उनके परिवार की जरूरत
को जाने लगा।उस समय अखबार छापने वाली प्रेस की हालत यह थी कि वह बरसात में अखबार
छापना पंसद करती थी । क्योंकि उनके पास काम नहीं होता। जब शादी , स्कूल के
पेपर आदि का समय होता तो अखबार नहीं छप पाता। पर मेरा अखबार नियमित रूप से छपता रहा। मुझे रेलवे स्टेशन पर
अजय प्रिंट्रिग प्रेस मिल गई। उस पर ज्यादा काम नहीं था। प्रेस के अंदर के कक्ष
में एक पलंग था । मैं घूमता -फिरता आता। वहीं सो जाता। एक तरह से अजय के परिवार का
अंग बन गया।
इस दौरान कई साथियों ने बहुत मदद की। पुरे के डाक्टर एच सिद्दीकी थे।
वह मेरे बेरोजगारी के इस समय में मुझे एक सौ रुपया प्रतिमाह देते।साथी वीरेशबल
एडवोकेट मिल जाते तो जबरदस्ती घर ले जाकर
खाना खिलाते। ओमपाल सिंह और शुगर मिल पर रहने वाले एक और साथी भी वीरेश बल की तरह
ही थे।
बिजनौर से उत्तर भारत टाइम्स
की शुरूआत हुई।मैं इसमें डैक्स पर रख लिया गया। बारूद और
विस्फोट मैंने बंद कर दिया। बिजनौर के वरिष्ठ पत्रकार उमेश चंद सोती ने कहा कि यह
मुझे दे दें। मैने बारूद और
विष्फोट उन्हें दे दिया।
झालू से मैं सवेरे नौ बजे के
आसपास आने वाली ट्रेन से बिजनौर आता। रात को तीन बजे की ट्रेन से वापस जाता।ये
सिलसिला चल रहा था कि एक दिन एक साहब आए। मुझसे मेरे बारे में पूछने लगे। बातचीत
हुई। उन्होंने अपना परिचय सुबोध शर्मा के रूप में दिया ।बताया कि बरेली से आया
हूं। अमर उजाला के मालिक अतुल माहेश्वरी जी ने बुलाया है।
मैं
उनके साथ बरेली चला गया। अतुल जी ने कहा - अमर उजाला के लिए काम करो।
मैंने हां कर दिया। कुछ
तै नहीं किया। उसके बाद भी आजतक कभी कुछ
नहीं मांगा। कुछ नहीं चाहा। जो मिल गया, उसे स्वीकार कर लिया। ये सिलसिला चलता
रहा।
आप अगर प्रार्इवेट फर्म में नौकरी करते हैं तो उसमें आपका कोर्इ गौड फादर जरूर होना चाहिए। मालिकों से सीधे
संबध रहे
तो मैंने जरूरत नहीं समझी। मालिकों को मेरा हित समझने की फुर्सत नहीं मिली।
2005− 06 में मेरठ में संपादक सुधांशु श्रीवास्तव और प्रदेश
प्रभारी पुष्पेंद्र शर्मा ने कहा कि वे कुछ कर रहे हैं, जिक्र मत करना। इस तरह से
रिटेनर से मैं स्टाफर बन गया। बहुत लंबे समय के
बाद। वह भी दो साल के लिए। 2008 में 58 साल की उम्र में प्रेस कानून के
अनुसार मुझे सेवानिवृत हो जाना था। सेवानिवृत तो
हो गया किंतु कंपनी ने मुझे नहीं छोड़ा।
सेवानिवृति का पत्र रिटेनर शिप
चलने के साथ ही मिला।
ये सिलिसिला चला तो चलता रहा। 58 साल में सेवानिवृति के 13 साल बाद
तक भी चलता रहा। पारिवारिक जिम्मेदारी आने पर अप्रैल 2021 में त्यागपत्र
दे दिया। दो मर्इ 2021 को कार्यभार सौप कर अलग हो गया।
जब मैंने पहली बार अमर उजाला
संभाला तो बरेली से 125 प्रतियां बिजनौर
आती थीं। बिजनौर के वरिष्ठ पत्रकार और एक
मात्र न्यूज पेपर एजेंट जीएस सेठी के बेटे
प्रदीप सेठी के पास एंजेसी थी। 50 अमर उजाला
बिकते। बाकी रद्दी होते। कौसर
रहमानी प्रदीप सेठी के हाँकर थे। ये ही अखबार
बांटते थे। आज ये बिजनौर के अखबार के बड़े एजेंट हैं।
बिजनौर के आज के अमर उजाला के सोल
एंजेट दिनेश शर्मा भी हाँकर होते थे। मैंने इन्हें बढाया। आज ये बड़े मुकाम पर हैं।
अमर उजाला बरेली से रात में तीन बजे के आसपास आ जाता था। दिल्ली
से आने वाले नवभारत टाइम्स और
हिंदुस्तान जनपद में आने वाले बड़े अखबार थे। किंतु ये
नौ बजे के आसपास बिजनौर आते ।इसके बाद अखबार बंटने शुरू होते। बिजनौर में
सारे अखबार रेलवे स्टेशन पर आते। रेलवे स्टेशन शहर के एक किनारे पर था।
मैंने इस व्यवस्था में सुधार करना तै किया।
अमर उजाला मैंने शहर के बीच रोडवेज बस स्टेंड पर मंगाना शुरू किया।हाँकर सवेरे
पांच− छह बजे के आसपास घर से निकलते ।अमर उजाला रोडवेज से उठाते। अमर उजाला को
बांटते स्टेशन जाते। जब तक दिल्ली का अखबार आता तब तक आधे शहर में अमर उजाला बंट
जाता। इधर अमर उजाला ने अपनी टीम बढार्इ। धामपुर में विजय शर्मा और
हल्दौर में ब्रजराज शर्मा पुराने साथी थे। अफजलगढ़ में राजेंद्र सिंह चौहान अमर
उजाला से जुड़ गए। अखबार भी खुद ही बंटवाने लगे। नजीबाबाद में शिवचरन सिंह
जाखेटिया जी ने मोर्चा संभाला। किरतपुर से विश्वास गिरि जुड़
गए।दिल्ली के अखबारों ने इस और ध्यान नहीं दिया। उन्होंने स्थानीय कवरेज पर ज्यादा ध्यान
नही दिया।
हालत यह रही कि जब अमर उजाला जिले में नए− नए रिर्पोटर खोज कर
रख रहा था, तब हिंदुस्तान और
नवभारत के रिपोर्टर एक स्थानीय अखबार के
मालिक के पुत्र होते थे। वह अपने यहां
आर्इ कुछ अच्छी खबर दोनों अखबार को टाइप कराकर भेज देते थे।
परिणाम यह हुआ कि अमर उजाला लोकप्रिय होने लगा।धीरे
– धीरे स्थानीय खबर की बदौलत अमर उजाला बढ़ता
चला गया।
नवभारत तो बहुत कम हुआ। हिंदुस्तान अपने
बाजार भाव के कारणा व्यापारियों में पकड़ बनाए रखा। उसके संपादकीय पेज का भी जवाब
नही था। गोपाल प्रसाद व्यास के दो कालम यत्र− तत्र −सर्वत्र ओर नारद जी खबर लाए हैं, बहुत ही लोकप्रिय थे। धीरे− धीरे दोनों
अखबार बिजनौर आने बंद हो गए। हिंदुस्तान दुबारा आया। नए कलेवर में, पर पहले सी
पकड़ नही बना सका। नवभारत तो दुबारा बिजनौर आया ही नहीं।
अखबार को बढ़ाने को मैंने एजेंसी ले ली
अमर उजाला नई एंजेंसी बिना सिक्युरिटी नहीं देता था। अखबार कैसे बढ़े। ये
सोच मैंने अपने नाम से एजेंसी ले ली। एक तरह से सैंटर सा चला दिया। मैं हाँकर का
अखबार का पूरा कमीशन देता। बचा सारा अखबार
वापस ले लेता।इससे नए− नए हाकर तैयार होते गए।
मुझे
ये लाभ मिला कि मैं हाँकर को अखबार
देने के लिए रात में तीन बजे उठकर रोडवेज जाने
लगा। तबियत खराब होने पर ईसीजी
कराया। डाक्टर ने कहा− हार्ट में चैंजिंग आ रही हैं। ध्यान दो।मैं अखबार हॉकर को
सौंपकर पांच बजे के आसपास घूमने इंदिरा पार्क
चला जाता। मेरे एजेंसी लेने से दो लाभ लगे। अमर उजाला बढ़ने लगा। मेरा
पांच− छह किलो मीटर नियमित घूमना होने लगा। ये चलता रहा। कुछ साथियों ने सलाह दी।
पूरा कमीशन एजेंट को मत दो। एक दो पैसा प्रति कापी अपने पास रखो। मुझे इससे
कोर्इ लालच तो था नहीं , सो ऐसा किया नहीं।
एक प्रसार व्यवस्थापक कमलेश दीक्षित आ गए। वे दबाव देने लगे कि मैं प्रसार
की एजेंसी चला रहा हूं तो सिक्योरिटी जमा करूं। मैंने उन्हें समझाया भी । कहा
कि मैं अपने लाभ के लिए इसे नहीं चला रहा
हूं। अखबार के लाभ के लिए है। वे महानुभाव नही माने। मैंने एजेंसी बंद कर दी।
−−−−−−
पत्रकारिता की भूली बिसरी
कथाएं --
जब बढ़ापुर के पत्रकार
शराफत हुसैन का कत्ल होते बचा
बिजनौर में पुलिस अधीक्षक
दिलीप त्रिवेदी का समय था।वह एक ईमानदार अधिकारी का कार्यकाल था। उनके कुछ किस्सेे
आज भी याददाश्त से नहीं निकलते। जबकि अब वह सीआरपीएफ के डीजी पद से सेवानिवृत हो
चुके हैं।त्रिवेदी जी का
आदेश था कि डांस कंपनी नहीं
चलेंगी। बढ़ापुर से उस समय 'अमर
उजाला' के लिए शराफत हुसैन कार्य कर रहे थे। वहां डांस कंपनी चल रही थी।शराफत हुसैन द्वारा भेजी गयी रिपोर्ट हमने फोटो के साथ छापी। दिलीप त्रिवेदी साहब ने
छापा लगवाया। चलती कंपनी पकड़ ली गयी। मजबूरन थानाध्यक्ष महोदय को उसे बंद कराना पड़ा। उनका
बहुत आर्थिक नुकसान हुआ।
एक ईमानदार अधिकारी की नजर
में इमेज भी खराब हुई।शराफत कम्युनिष्ट पार्टी से जुड़े थे। वे पुलिस की ज्यादती
समय- समय पर उठाते रहते थे।ईद से पहली रात को मैं आराम से सोया था। तीन बजे दरवाजा खड़कने पर आंख खुली । बढ़ापुर के दो
कम्युनिष्ट साथी थे। मैँ उन्हें रात को तीन बजे देख कर चौंका ।उन्हें बैठाया। ठंड थी। वे दोनों कंबल लपेटे थे।उन्होंने
बताया कि आज ईद की नमाज पढ़ने जाते समय शराफत का कत्ल हो
जाएगा। थानाध्यक्ष ने जिन तीन बदमाशों को इसके लिए तैयार किया है। इनमें से एक की माँ ने यह बात शराफत की मां को बता
दी है।मैँ नींद में था। मेरी समझ में नही आ रहा था कि क्या हो रहा है?मेरी
पत्नी निर्मल चाय बना लायीं। चाय पीते समय मेरी समझ में आया कि मामला कुछ गंभीर है। उनके जाने पर निर्मल बोलीं---बढ़ापुर से ये एक
बजे चले होंगे। ।तब तीन बजे आए। इतनी ठंड में ।मामला बहुत गंभीर है।
उस समय लैंड लाइन फोन
थे।पांच बजे के आसपास मैने दिलीप त्रिवेदी साहब को फोन किया। वे बोले --सब ठीक तो है? इतनी जल्दी?
मैंने उनको पूरी बात बतायी।
उन्होंने कहा - चिंता मत करो। पता लगा कि उन्होंने सीओ नगीना को वायरलैस पर फौरन
बताया कि आज ईद की नमाज पढ़ने जाते समय बढ़ापुर के पत्रकार शराफत हुसैन का कत्ल होना है। बढ़ापुर के एस. ओ. ने बदमाशों के साथ ये प्लॉन किया है। आप तुरंत बढ़ापुर जाएं और शराफत की सुरक्षा करें।अगर उसे कुछ होता है तो वहां के थानाध्यक्ष को गिरफ्तार कर जेल भेज
दें।
बढ़ापुर एसओ ईदगाह जाने के
लिए तैयार हो रहे थे। हैड मोहर्रिर ने ये मैसेज सुना। भागकर एसओ को बताया। एसओ
नहाना - धोना सब भूल गए। जल्दी तैयार होकर अपने दफ्तर पहुंचे।
इतनी देर में सीओ नगीना पहुॅच गए।सीओ नगीना के रूख को देखकर थानाध्यक्ष महोदय घबरा
गए। पहले वह शराफत को मरवाना चाहते थे। अब उसकी सुरक्षा में लग गए। ईद ठीक बीत गई। शराफत साहब का बाल भी बांका नहीं हुआ। दिलीप त्रिवेदी साहब के पास मेरा शाम को जाकर
बैठना होता था। शाम को गया तो उन्होंने सारी कहानी बतायी।
इसके बाद शराफत साहब उस
स्थान से बाहर चले गए। उन्होंने चीनी मिल नजीबाबाद में लंबे समय तक कार्य किया ।
अब वे सेवानिवृत हो भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी माकपा की राजनीति कर रहे हैं। आज
संचार तंत्र बहुत विकसित हो गया है पर फिर भी यदि आज का युग होता तो आप फोन करते रहते, कोई अधिकारी अटैंड भी नहीं करता। बदमाश अपना काम कर
चुके होते ।
पत्रकारिता की भूली बिसरी
कथाएं -
--प्रदीप जैन पर हमला
वर्ष 1995 । मैं श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के पांडिचेरी
सम्मेलन में भाग लेने परिवार सहित गया था। 25 दिन के
अवकाश पर निकला था । सफर में पता चला कि नगीना के हमारे साथी पत्रकार प्रदीप जैन
को पुलिस ने पकड़ लिया है। पूरे शहर में पिटाई करते हुए जुलूस भी निकाला गया ।
तमंचे के साथ उनकी गिरफ्तारी दिखा दी गयी है।प्रदीप जैन नगीने की अपनी ठसक के लिए
मशहूर थे ।सम्मान बहुत था। यदि कहीं प्रशासन उन्हें ले जाता तो एसडीएम की गाड़ी
में प्रदीप जैन अकेले जाते। एसडीएम सीओ की गाड़ी में होते। नगीना में प्रदीप ने
अलग तरह की पत्रकारिता पैदा की।अलग हटकर पत्रकारिता की।
इंस्पेक्टर की वहां के
लाटरी माफियाओं उठ-बैठ थी।ये माफिया प्रदीप जैन से नाराज थे।उन्हें सबक सिखाना
चाहते थे।
मैं लखनऊ पहुॅचा तो ऑफिस के
साथी शैलेंद्र का फोन आया। अतुल जी (अमर उजाला के मालिक अतुल माहेश्वरी जी) का
आदेश है कि तुंरत बिजनौर आओ। कई दिन का अवकाश बकाया था। परिवार का लखनऊ घूमने का
मन था। मैंने भी ढंग से कभी लखनऊ नहीं देखा था।मैंने अतुल जी से बात की। उन्होंने
कहा कि हमारे रिपोर्टर के सम्मान का मामला है। नगीने का इंस्पैक्टर हटना चाहिए।
मैंने पुलिस अधीक्षक निरंजन लाल से फोन पर बात की। मेरी उनसे अच्छी उठ -बैठ थी।
उन्होंने कहा कि इंस्पैक्टर से ज्यादा वहां का सीओ बदमाश है। पहले वह हटेगा। फिर
इंस्पैक्टर। कल तक सीओ हट जाएगा। इसके बाद इंस्पैक्टर भी हट जाएगा। मैंने एसपी से
हुई बात अतुल जी को बता दी। बच्चों की नाराजगी के बावजूद मैं बिजनौर लौट आया।मेरे
बिजनौर आने से पहले ही सीओ हट चुका था। उससे अगले दिन इंसपेक्टर नगीना हटे।
प्रदीप जैन को प्रताड़नाएं
देने के बाद उनका हत्या के प्रयास (307) का झूठा मुकदमा दर्ज कर बिजनौर जेल तो भेज दिया।अगले दिन यह खबर
समाचार पत्रों में छपने के बाद बिजनौर समेत आसपास के कई जिलों(जिनमें वर्तमान के
उत्तराखंड के क्षेत्र भी)के पत्रकार एकजुट होकर बिजनौर में एकत्र हुए। जिला
मुख्यालय पर विशाल विरोध प्रदर्शन हुआ।
पत्रकारों की एकता व दबाव
को देखकर तत्कालीन मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप के बाद जिले के तत्कालीन पुलिस
अधीक्षक ने अपर पुलिस अधीक्षक को नगीना भेजकर जांच कराई । पुलिस द्वारा दर्ज किए
गए मुकदमे को वापस लिया।पत्रकारों की एकता के कारण ही प्रदीप जैन दो दिन बाद ही
जेल से छूटकर आ गए। सीओ ओर इन्स्पेक्टर के हटने से सारे में संदेश गया कि अमर
उजाला के रिपोर्टर के साथ ज्यादती की थी, इसलिए
हटे। बिजनौर आकर मैं निरंजन लाल जी से मिला। उन्हें धन्यवाद दिया।
पत्रकारिता की भूली बिसरी
कहानी -
बिजनौर में रामलीला मैदान
में भाजपा के वरिष्ठ नेता अटल विहारी बाजपेयी जी की सभा थी। उस दिन अचानक रेहड़
के पत्रकार साथी अशोक कुमार शर्मा आ गए। बोले- पुलिस के एक दरोगा को मकान किराए पर दे दिया था। उसका तबादला हो गया
किंतु वह मकान खाली नहीं कर रहा।
मैंने पूरी बात सुनी। उन्हें सभास्थल पर अपने साथ ले गया। मुझे उम्मीद
थी कि वहां एसपी साहब मिलेंगे।पुलिस अधीक्षक उस समय दिलीप त्रिवेदी जी ही थे। वह
कार्यक्रम स्थल पर बाहर ही मिल गए। मैंने अशोक शर्मा जी को
उनसे मिलवाया। उन्होंने समस्या सुनी। कहा कि एक सप्ताह में मकान खाली हो जाएगा। एक
सप्ताह की बात सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ।
इसपर उन्होंने कहा कि कल बरेली में आईजी की मीटिंग है। मुझे उसमें
जाना है। आई
जी साहब से कहकर इस दरोगा का बरेली जनपद में तबादला करा
दूंगा। आर्डर आने के बाद तुरंत उसे रिलीव कर दिया जाए्गा।ऐसे में वह
स्वतः मकान खाली कर जाएगा। या करा दिया जाएगा। ऐसा ही हुआ भी।
ऐसा ही मकान का एक मामला मेरे मित्र रज्जी खन्ना उर्फ राजकिशोर
खन्ना का फंसा। स्वर्गीय रज्जी खन्ना की मुख्य डाक घर के सामने जोली
टीवी नाम से दुकान
थी। जैन मंदिर के पास डाक्टर दीपक के क्लिनिक के ऊपर का एक पोर्शन खाली था। पुलिस
के एक हैड कांस्टेबिल ने
इसे किराए के लिए मांगा। रज्जी खन्ना ने उस समय के हिसाब से किराया
काफी ज्यादा, पांच
हजार रुपये के आसपास प्रतिमाह बताया। सही राशि मुझे अब याद नहीं। वह मकान में आकर रहने
लगा। एक महीना बीता ।दो महीने बीते। उसने रज्जी खन्ना को किराया नहीं दिया।
किराया मांगा तो बोला
कि मै तुम्हारे
मुहल्ले की
सुरक्षा कर रहा हूं। तुम खुद मुझे इसके लिए 20 हजार
रूपये महीना दो। मामला
चलता रहा। उसका अम्हेड़ा चौकी केे लिए तबादला हो गया। वह अपना सामान तो ले गया
किंतु मकान से ताला नही खोल कर गया। रज्जी खन्ना से कह गया कि मेरी बंदूक रखी है।
ताला मत तोड़ लेना।
यह सुन रज्जी खन्ना हक्के - बक्के रह गए। वे
थे तुनक
मिजाज। भ्रष्टाचार विरोधी एक संगठन भी चलाते थे। जरा जरा सी बात पर गुस्सा आ जाता
था।उन्होंने आव देखा न ताव । इस घटना का इश्तहार छपवाया।
शहर में बंटवा दिया। एसपी को भी दे आए। मामला नहीं निपटा। हमारे पत्रकार साथी
शिवकुमार शर्मा जी
उनके पास बैठते थे। शिवकुमार जी ने यह कहानी मुझे बताई। हल्दौर के
थानाध्यक्ष बल्ले सिंह हमारे मित्र थे।अम्हेड़ा चौकी उनके अधीन थी।वे जब भी बिजनौर
आते थे तो मुझसे जरूर
मिलते थे। मैने
समस्या उन्हें बताई। उन्होंने कहा कि मामला निपट जाएगा। एक दो दिन बाद उन्होंने उस
दीवान से लेकर मकान की चाबी मुझे भिजवा दी। तब मैंने कहा - रज्जी भाई मकान देते
समय देख तो लेते कि लेने वाले की हालत किराया देने की है भी या नहीं। मकान ऐसे
ही ,बिना
सोचे समझे किसी को भी किराये पर देना उचित नहीं है । फालतू के लफड़े लेते हो।
पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी
जब देहरादून प्रशासन ने मुझ पर लगानी चाही
एनएसए---
कौन? कब? , यहाँ पर काम आ जाता है, कुछ पता नहीं चलता। हम सोच भी नहीं सकते कि ऐसा
भी हो सकता है। ऐसा मेरे साथ तो कईं बार हुआ। कवि मनोज अबोध मेरे छोटे भाई की तरह से
हैं। उनकी पत्रकारिता में रुचि शुरू से ही रही है। उत्तर भारत टाइम्स में काम करने
के दौरान उनकी ,पोस्ट आफिस में नौकरी लग गई। सरकारी नौकरी के बाद भी उनका मन
पत्रकारिता में रमा रहा। अपना शौक पूरा करने के लिए मनोज ने 'मंथन फीचर' नाम से फीवर सर्विस शुरू की। संपादक अपनी पत्नी
इंदु भारद्वाज को बनाया।उसने मुझ से एक लेख मांगा। उस समय उत्तरांचल आंदोलन जोरों
पर था। समय की मांग देखते हुए मैने इस आंदोलन के समर्थन में एक लेख लिख दिया। मनोज
ने उसे संपादित किया। समाचार पत्रों को भेज दिया। उसने भेजी प्रति मुझे दिखाई।
मैंने देखा कि उसमें एक वाक्य गलत हो गया है । यह वाक्य पहाड़ के रहने वालों के
लिए भारी आपत्ति जनक था।मैंने उसे गलती से अवगत कराया। मनोज ने जब तक संशोधन भेजा
तब तक विश्व मानव सहारनपुर में लेख छप चुका था।
लेख छपने के बाद पहाड़ के रहने वालों में गुस्सा
होना स्वभाविक था। सो अगले दिन अखबार लेकर गई विश्व मानव की टैक्सी और अखबार को
देहरादून में जला दिया गया। मेरे और विश्वमानव के खिलाफ प्रदर्शन हुए। विश्वमानव
सहारनपुर के संपादक और मेरी गिरफ्तारी की मांग को लेकर आंदोलन हुए। दोनों पर
रासुका लगाने की मांग हुई।
मेरे खिलाफ मुकदमा दर्ज होने की सूचना देहरादून
अमर उजाला से मेरठ आयी। मेरठ में उस समय डेस्क पर मेरे छोटे भाई जैसे सुभाष गुप्ता
कार्यरत थे। उन्होंने वह सूचना टैक्सी से मुझे भिजवा दी। चिंता होना स्वभाविक
था।उस समय एच के बलवारिया बिजनौर में एसपी थे। के के सिह डीएम ।
हमारी मित्र मंडली के एक साथी हैं। हुकम सिंह ।
पेशे से वकील हैं। कचहरी में बैठते हैं। मिलना कम होता है। पर होता रहता है। वे
बलवारिया साहब के कैंप आफिस पर किसी काम से गए थे। बलवारिया साहब किसी काम में
व्यस्त थे। स्टेनो ने उन्हें अपने पास बैठा लिया। इसी दौरान घंटी बजी। अर्दली ने
स्टेनो से कहा साहब बुला रहे हैं। स्टेनो बलवारिया साहब के कक्ष में चले गए। हुकम
सिंह ने स्टेनो की मेज पर नजर दौड़ाई तो स्टेनो की मेज पर डीएम देहरादून
का ,बिजनौर के डीएम और एस पी के नाम वायरलैस मैसेज पड़ा दिखा। इस मैसेज
में मुझे एनएसए में निरूद्ध् करने का अनुरोध किया गया था। हुकम सिंह धीरे से इस
पत्र की नकल कर लाए। उन्होंने ये नकल हमारे पत्रकार साथी वीरेश बल को दी। वीरेश
बल ने मुझे बताया ।मैं, वीरेश बल, शिव कुमार शर्मा राजेंद्र पाल सिंह कश्पय साहब
के पास गए।
राजेंद्र पाल सिंह उस समय दैनिक उत्तर भारत
टाइम्स के संपादक थे। बिजनौर मुख्यालय पर पीटीआई सहित कईं अंग्रेजी दैनिक के रिपोर्टर भी थे। एक तरह
सेहमारे अभिभावक थे।उनसे बातचीत हुई। तय हुआ कि डीएम और एसपी से मिला जाए।हम लोग डीएम के के
सिंह से मिले। मदद की बात की। केके सिंह प्रमोशन ने डीएम बने थे। देहरादून के डीएम
सीधे आईएएस थे। के के सिंह ने साफ मनाकर दिया । कहा कि वहां के डीएम ने लिखकर भेजा
है। मैं इसमें कुछ भी मदद नहीं कर सकता।
हम सब बलवारिया साहब से मिले। उनसे हम लोगों की
उठ -बैठ ठीक थी। उन्होंने मेरे से कहा कि एनएसए लगना आपके लाभ में है। आप
गिरफ्तार होते ही हीरो बन जाओगे। देश भर में प्रदर्शन होंगे। मुख्यमंत्री और
प्रधानमंत्री निवास तक शोर मचेगा। दो तीन दिन में छूट जाओगे,पर मैं आपको हीरो नहीं बनने दूंगा। मैंने डीएम
और एसपी देहरादून से कह दिया है कि हमारे यहां अशोक मधुप की इमेज बहुत अच्छी है।
उनके किसी समाचार लेख से यहां कभी कोई विवाद नहीं हुआ। आपके यहां हुआ है। आप एनएसए
का वारंट बनाकर भेज दें। मैँ तामीज करा दूंगा। मेरे यहां कुछ नहीं है, इसलिए अपने यहां से वारंट नही बनाऊंगा। उन्होंने
कहा कि मैने बता दिया है कि पत्रकार का मामला है, एक दिन बाद ही देश भर में हंगामा मचेगा। आप
करोगे आप झेलोगे।
पत्नी निर्मल भी मानसिक रूप से तैयार हो
गईं।उन्होंने मुझे समझाया जो होगा।देखा जाएगा।चिंता मत करो ।हम जॉब में
हैं।परेशानी वहाँ होती है।जहाँ अन्य आय का स्रोत न हो। मैं भी मानसिक रूप से तैयार
होगया।सोचा जेल में आराम से पढ़ा लिखा जाएगा।चिंतन होगा।
पर समय इसके लिए तैयार नहीं था।
एनएसए टल गई। पर पता लगा कि मेरे और संपादक
विश्व मानव सहारनपुर के विरूद्ध 295ए में देहरादून में मुकदमा दर्ज है।समाज में
साम्प्रदायिक भावना भड़काने का। विश्वमानव की ओर से भी उसकी टैक्सी में आग लगाने , नुकसान होने आदि का मुकदमा दर्ज कराया गया था
।देहरादून वाला मुकदमा भी सहारनपुर भेज दिया गया ।
सहारनपुर में सुंदर लाल मुयाल एडीएम होते थे। पहले ये बिजनौर भी डीडीओ और एडीएम रह गए थे। वर्धमान कॉलेज के के प्रवक्ता ओ पी गुप्ता जी जनसत्ता के संवादादाता हैं। गुप्ता जी की अधिकारियों के साथ निकटता जगजाहिर थी। सुंदर लाल मुयाल जी से भी उनकी घनिष्ठता थी। मैँ और ओपी
गुप्ता जी दोनों सहारनपुर गए। विश्वमानव पहुंचे तो वहां बढ़ापुर के साथी शराफत हुसैन मिले। उन्होंने अपने
साहित्य संपादक से मिलवाया। साहित्य संपादक का नाम अब याद नहीं। उन्होंने कहा कि आपका लेख बिल्कुल सही था। उसमें कुछ गलत नहीं था। वे गढ़वाल का गजेटियर
पेश कर सकते हैं।
खैर! कुछ देर वहां रुके। शराफत बाहर तक छोड़ने
आए।यहां से हम मुयाल साहब के पास गए। उहोंने केस के आईओ को बुला रखा था।
आईओ ने कहा कि क्रास केस है। खत्म करने के आदेश हैं। मुयाल साहब ने कहा कि आज ही
खत्म कर के एफआर की प्रति शाम तक मुझे पहुंचा दें। एक दो-दिन बाद उन्होंने एफआर की प्रति हमें
भिजवादी । इस तरह इस प्रकरण का समापन हुआ। बहुत तनाव रहा।पर सुभाष गुप्ता जी,हुक्म सिंह जी,वीरेश बल जी, ओपी गुप्ता जी सुन्दर लाल मुयाल जी इस प्रकरण को निपटाने में
बहुत मददगार रहे।
−−−−
पत्रकारिता जीवन की भूली
बिसरी कहानी
जब सलूजा पर हुआ हमला ।उनपर
ही दर्ज हुआ हत्या का मुकदमा
11 मार्च 19 94 । बिजनौर सूचना आई कि धामपुर में अमर उजाला के पत्रकार महेंद्र
सलूजा के खिलाफ धारा 302 में मुकदमा दर्ज हुआ है। कुछ लोगों से सलूजा को
हमला कर घायल कर दिया है।मैँ और वरिष्ठ साथी जनसत्ता संवाददाता ओपी गुप्ता जी
टैक्सी कर धामपुर पंहुच गए। यहां के के शर्मा इंस्पैक्टर थे। के के शर्मा अलग तरह
के पुलिस अधिकारी रहे। ऐसे अधिकारी जो बड़े - बड़े अधिकारी के दबाव के आगे भी नहीं
झुके। वे दंगा रोकने के स्पेशलिस्ट थे। संभल दंगों के लिए मशहूर था। वे संभल में
छह साल तैनात रहे। जबकि तीन साल से ज्यादा पुलिस अधिकारी का एक स्थान पर तैनाती का
नियम नहीं था।के के शर्मा हमारे बहुत नजदीक थे। सलूजा धामपुर थाने में ही मिले।
डीएम अशोक कुमार चतुर्थ और कप्तान निरंजन लाल भी मौजूद थे। पता लगा कि एक दलित
युवक को कहीं से सांप मिल गया था। युवक नसेड़ी था।वह उससे खेल रहा था। जैतरा के
पास तालाब में उसे एक और सांप मिल गया। वह उससे भी खेलने लगा । तालाब में मिला
सांप जहरीला था। उसने एक दो जगह काट लिया । पर ध्यान नहीं दिया। सलूजा को पता चला
। वे मौके पर गए। फोटो खींचे। इसी दौरान थाने के दरोगा रविंद्र कुमार भी दो सिपाही
के साथ मौके पर आ गए।उन्होंने समझाया। युवक की समझ में नहीं आया। काफी भीड़ एकत्र
थी। सांप से खेलते युवक की मौत हो गई। युवक के परिजनों को लोगों ने चढ़ा दिया।
यहां कि अखबार वाले फोटो खींचकर ले गए हैं । ये अखबार में छापेंगे। तो तुम फंस
जाओंगे। महेंद्र सलूजा सरदार हैं। सरल हैं। दिन रात सड़क पर घूमने वाले कबीर
परम्परा के पत्रकार।युवक के परिवार जनों से सलूजा को पकड़ लिया। उसे बुरी तरह
मारा- पीटा। पकड़ कर थाने ले आए। सलूजा, दरोगा
रविद्र सिंह थाने के दो सिपाही सहित कई लोगों के खिलाफ आई पीसी की धारा 147, 302, 323 के अंतर्गत मुकदमा लिखाया कि इन्होंने षडयंत्र कर
उनके परिवार जन को मारा। वह सांप से खेल रहा था। तालाब में दूसरा जहरीला सांप
दिखाई दिया। इन्होंने एक राय की। दरोगा रविंद्र कुमार ने सांप को लाठी से उठाया।
युवक के गले में डाल दिया। कहा खेल । इससे खेल। ये सांप जहरीला था। इसके काटने से
सांप से खेलने वाले की मौत हो गई।प्रदेश में बसपा की सरकार थी। लगभग एक सप्ताह बाद
मुख्यमंत्री मायावती जी को बिजनौर आना था। अतः दलित नेताओं ने पीड़ित परिवार को
चढ़ा दिया। डटे रहना। इसकी पत्नी को सरकारी नौकरी भी मिलेगी । मुआवजा भी। हम
पंहुचे । बात हुई। डीएम अशोक कुमार ने कहा कि मरने वाले की पत्नी को नौकरी दिलाई
जाएगी। हमने कहा कि हमारे पत्रकार सलूजा पर हमला हुआ है। उसे क्या मिलेगा? डीएम ने कहा कि पांच हजार रुपये दिए जाएंगे।हम सलूजा के इलाज के लिए
बिजनौर को लेकर चलने लगे । एसपी निरंजन लाल ने कहा कि उपचार करा कर भिजवा देना।
मैंने कहा कि हम माने की सलूजा मुलजिम है? इस पर
इंस्पैक्टर के के शर्मा ने कहा कि कोई जरुरत नहीं। सलूजा मुलजिम नहीं हैं। आप जहां
चाहें ले जांए। जहां रखे। निरंजन लाल अलग तरह के अधिकारी थे। पर के के शर्मा के
सामने वे कुछ नहीं बोले।हम सलूजा को इलाज के लिए बिजनौर को लेकर चलने लगे । एसपी निरंजन लाल ने कहा कि
उपचार करा कर भिजवा देना। मैंने कहा कि हम माने कि सलूजा मुलजिम है? इस पर इंस्पैक्टर के के शर्मा ने कहा कि कोई जरुरत नहीं। सलूजा मुलजिम नहीं हैं। आप जहां चाहें ले जाएॅ। जहां रखे। निरंजन लाल अलग तरह के अधिकारी थे। पर के के शर्मा के सामने
वे कुछ नहीं बोले।
हम सलूजा को बिजनौर ले आए।
जिला अस्पताल में भर्ती
करा दिया।अगले दिन डीएम अशोक कुमार को अस्पताल ले जाकर सलूजा को पांच हजार रुपये
दिलाए। रुपये देते फोटो खिंचाया। साथी कुलदीप सिंह ने कहा कि ये फोटो अखबार में छपना चाहिए
ताकि लगे कि ये मुलजिम नहीं हैं। हमने फोटो छपने भेज दिया।
डेस्क् को फोन कर कहा । तो
उन्होंने कहा कि आलोक भदोरिया जी को बता दो। भदोरिया जी प्रदेश प्रभारी होते
थे।उनसे फोटो छापने का अनुरोध किया।
सुबह फोटो अखबार में नही
था। मैने डैक्स के साथी से पूछा । उसने कहा कि पेज पर लग चुका था। आपके फोन करने पर आलोक भदौरिया जी ने रुकवा दिया।
मैने एडमिन के साथी राजीव
धीरज से बात की । धीरज स्योहारा से हैं। स्योहारा में मेरे अधीन अमर
उजाला के रिपोर्टर होते थे। फिर मेरठ चले गए। मैने उन्हें किस्सा सुनाया और कहा - इस्तीफा भेज रहा हूँ । उन्होंने कहा कि मेरठ के
डैस्क इंचार्ज राजेंद्र त्रिपाठी जी को बता दो। बाद के अमर उजाला मेरठ के संपादक रहे
राजेंद्र त्रिपाठी उस समय क्राइम रिपोर्टर और डेस्क प्रभारी होते थे। देर से सोए होंगे। मैंने उन्हें फोन कर स्थिति बता दी। कहा कि टैक्सी से इस्तीफा
भेज रहा हूं।
अतुल जी के रहने के टाइम
में मैं नाराज होकर साल में एक -दो बार इस्तीफा भेज देता
था। वह बुलाकर मना लेते थे।
दुपहर एक बजे अतुल जी का फोन आया। लोगों को सोने भी नहीं देते । मेरठ आइये।
मैँ और साथी कुलदीप सिंह अखबार की टैक्सी से मेरठ चले गए। उन्होंने हमारी आराम से बात सुनी।आलोक
भदोरिया को बुलाया। फोटो न छापने का कारण पूछा। वे कोर्इ सही उत्तर नहीं दे सके। अतुल जी ने उनसे कहा कि
जिले में बैठकर ब्यूरो प्रमुख को वहां के हालात से काम करने पड़ते है। इसलिए उनकी सुनिए। उसी के हिसाब से काम करिए। फोटो सुबह के अखबार में छप जाना चाहिए।और इस तरह वह फोटो छप गया।
मुख्यमंत्री मायावती बिजनौर आयीं। चलीं गईं। इस प्रकरण का जिक्र भी नहीं हुआ। 11 मार्च
1994 को दर्ज मुकदमा एक माह बाद 12अप्रैल 94 को खत्म हो गया। सलूजा पर हमले की आशंका को देख एसपी ने उन्हें तीन
-तीन माह के लिए एक −एक सशस्त्र गार्ड दिया। तीन माह के बाद मंडलायुक्त की संस्तुति से इनके पास तीन माह
और गार्ड रहा।
सलूजा फक्कड़ रहे । शुरू से
लेकर । अब भी ऐसे ही हैं। गार्ड रहा। कोई वाहन तो था नहीं। सलूजा जी दिन भर साइकिल पर लिए घूमते। कभी सलूजा
साइकिल चलाते । कभी गार्ड।।सलूजा जी आज अमर उजाला में नहीं हैं,पर सरलता वैसी ही है।
पत्रकारिता जीवन की भूली
बिसरी कहानी -
एक नेक्सलाइड के साथ बाढ़ में एक दिन
आज देश के कई भाग में नेक्सलाइड का जोर है।
सुरक्षा दलों पर ये घात लगाकर हमला करते रहें हैं। इस माहौल में सन् 84 के आसपास का एक नक्सली नेता के साथ बाढ़ में एक दिन बिताने का संस्मरण
याद आ रहा है।
कॉलेज के समय से मैं
मार्क्सवादी कम्युनिष्ट आंदोलन से जुड़ गया था। इसी दौरान वामपंथी आंदोलन की अलग
-अलग विचारधाराओं से परिचय हुआ।कुछ समय शिक्षण कर पूर्णकालिक पत्रकारिता से जुड़
गया। लगभग 45 साल पूर्व अमर उजाला से जुड़ा। 80 के आसपास मैं घर से समाचार भेजता था। घर ही एक तरह से मेरा कार्यालय था।
एक दिन कुर्ता पायजामा पहने
कंधे पर थैला लटकाए एक साहब घर आए। उन्होंने अशोक कुमार के रुप में अपना परिचय
दिया। अपने को सीपीआईएमएल की प्रदेश कार्यकारिणी का सदस्य बताया। सीपीआईएमएल भारत
की कम्युनिष्ट पार्टी मार्क्सवादी लेलिनवादी है।इसके कई भाग हो गए। अधिकतर सत्ता
प्राप्ति के लिए सशस्त्र
आंदोलन के रास्ते पर निकल
गए। इन्हे की नेक्सलाईड कहा गया । अपने घर पर एक नेक्सलाईड को देख कर अचकचा
गया। लगा कि इसके बैग में हैंड ग्रेनेट या स्टेनगन हो सकती है। मेरे दिमाग में
नेक्सलाइड की यही छवि थी। खैर कुछ देर मुझे सामान्य होने में लगे। अशोक से बातचीत
हुई। वह मेरे ही जनपद के रानीपुर गांव के रहने वाले हैं। बाद में उससे अच्छी
दोस्ती हो गई। वह यदा - कदा आने लगे। अशोक मंडावर के गंगा खादर क्षेत्र में अपना
संगठन बना रहा थे। इसी दौरान गंगा में बाढ़ आ गई। गंगा बहुत तबाही कर रही थीं। अशोक
ने कहा कि गंगा बहुत तबाही कर रही है। चलो बाढ़ घुमाता हूं।
मुझे बाढ़ में जाने का कोई
अनुभव नहीं था। तै हो गया कि अगले दिन सबेरे सात बजे मंडावर बस स्टैंड पर मिलेंगे।
मुझे ध्यान नहीं था,कि अगले दिन तीज का पर्व है। बाढ का भी कोई अनुभव नही था। ये ही दिमाग में भी कि गंगा किनारे
जांऊगा। एक डेढ़ घंटे में देखकर लौट आउंगा।पत्नी निर्मल से नौ बजे तक आने को मैं
कहकर कैमरा लेकर घर से निकल गया। अशोक मुझे मंडावर मिले। उसके साथ बैलगाड़़ी में
बैठकर गंगा के किनारे बसे गांव डैबलगढ़ पहुंच गया। यह गांव अंग्रेज कलेक्टर डैबल
द्वारा बसाया गया ब्रिटीशकालीन गांव हैं।
यहां नाश्ताकर हम नाव से
बाढ़ देखने चल दिए। गंगा का जल पूरे उफान पर था। बड़े -बडे़ पेड़ पहाड़ों से बहकर आ
रहे थे। गंगा की धार की जोरदार आवाज से ही डर लग रहा था। मुझे तैरना नहीं आता ।एक
बार ज्योतिषी ने कहा था कि पानी से बचना। पानी में ले जाने वाले को अपना दुश्मन
मानना। पानी में किसी के साथ नहीं जाना। गंगा की तेज उठती पटारों को देखकर मुझे डर
लग रहा था। ऐसे में ज्योतिषी की बताई इस बात के याद आने पर मेरा डर और बढ़ गया। नाव
में अशोक उनकी पार्टी का स्टेट सेकेट्री और लगभग एक दर्जन गांव वाले सवार थे। नाव खेवकों को गंगा की धार को पार करना था। अतः वे
नाव को खींचकर धार से ऊपर की साइड में ले गए। ऐसी जगह देखकर कि जहां से नाव पानी
में बह कर दूसरी साइड में सही जगह जाकर लगे।
उन्होंने नाव धार में डाल
दी। वे तेजी से चप्पू चलाकर नाव को दूसरी साइड में ले जाने की कोशिश कर रहे थे।
नाव के दोंनो किनारों के बीच में बीच में छेद करके मोटे रस्से बांधे गए थे। इन
रस्सों में चप्पू फंसे थे। खेवक इन्हीं रस्सों में चप्पू चलाकर नाव नियंत्रित कर
रहे थे।नाव धार के बीच पहुंची थी कि चप्पू को रोकने वाली दांई एक साइड की रस्सी
टूट गईं। चप्पू के रस्सी के फंदे से बाहर होते ही नाव दूसरी साइड को वह चली।
नाविकों का कंट्रोल नाव से खत्म हो गया।नाव में बैठे एक युवक ने टूटी रस्सी को
चप्पू के चारों ओर घुमाया ।छेद में टूटा सिरा निकाला और उसे कसकर पकड़कर बैठ गया।
उसने ये काम बहुत जल्दी किया। खेवक ने तेजी से चप्पू चलाना प्रारंभ कर दिया । नाव
संभल गई। अपने गंतव्य की ओर चलने लगी। यहां से हम गंगा के बीच के गांव खैरपुर ,खादर ,लाडपुर लतीफपुर और इन्छावाला आदि गांव पहुंचे।
यहां के रहने वालों ने गंगा की बाढ़ को देख अपने - अपने परिवार मुजफ्फर नगर जनपद के
शुक्रताल नामक स्थान पर पहुंचा दिए थे। शुक्रताल प्रसि़द्ध धार्मिक स्थल हैं। यहां
बहुत सारी धर्मशालाएं हैं। इनमें इनके परिवार रुके थे।इन गांव से शुक्रताल जाना सरल है। पानी को देखकर किसानों ने काफी पशु खोलकर आजाद कर दिए । ताकि वह बहकर अपनी जान बचा लें।कुछ पशु थे तो वह
घुटनों तक पानी में खडे़ थे। हालाकि ग्राम वालों ने गांव और घरों के बाहर के
किनारे मिट् टी और पत्थर लगाकर पानी रोकने के लिए उपाए किए थे फिर भी घरों में दो
फुट तक पानी भरा था। बुग्गी के उपर चूल्हे रखकर खाना बनाने की व्यवस्था की हुई थी।
प्रत्येक घर का एक दो पुरुष सदस्य गांव में रूका था।लोगों से
बात कर फोटो खींच हम यहां से लौट लिए।पानी में जौंक थी। ये आसपास के खेतों के
किनारे की छोटी -छोटी झाड़ियों पर बैठी थीं। तिड़क कर नाव में आ जाती थीं। मुझे इनसे
बचाने को नाव के बीच में पटरे पर बैठाया हुआ था । इसके बावजूद डर लग रहा था। जौंक
एक छोटा कीड़ा होता है। यह आदमी और पशु के शरीर पर लगकर उसका खून चूंसता हैं। छोटा
सा यह कीट खून पीकर काफी बड़ा हो जाता है। नाम में सवार एक दो गांव वालों को यह
लगी। उन्होंने जोक को पकड़ा ।खींचकर छुडाया । पानी में फेंक दिया। खींचने में जौंक
लगने की जगह से खून भी निकलने लगा।
हमें शाम हो गई थी किंतु
नाव नदी में लाने के लिए स्थान नहीं मिल रहा था। नदी में उसी स्थल पर नाव डाली
जाती हैं, जहां नदी और खेत का स्तर बराबर होता है। यहां खेत
नदी से काफी ऊंचाई पर था। ढांग ढूढते अंधेंरा हो गया। इस दौरान डाक मक्खी निकलने
लगीं। यह बहुत खतरनाक काले- नील रंग की मोटी मक्खी होती है। इसके काटने से बड़े पशु तक के शरीर से खून
निकलने लगता हैं।डाक मक्खी और जोक के डर से मैं सहमा और सुकड़ा बैठा था। चांदनी रात
थीं, ऐसे में नाव का सफर बहुत सुहाना और सुखद लग रहा
था। पर गहरे पानी में डूबने ,जौंक और
डाक मक्खी के काटने के डर ने सब कुछ गड़बड़ कर रखा था। घर की भी चिंता हो आई थी।
सबेरे के नौ बजे तक आने को कह आया था । अब रात के आठ बजने को हैं। त्योहार का दिन
होने के कारण पत्नी निर्मल परेशान, मेरे
इंतजार में बिना खाए -पिए बैठीं होगी।रात नौ बजे हम गांव में आकर पड़े । जल्दी
-जल्दी पेट भरा। घर की चिंता दी। मैने खाना खाकर गांव वालों से कहा कि मुझे मंडावर
पंहुचा दें किसी ट्रक आदि से बिजनौर पंहुच जाऊंगा। उन्होंने मनाकर दिया । कहा
-रास्ते में बदमाश लगते हैं। अब जाना ठीक नहीं। घर की चिंता में ढंग से नींद भी
नहीं आई। इस समय फोन होते नहीं थे, जो घर
सूचित किया जा सके।सबेरे जल्दी उठकर मंडावर से पहली बस पकड़कर लगभग नो बजे बिजनौर पंहुचा। घर पर निर्मल का रोते
बुरा हाल था। । निर्मल ने बताया कि वह अभी कुलदीप सिंह के यहां गई थी। मेरे अमर उजाला के दूसरे साथी कुलदीप
सिहं उस सयम मुहल्ले में ही कुछ दूर पर रहतें थे। उनसे एसपी को कहलवाया है। एसपी
ने पूछा -किसके साथ गए है,
तो कुलदीप सिंह बताया कि एक
नेक्सलाइड अशोक है, उसके साथ है। एसपी होशियार सिंह बलवारिया थे। वे
भी बहुत नाराज हुए।
आकर मैने एसपी को फोन किया।
बलवारिया मेरे बहुत अच्छे दोस्त थे। मैंने उन्हें बताया कि मैं आ गया हूं, वह बहुत नाराज हुए। कहा नेक्सलाईड के साथ जाना ठीक नहीं । अभी एनएसए
की फाइल चल रही है। ये और उसमें शामिल हो जाएगा।कई दिन लगे निर्मल का गुस्सा शांत
होने में । उनका गुस्सा इस बात को लेकर था,कि
त्योहार के दिन क्यों गए। हमारा त्यौहार खराब हुआ। बनाया खाना भी बेकार रहा।
छात्रवृति
घोटाला
1993 में
बिजनौर जनपद में हरिजन समाज कल्याण विभाग में घोटाला हुआ। यह लगभग 50 लाख
रुपये का घोटाला था। दो वर्ष पूर्व अनुसूचित जाति के छात्रों के लिए छात्र वृति
देने की सरकार की योजना आई। इसमें व्यवस्था की गई थी कि छात्रवृति विद्यालय के
खाते में जाएगी। इस व्यवस्था की कमी को बिजनौर समाज कल्याण विभाग के एक लिपिक
मोर्य ने पकड़ लिया। उसने जनपद के कुछ विद्यालय के प्रबधंक- प्रधानाचार्य के
दोस्ती गांठी। उनसे कॉलेज के नाम से मिलते -जुलते नाम के खाते खुलवा लिए।विद्यालय
को छात्रवृति न भेजकर विद्यालयों से मिलते -जुलते खातों में राशि डाल दी।
इस घोटाले का मुझे जून के आसपास पता चला। मैंने अमर उजाला में छापना
शुरु किया। उस समय ओम सिह चौहान समाज कल्याण अधिकारी थे । वे दावा करते कि उनके
यहां घोटाला हो ही नहीं सकता। सीडीओ सुंदर लाल मुयाल होते थे। उन्होंने हमारे
समाचार देख तत्कालीन डीडीओ आरएस वर्मा को जांच सौंपी ।
इस प्रकरण लगभग आठ माह चला।प्रारंभिक जांच में 27 लाख का
घोटाला मिला। 23 मार्च 1994 को समाज
कल्याण अधिकारी ओम
सिंह चौहान
की गिरफ् तारी हुई।
समाज कल्याण विभाग में एक कर्मचारी होते थे मलिक। उनके पिता मेरे
दोस्त होते थे।इस प्रकरण के चलने के दौरा एक दिन शाम को मलिक मेरे पास आए। अटैची
उनके पास थी। वह बोले - छात्रवृति घोटाले के समाचार छापने बंद कर दें। अटैचीं में
तीन लाख रुपये हैं। इन्हें रख लें। मैंने कहा - मलिक तुझे यह भी ख्याल नहीं आया कि
तेरे वालिद मेरे दोस्त होतें हैं । वह बहुत शर्मीदा हुआ। अटैची लेकर वापस चला गया।
इसके बाद केस शुरु हो गया। एक दिन एक वकील साथी दफ्तर आए। बोले -
समाज कल्याण का बाबू जगन लाल मोर्य को लेकर आऊंगा।वे चाहता है कि आप
उन्हें लिखकर दे दें। इस घोटाले की जानकारी मैने मोर्य ने दी। इसके बाद आपने छापी।
जो आपकी बात हो, उसमें से
पांच हजार रुपये मुझे देने हैं।
वे बाद में मोर्य को लेकर आए। मोर्य को उम्मीद थी कि अमर उजाला से
लिखकर मिल जाने
पर तू बच जाएगा। मैंने कहा कि लिखकर दे दूंगा। बीस लाख लूंगा। मैं जानता था कि वह
नहीं देगा। मैंने कहा मोर्य बाबू वह भूल गए, जब मैने तीन लाख लौटा दिए
थे। तुमने कैसे सोच लिया कि मैं लिखकर दे दूंगा?। मोर्य
को तो उतना बुरा नहीं लगा,
जितना मित्र महोदय को लगा। क्योंकि मुफ्त में मिल रह पांच हजार
रुपये का उनका नुकसान हो गया।
−−
पत्रकारिता
जीवन की भूली बिसरी कहानी
23 दिसंबर 1989 को श्रमजीवी
पत्रकार संघ के सम्मेलन में भाग लेने के लिए मुझे स्वगीय राजेंद्र पाल सिंह कश्यप, वीरेशबल
आदि को गांधीनगर गुजरात जाना था। कार्यक्रम काफी पहले से निर्धारित था। हम उसकी
तैयारी में लगे थे । पता चला कि नजीबाबाद के साथी जितेंद्र जैन को पुलिस ने पकड़ा।
थाने में बुरी तरह मारा- पीटा। दरवाजे के किवाड़ में देकर उनकी उंगली कुचल दीं
गई। प्लास से नाखून खींचे गए। पुलिस जितना कर सकती थी ,उनके साथ
किया। जितेंद्र जैन जेल भेज दिए गए।
नजीबाबाद के साथी अपने साथ मुझे भी जितेंद्र जैन से मिलने जेल ले गए।
जितेंद्र जैन की हालत देखकर सबको बहुत गुस्सा आया। उन्होंने आप बीती भी सुनाई। यह
बात मैंने वरिष्ठ पत्रकार स्वर्गीय राजेंद्र पाल सिंह कश्पय को बताई। उन्होंने कहा
कि हमें कल निकलना है। मैंने कहा निकलना तो शाम को है। बड़ी ज्यादती हुई है। कल
दिन में प्रदर्शन कर लेते है्ं। वहीं से मैंने श्री बाबूसिंह चौहान साहब से बात
की। चौहान साहब ने कहा कि वे भी जेल मेंं जितेंद्र जैन से मिलकर आए हैं। वास्तव
में उसके साथ बहुत ही ज्यादती हुई है। बात चीत हुई।सहमति बनी की ज्यादती हुई है।
आवाज उठाई जाए।अगले दिन 11
बजे प्रदर्शन करना तै हुआ। यह भी बात हो गई कि प्रदर्शन होगा, यह खबर
सुबह के सब अखबारों में छप जाए।
बिजनौर के पत्रकारों में भी अन्य जगह की तरह धड़े बदी है। ,खेमें
हैं। इसके बावजूद यह भी सत्य है कि पत्रकारों के विरुद्ध होने वाली ज्यादती पर एक
साथ खड़े हो जाते हैं।
उस समय डा कश्मीर सिंह एसपी थे। नजीबाबाद में सत्तार नाम एक बदमाश
था। उसके आंतक से सब परेशान थे। उसने जाब्ता गंज के सतीश की निर्ममता पूर्वक हत्या
कर दी थी। उसके परिवार जन सत्तार की गिरफ्तारी की मांग कर रहे थे।पोस्टमार्ट के
बाद सतीश का शव नजीबाबाद आया। उसे जाब्तागंज जाना था किंतु लोगों ने घोषणा कर दी
कि उसका अंतिम संस्कार कल्लू गंज में किया जाएगा। कल्लू गजं में शव जमीन पर रखकर
।अग्नि देने की प्रकिया चल रही थी कि एसडीएम और क्षेत्राधिकारी मौके पर पंहुच गए।
शव कब्जे में लेकर भीड़ को भगा दिया गया। बताया जाता कि अधिकारियों ने इस मामले
में नजीबाबाद के पत्रकारों से बात की थी।कहा था कि इस प्रकरण में पत्रकार जितेंद्र
जैन की भूमिका संदिग्ध है। हो सकता है कि प्रशासन को लगा हो कि पत्रकार नहीं
बोलेंगे । इसीलिए उसने जितेंद्र जैन के साथ बरबरता की।
अगले दिन समाचार छपा । 11 बजे पूरे जनपद से पत्रकार एकत्र हुए। प्रदर्शन
हुआ।हमने कहा कि हम यूनियन के गुजराज सम्मेलन में जा रहे हैं। ये बात यहां
उठाएंगे। हम रात में निकल गए।
बिजनौर में श्री बाबू सिंह चौहान रह गए। अधिकारी चौहान साहब का
सम्मान करते ही थे। डरते भी थे। क्योंकि वे बड़े से बड़े प्रभाव के आगे दबते नहीं
थे।
तत्कालीन एसपी डा कश्मीर
सिंह अलग तरह के अधिकारी थे। उनके बिजनौर की मीडिया समेत समाज के सभी महत्वपूूर्ण
लोगों से संबंध थे। हालत यह थी कि उनके तबादले पर जगह जगह विदाई कार्यक्रम हुए थे।
शहर की दुकानों पर मिठाई नही बची थी।प्रदर्शन और चौहान साहब का रूआब जितेंद्र जैन
को रिहा कराने में कामयाब आ गया। मामला खत्म हुआ।
उमेश डोभाल
मेरे विश्व मानव सहारनपुर में छपे एक लेख को लेकर
उत्तरांचल वासी बहुत नाराज थे। मेरे
विरूद्ध देहरादून में मुकदमें दर्ज थे।
ऐसे में मैं एक बार किसी काम से मेरठ अमर उजाला गया हुआ था। प्रेस के बाहर एक ढ़ाबे पर उत्तरांचल
के तेज तर्रार पत्रकार उमेश डोभाल से परिचय हुआ। बातचीत होने लगी।दोनों ने साथा−
साथ खाना खाया। मैंने उन्हें बिजनौर और
उन्होंने मुझे पौड़ी आने का
निमंत्रण दिया। मैंन हंस कहा− मित्र उत्तरांचलवासी तो मेरी जानके प्यासे
है।उन्होंने एक मोटी सी गाली दी और कहा – आओ पूरा उत्तरांचल घूमाऊंगा। देखता हूं आपको कौन क्या कहेगा। आपके भाई के होते
किसी में विरोध करने का बूता नहीं।
बात आई –गई
हो गई। न उनका बिजनौर आना हुआ, न मेरा उनके पास जाना।उत्तरांचल में बिक रही
शराब के विरूद्ध लगातार उनकी खबर छपतीं रहीं। 25 मार्च 1988 को उनके गायब होने की
सूचना मिली। गायब होने के दिन वह पौड़ी
में थे।अमर उजाला ने उनका पता लगाने की मांग उठानी शुरू की। चर्चा चलने लगी कि
पौड़ी के शराब माफिया मनमोहन सिंह नेगी ने
उनकी हत्या करा दी। अमर उजाला के स्वामी अतुल माहेश्वरी जी ने उनकी गुमशुदगी की सीबीआर्इ से जांच कराने की
मांग उठाने का निर्णय लिया। उनके लिए
पौड़ी में प्रदर्शन करना तै हुआ।
निर्धारित दिन मेरठ से अतुल जी की कार में अमर
उजाला मेरठ के क्राइम रिपोर्टर राजेंद्र त्रिपाठी और संपादक राधेश्याम शुक्ला जी
बिजनौर आ गए। बिजनौर से उनके साथ हमारे साथी
कुलदीप सिंह प्रदर्शन में भाग लेने पौड़ी गए। अतुल जी के चालक ईश्वरी कार
चला रहे थे। प्रदर्शन में कुमायूं तक के
पत्रकार शामिल हुए।
प्रदर्शन के बाद ईश्वरी जब वापस चले तो उन्हें लगा
कि उमेश डोभाल का हत्यारा मनमोहन नेगी अलग
कार से कुछ लोगों के साथ इनका पीछा कर रहा
है। अनजान जगह,अनजान पहाड़ी रास्ता सबकी सांस फूलने लगी।ईश्वरी कार दौड़ाने लगा। पहाड़ी रास्ते पर
ईश्वर को गाड़ी चलाने का ज्यादा अभ़्यास नहीं था। पर जान सबको प्यारी होती है, सो
हरचंद गाड़ी दौड़ाने का प्रयास कर रहा था। जरा सी चूक में एक और गाड़ी के खाई में गिरने का डर था तो
दूसरी और कार के पहाड़ी से टकराने का भय। उस समय मोबाइल फोन होते नहीं थे कि पुलिस
किसी अन्य को बताया जा सके।
सबको मौत दिखाई
दे रही थी। ऐसे में ईश्वरी ने कहा – गाड़ी भगाने में दुर्घटना होने का ज्यादा
खतरा है, ऐसे में आराम से चलते हैं। आने वालों को आने दो । तैयार रहना। भिड़
जाएंगे। एक ही तो गाड़ी है। उसमें चार
पांच ही होंगे। देखा जाएगा।ईश्वरी की बात सबकी समझ में आ गई। कुछ देर बाद पीछे आ
रही कार दिखाई देनी बंद हो गई। फिर ये आराम से आए। ईशवरी , कुलदीप सिंह एवं राजेंद्र त्रिपाठी जी आज भी घटना के याद आने पर
सिहर जातें हैं।
अमर उजाला और उत्तरांचल के पत्रकारों के
दबाव पर उमेश डोभाल के गायब होने की सीबीआई जांच हुई। इसमें मनमोहन सिंह नेगी समेत
13 के विरूद्ध कोर्ट में चार्जशीट दाखिल हुई। सबूत के अभाव में केस छूट गया।
उमेश डोभाल आज हमारे बीच नहीं हैं। उनकी स्मृति में प्रतिवर्ष पौड़ी में एक
कार्यक्रम होता है। इसमें उत्तरांचल के एक पत्रकार को सम्मानित किया जाता है।
उमेश डोभाल को अपनी मौत का काफी पहले अंदेशा हो गया
था।श्रद्धांजलि स्वरूप उनकी कविता मैं मार दिया
जाउंगा, नीचे दी जा रही है−
अब मैं मार दिया जाऊंगा
– उमेश डोभाल
मैंने जीने के लिए हाथ उठाया
और वह
झटक दिया गया
मैंने
स्वप्न देखे
और चटाई
की तरह अपनों के बीच बिछा
उठा कर
फेंक दिया गया
अंधेरी भयावह सुरंग में …
रोशनी
मैंने
वहां भी रोशनी तलाश की
अब मैं
मार दिया जाऊंगा
उन्हीं
के नाम पर
जिनके
लिए संसार देखा है मैंने
अब मैं मार दिया जाऊंगा
– उमेश डोभाल
मैं जीने के लिए हाथ उठाया
और वह
झटक दिया गया
मैंने
स्वप्न देखे
और चटाई
की तरह अपनों के बीच
बिछा
उठा कर
फेंक दिया गया
अंधेरी भयावह सुरंग में
…रोशनी
मैंने वहां भी रोशनी
तलाश की
अब मैं
मार दिया जाऊंगा
उन्हीं
के नाम पर
जिनके
लिए संसार देखा है मैंने
उमेश डोभाल
− अशोक
मधुप
−−−−
अवसर हाथ से निकला
एक अवसर हाथ में आया। बिना बताए आया और निकल गया। आज भी इसका मलाल है। इस बात का पता न चलता
तो ज्यादा ठीक रहता।
आदरणीय अतुल माहेश्वरी जी के परिवार में शादी थी। अमर उजाला बरेली के
प्रांगण में कार्यक्रम का था। इसी प्रांगण मे
इनकी कोठी थी। कार्यक्रम का अब पूरा याद नहीं। शायद अतुल जी की बहिन की शादी थी।पंजाब से बारात आई थी।
बारात अंदर आ रही थी। एक साइड में धामपुर के अमर उजाला के पत्रकार विजय
शर्मा और मैं
आती बारात देख रहे थे ।इतने में सुनील छैंयाजी हमारे पास आ गए।सुनील छैंया मुरादाबाद के रहने वाले थे। वे अमर उजाला
के मुरादाबाद कार्यालय में वहां के प्रभारी उमेश कैरे जी के साथ फोटोग्राफर थे।बाद में ये मेरठ अमर उजाला में
भी लंबे समय रहे। यहां से छोड़ा तो प्रभात मेरठ के संपादक भी बने।
कद छोटा। भारी शरीर। मस्त मौला।कई बार चुनाव में बरेली अमर उजाला के लिए
फोटो खींचने बिजनौर आ चुके थे।
बात चल निकली।सुनील छैंया मुझसे बोले− मैंने आपका नुकसान करा दिया। एक अच्छा अवसर आपके हाथ से निकल गया।
उनकी बात सुन मैं और विजय शर्मा
दोनों चौंके। बोले – क्या हुआ।सुनील छैंया बोले− कुछ दिन पूर्व हरिद्वार
में कुंभ था।अतुज जी ने मुझसे कहा था कि बिजनौर से अशोक मधुप को लेकर कुंभ की
कवरेज को चले जाओ। दोनों कुंभ में वहीं
रहो। कुंभ को कवर करो। बढिया अवसर था, पर मैंने टाल दिया।
ये सुन मैं छैयां को कुछ देर देखता
रह गया।सोचता रहा कि कुंभ कई माह चलता है। विश्व का बड़ा मेला होता है।
इसका कवरेज करते। नए तजुरबे होते। नए लोंगो से परिचय होता। आगे बढ़ने का अच्छा अवसर था। इसके बावजूद मैंने
कहा − जो बीत गया,उसे याद करने से क्या लाभ। इसके बावजूद कोफ्त बहुत हुआ।एक बड़ा अवसर हाथ से निकल गया। पत्रकारिता
में आगे जाने का बड़ा अवसर हाथ से फिसल
गया।
अवसर के हाथ से जाने का जितना मलाल रहा। उससे ज्यादा यह कि काश ये न बताता।
मलाल तो न होता। जो मिलना था, मिला नहीं। उसका पता ही न चलता तो अब अफसोस तो न
होता। अवसर हाथ से निकल जाने का मलाल तो न रहता।
अशोक मधुप
−−−−−−−−−−−−−−−−−−
अमर सिंह
बिजनौर में 90 के दंगो
से पूर्व घंटाघर से सटे होटल में द्वितीय तल पर अमर उजाला का
कार्यालय होता था।कुछ लोगों से तभी विवाद हुआ था।एक दिन घंटाघर के नीचे तैनात
पुलिस पिकेट का एक जवान आफिस में आया। अपना परिचय दिया। बताया कि वह नीचे पिकेट
में तैनात हैं। चिंता न करें । आवाज देदें। आप पर हमला करने आने वाले जिंदा नहीं
जा पाएंगे। उसके
सीने पर लगी प्लेट पर नाम लिखा था अमर सिंह यादव। तब से ये अमर सिंह मेरे परिवार
का सदस्य है।पुलिस की सेवा से निवृत होकर आजकल अपने बच्चों के पति
पत्नी गुड़गांव में रह रहे हैँ। गजरौला के पास के रहने वाले अमर सिंह का दस 15 दिन में
हालचाल जानने के लिए फोन
जरुर आ जाता है।
अमर सिंह 15-16 साल के
करीब विजिलैंस में रहा । इसीलिए आम पुलिस जैसा उसका आचरण
नहीं है। वह न इधर - उधर से पैसा कमाने की कोशिश करता है। किस्सा उस समय का है जब कमल
सक्सैना पुलिस अधीक्षक होते थे। वे बहुत ही ईमानदार और सख्त अधिकारी रहे। इस
दौरान अमर सिंह को कोतवाली देहात थाने में मुहरिर बना दिया गया। थानाध्यक्ष बहुत
कमाई करने
वाले थे। वह चाहते थे कि
अमर सिंह
उसे कमाई
करके दे। अमर सिंह ने कहा कि सर जांच करा लीजिए। वह खुद कोई पैसा
नहीं लेता। जब वह ही नहीं लेता, तो आपको कहां से दे।इस पर वह अकड़ गए। कहा कि
ज्यादा आदर्शवादी मत बनो। जो कहा है करिए। एक दिन उसने अमर सिंह को बहुत उल्टी-
सीधी कही। कहा शाम तक तबादला करा लेना। नहीं तो सस्पैंड करा दूंगा।
दुपहर का
एक बजा होगा। अमर सिंह
मेरे पास आया। अपनी व्यथा सुनाई।मैंने कमल सक्सैना को फोन किया। मैने कहा कि एक
कार्य है। आपके स्तर का नहीं है। किंतु करना पड़ेगा । ज्ञातव्य है कि सिपाही का
तबादला अपर पुलिस अधीक्षक करते थे। इससे उपर के पदों का एसपी। वह मुस्कराकर बोले ।
मेरे स्तर का नहीं है फिर भी । मैंने कहा कि कुछ आप जैसे सिरफिरे
होंते हैं। जिंन्हे
ईमानदारी का जूनून होता है। ऐसे व्यक्ति संकट में
हो तो आपकी हमारी जिम्मेदारी उनकी सुरक्षा और मदद की है।
इसके बाद मैने पूरा किस्सा सुनाया। कहा कि थानाध्यक्ष पैसा चाहता है। ये पैसा लेता
नहीं। ऐसे में कहां से दे। आज उसने बहुत उल्टा- सीधा
कहा। इसलिए इसके साथ कुछ गलत हो उससे पहले कृपया इसे वंहा से
हटा दीजिए। अपने कार्यालय में किसी भी जगह बुला लीजिए। वह हंसते
हुए बोले - पुलिस में भी ऐसे हैं?जो ऐसी जगह
चाहतें हैँ, जहां
पैसा न हो। मैने कहा - जी।
उन्होंने कहा कि मै आर्डर कर रहा हूं, किसी से
मंगा लीजिए। अमर सिंह एसपी के कैंप कार्यालय गया। 15 मिनट में
अपना तबादला आर्डर लेकर मैरे पास आ गया। तीन बजे थाने पंहुच गया। थानाध्यक्ष के
हाथ में अपना तबादला आदेश थमा दिया।
एसपी द्वारा सिपाही के तबादले का आदेश देखकर वह भी चौंका। सबको पता
था कि सक्सैना साहब बहुत ईमानदार और सख्त हैं। एसपी द्वारा किया
आदेश देखकर उसकी समझ में आया कि ये आदमी ऐसा - वैसा नहीं है। उसने बहुत
पूछा - क्या हुआ। कैसे हुआ। अमर सिंह ने इतना कहा कि समाज में मदद करने वाले बहुत
होतें हैं, पैसा ही
सब कुछ नहीं होता। शाम को अमर सिंह रिलीव होकर बिजनौर आ
गया। कोतवाली के थानाध्यक्ष और अन्य स्टॉफ यह जानने का बहुत प्रयास
करता रहा कि कैसे हुआ?। पर
किसी को तबादले के पीछे की कहानी का पता नहीं चला।
मैंने खबर रोकने के लिए रिश्वत नहीं ली
1990 गल्फ
वॉर। इराक की सद्दाम सरकार के
खिलाफ 34
राष्ट्र युद्ध कर रहे थे। अमेरिका इनका अगुआ था।ये
ल़ड़ाई लगभग सात माह चली।
पूरी दुनिया को तेल खाड़ी
के देश आपूर्ति करते हैं। युद्ध होने के
कारण तेल की आपूर्ति रुक गई।इस लड़ाई में दुनिया में तेल का संकट
पैदा हो गया। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा।सरकार
के आदेश पर देश भर में पेट्रोल और डीजल के परमिट जारी हुए।अपने जनपद में भी
ऐसा ही हुआ। नगर क्षेत्र में एसडीएम और
देहात में बीडीओ को पेट्रोल डीजल के परमिट देने के अधिकार
दिये गए। व्यवसायिक वाहनों के लिए
डीजल की मासिक सीमा निर्धारित कर दी गई।
कोतवाली देहात में जबर सिंह बीडीओ हुआ करते थे।उन्होंने विश्वास में
कोरे परमिट पर अपने हस्ताक्षर कर स्टाफ को
दे दिए। ताकि उनकी अनुपस्थिति में भी किसी वाहन चालक को परेशानी न हो। उनके
स्टॉफ ने व्यवसायिक वाहनों के लिए जारी
होने वाले ये खाली हस्ताक्षर किये मुहर युक्त परमिट 200- 300 रुपये में बेच दिए। किसी
ने मुझे इन परमिट की छाया प्रति लाकर दे दी। मैने इन्हें अखबार में छापना शुरु कर
दिया।मेरे पास काफी सारे अलग -अलग नंबर की
फोटो स्टेट आईं थी। मैने तीन - चार दिन समाचार छापा।
किसी ने जबर सिह को सूचना दे दी कि अमर उजाला के पास अभी परमिट की काफी प्रति हैं। उनका संदेश
आया । खबर छापना बंद कर दें। वह 70- 75 हजार तक
देने को तैयार हैं।मैंने मना कर दिया।मैं खबर छापता रहा।कई माह बाद एक दिन जबर सिंह कलेक्ट्रेट में
मिल गए। परिचय हुआ। वे पतले सांवले रंग के थे।
बोले आपका आभार। आपने मेरे 75 हजार
रुपये बचवा दिए।मैंने कहा। कैसे ?मुझे कुछ
पता नहीं। वह बोले कि आप मेरे द्वारा जारी कोरे परमिट छाप रहे थे। मैंने आपको
मामला निपटाने के 75 हजार तक
देने का अपनी ओर से आफर किया था। आप और
कहते तो मैं बीस- पचीस हजार और दे देता। एक लाख रुपया में आराम से आपको दे सकता था।आपने लेने से मना कर
दिया।आपने नहीं लिए। डीएम साहब से 25 हजार
रुपये लेकर फाइल बंद कर दी। इस तरह मेरे
लगभग 75 हजार
रुपये बच गया। धन्यवाद देकर वे चले गए।
मैं उन्हें देखता रह गया।
काफी देर सोचता रहा कि डीएम जैसा अधिकारी भी इतना सस्ता हो सकता है। मेरे साथ के
साथी पत्रकार ने मुझे खूब उल्टा -सीधा कहा। बने रहो ईमानदार। इस जमाने में सब
बिकाऊ हैं। आप नही बिकेंगे। कोई और बिक जाएगा। पर मुझे संतोष रहा। आज भी संतोष
है।
बाद में जबर सिंह जी यदा- यदा मिल जाते। धीरे - धीरे एक अच्छे मित्र बन गए।एक
बार संकट में उन्होंने मेरी बहुत मदद की।
जब झेलना पड़ा मुकदमा ---
मैंने अमर उजाला के लिए काम
करना कुछ दिन पूर्व शुरू किया था।पर मेरी उठ- बैठ उत्तर भारत टाइम्स पर ही
थी। उनके सामने विशाल फोटो स्टूडियो मेरा लोगों से मिलने का प्रमुख
स्थान था। एक दिन मैं उत्तर भारत टाइम्स पर पहुॅचा तो कश्यप साहब ने अफजलगढ़ क्षेत्र की एक महिला का प्रार्थना पत्र
दिखाया।
डीएम को दिए उस प्रार्थना पत्र में कहा गया था कि धामपुर का एक आबकारी निरीक्षक आता है। वह मुझसे
अवैध धन की मांग करता है। रात के लिए लड़की का प्रबंध कराने को भी कहता है। पहले
मैं कच्ची शराब बेचने का काम करती थी।अब नहीं करती।फिर भी वह मुझे परेशान करता है।
कश्यप साहब ने बताया कि
महिला एक साप्ताहिक के सम्पादक को पूछ रही थी। मेरे पूछने पर कि क्या बात है, वह मुझे
निर्भय को सौंपा प्रार्थना पत्र दे
गई। वह प्रार्थना पत्र हमने अपने अखबार
में छाप दिया। उत्तर भारत टाइम्स का छपा
आया गया हो गया। हमें धामपुर आबकारी इंस्पैक्टर
ने नोटिस दे दिया। पता चला कि अमर उजाला के धामपुर संवाददाता और आबकारी इंस्पैक्टर की दांत काटी रोटी थी। हमारे धामपुर संवाददाता पीते थे। उनकी व्यवस्था धामपुर का आबकारी विभाग
करता था।
मेरे से पहले पूरे जिले
में वे ही अमर उजाला का कार्यभार देखते
थे। बिजनौर जिला मुख्यालय पर मेरे आने से उनका क्षेत्र सीमित हुआ। अमर उजाला के स्वामी अतुल जी मुझे ज्यादा
मानने लगे थे। यह महोदय के लिए परेशानी कर
रहा था। उन्होंने मुझे झटका देने के लिए मुकदमा दायर कर दिया। हमने प्रार्थनापत्र
की जांच करार्इ ।पता चला कि महिला तो
कच्ची शराब बनाने , बेचने का कारोबार करती
है। आबकारी पुलिस उसे तंग कर रही थी। इसलिए शिकायत की।
मुकदमा चल रहा था कि आबकारी इंसपैक्टर से समझौते की बात चलने लगी। वह
तैयार हो गए। पर एक दिन बात - बात में
मुझे यह कह दिया कि तुम्हारे हाथ में कटोरा थमा दूंगा। साथी कुलदीप सिंह एडवोकेट
ने समझौते का पेपर उससे छीना और फाड़ दिया।
कहा -तुझसे जो हो कर लेना।
लोअर कोर्ट से सम्मन हो गए थे। हमने जिला जज के यहां अपील की।
जिला जज के सामने महिला का
प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया। उन्होंने
हमारी अपील खारिज कर दी। कहा कि प्रार्थना पत्र डीएम को दिया गया था। आपको
छापने को नहीं दिया गया था। आपने पत्र को अखबार में छापकर मान हानि की है।
हमने किसी तरह से जुगाड़ कर आबकारी निरीक्षक का अमरोहा तबादला कराया।
अमरोहा जाने के बाद कोर्ट में जल्दी- जल्दी तारीख
लगवांई। एक तारीख पर वह नहीं आए। मजिस्ट्रेट ने मुकदमा खारिज कर दिया।
कई साल बाद वे महानुभाव बिजनौर में
जिला आबकारी बन कर आए। जब तक बिजनौर रहे बहुत अच्छे संबध रहे। उन्होंने
स्वीकारा कि किसी ने आपके बारे में भड़काकर मुकदमा कराया था।
दरअसल मैने पत्रकारिता दोस्ती -दुश्मनी रखकर नहीं की । मैने यह
फर्क रखा कि मैंअलग हूं। अखबार अलग।
दोस्ती -दुश्मनी किसी की मुझसे है तो वह मुझ तक ही सीमित रहनी चाहिए। अखबार में
नहीं जानी चाहिए । मैं अखबार का
नौकर हूं। मालिक नहीं। दूसरा मेरा मानना यह रहा कि अखबार का सही मालिक वह है, जो मूल्य
देकर अखबार खरीद कर पढ़ता है। इसलिए हर वह खबर छपनी चाहिए , जो वह
चाहता है।
|
|
||||
|
|
||||
पत्रकारिता
जीवन की भूली बिसरी कहानी
गंगा
जल और मेरी प्यास
---------
मुझे
बहुत तेज प्यास लगी थी। गंगा पास से बह रही थी। मजबूरी ,मैं दुनिया का प्यास बुझाने वाली पतिति पावनी
से अपनी प्यास नहीं बुझा सकता था।
कई
साल पहले की घटना है। खिरनी गांव के पास गंगा में नाव पलट गई। नाव में सवार छह
व्यक्ति डूब गए। मैंने तय किया कि इस क्षेत्र का भ्रमण किया जाए।मैं अपने साथी
संजीव शर्मा को लेकर खिरनी के लिए चल दिया। बस ने हमें खिरनी गांव के पास उतार
दिया। पैदल चलकर हम खिरनी गांव के पास बहती गंगा के तट पर पहुंचे।
एक
नाविक दिखाई दिया।मैंने उससे गंगा पार ले जाने का अनुरोध किया।उसने पूछा।कहाँ
जाओगे।मेरे बताने पर की खादर में घूमना चाहते हैं।
उसने
कहा कि कोई फायदा नहीं ।जंगल के सभी रास्तों में पानी भरा है।वह तो अपने खेत से
पशुओं के लिए चारा लेने जा रहा है। मजबूरी है बाबू।हमें पशुओं का पेट भरना है।आप
मत जाओ।
हमने
उसका कहना माना।
वहां
से गंगा के किनारे बिजनौर साइड में चलने का निर्णय लिया। बरसात का मौसम था। गंगा
पूरे उफान पर बह रही थी। हम गंगा के किनारे- किनारे चल दिए। खोलों में उतरते
चढ़ते।कुछ आगे चलकर एक किले के खडंहर दिखाई दिए। महल के किनारे बने गोले जैसा था।
वहां बड़ी ईंट के अद्धे लगे हुए थे।यहां पुराने समय की ईट लगभग दो इंच मोटी और एक
से डेढ फीट तक लंबी होती थी। मैंने देखा कि इसमें लगी ईंट अधिकतर आधी है। महल का अधिकांश हिस्सा गंगा
में बह गया था। यही भाग बचा था।लगाकी यहां ईट किसी पुराने महल /भवन की निकाल कर
यहां लाकर लगाई गई है। कुछ फोटो आदि खींचे और एक ईंट अपने साथ लेकर हम चल दिए।
इससे
पहले कभी ऐसा सफर नहीं किया था। सो सफर की कोई व्यवस्था भी नहीं की थी। सफर के लिए
पानी नहीं लिया था। जबकि बहुत जरूरी था।कुछ दूर गंगा के खोलों में ऊंचे -नीचे चलकर
थकान हो गई। प्यास लगने लगी। गर्मी ज्यादा थी।रास्ते में एक दो किसान मिले ।उनसे
पूछा कि कहीं पानी मिलेगा। प्यास लगी है। उन्होंने आश्चर्य से हमें देखा कहा -गंगा
बह तो रही है।
बरसात
के कारण मिट्टी कट रही थी पानी मटमैला था। प्यास बहुत थी। पर गंगा के जल को देखकर
पीने की इच्छा नहीं थी।ऐसे चलते दो घंटे बीत गए। प्यास से जीभ बाहर निकल आई थी।होठ
सूख गये थे।
कैसी
विवशता थी कि कल -कल करती मां पावनी के तट के किनारे चलने के वाबजूद जल नहीं पी
सकते है। लग रहा था कि कहीं बरसात का मटमैला पानी बीमार न कर दे।
कुछ
दूर बसा एक गांव दिखाई दिया ।हम उसकी ओर बढ़ गए। प्यास बर्दास्त से बाहर होती जा
रही थी। गांव में घुसते ही छप्पर
की बस्ती दिखाई दी।कुछ खपरैल के मकान भी थे। यहां जगह -जगह बरसात का पानी जमा था।
उसमें सुअर पड़े आराम कर रहे थे। लगा कि वाल्मीकियों का मुहल्ला है। एक जगह नल
दिखाई दिया। उसके चारों ओर भी बेइंतहा गंदगी पसरी थी। पर प्यास ने सब कुछ भुला
दिया।जगह - जगह पसरी गदंगी,उससे
उठती बदबू का ध्यान छोड़ हमने
बढ़कर जमकर पानी पिया। रुक- रुक कर दो तीन बार पानी पीने के बाद तृप्त हो पाएं ।कुछ
जान में जान आई।तब आगे बढ़े।
अशोक
मधुप
पत्रकारिता
जीवन की भूली बिसरी कहानी
1984
का मध्यावधि चुनाव होना था। इस चुनाव में कांग्रेस की प्रत्याशी मीरा कुमार ,दमकीपा से राम विलास पासवान और बसपा से मायावती चुनाव
लड़ रहीं थीं । चुनाव की खास बात यह थी कि रामविलास पासवान की बड़ी हवा थी। पूरे
क्षेत्र में धूम थी। वे स़ड़क पर दो मिनट को खड़े हो जाते तो भीड़ एकत्र हो जाती।उनकी शाम को पहली सभा होती थी और उसमें ही घोषणा होती कि अगली सभा कहां होगी। इस सभा की
भीड़ नारे लगाती हुई उनकी गाड़ी के पीछे -पीछे जाती। हालत यह रहती कि पहली सभा की भीड़ रात 11 बजे की अंतिम सभा तक साथ -साथ रहती।
रामविलास पासवान का चुनाव लड़ाने के लिए बिजनौर में शरद यादव और मुलायम सिंह आए थे। ये
दोनों नेता पूरे चुनाव में बिजनौर ही
रहे।रामविलास पासवान का कार्यालय रेलवे स्टेशन के सामने बना जानी भाई का होटल था।
आज इसमें ऊपर के हिस्से में लोगों के आवास हैं । नीचे दुकान हैं। उस समय होटल के नीचे
सड़क के किनारे पर एक टूटा खटोला पड़ा
रहता था। मुलायम सिंह प्रायः इस पर लेटे रहते थे।
मीरा
कुमार का कैंप-- कार्यालय पीडब्लूडी का डाक बंगला था। केंद्र से कई मंत्री उनका चुनाव लड़ाने आए थे। मीरा कुमार को प्रदेश सरकार लड़ा रही थी। वीर बहादुर सिंह उस समय
मुख्य मंत्री थे। उन्होंने चुनाव
की कमान संभाल रखी थी।
इस
चुनाव के मतदान की पहली रात में ही पासवान को च़ुनाव लड़ा रहे कई दिग्गज नेता
रातों रात दल बदल गए थे।
भाजपा को समर्पित एक पूर्व
विधायक भी कांग्रेस के साथ हो गए थे। उनकी जिम्मेदारी अफजलगढ़ क्षेत्र के सभी बूथ पर बस्ते लगवाने और वोट डलवाने की थी। उनके पाला
बदल जाने से इस क्षेत्र में रामविलास पासवान के बस्ते बूथों तक नहीं पहुुॅच पाए थे। मुख्यमंत्री कालागढ़
में टिके थे।नतीजा यह हुआ कि पासवान लगभग पांच हजार मत से चुनाव हार गए ।
चुनाव
के दौरान मीडिया को भी खरीदने की कोशिश हुई। खबरें बिकीं। एक खबर छापने के मुझे पांच हजार रुपये
दिए जा रहे थे। मैने नहीं लिए। दो दिन बाद वही खबर लखनऊ से ,अमर उजाला के पहले पन्ने पर छप गई।
मुझे बड़ा धक्का लगा । मैंने क्रोध में अतुल जी को त्याग पत्र भेज दिया। रात में
अखबार लेकर टैक्सी आयी। अतुल जी द्वारा
उसके चालक से कहा गया था कि अशोक मधुप को
हर हाल में अपने साथ लेकर आना है।
टैक्सी
चालक बंडल संभालने वाले चौकीदार को बता गया कि मैं लौटकर आ रहा हूं। चौकीदार का मुझे फोंन आ गया।
मैं टैक्सी से बरेली चला गया। प्रेस
प्रांगण में प्रेस से पहले अतुल जी की
कोठी होती है। वे कोठी के बाहर ही अपनी कार पर खड़े मिल गए। मुझसे बात की । त्याग
पत्र का कारण जानने पर अखबार मंगाकर खबर
पढ़ी। कहा -खबर छपने योग्य नहीं थी ,फिर छप कैसे गई?
पता
लगाते हैं।
नवंबर
या दिसंबर का माह था। ठंड बहुत थी। मैने उनसे कहा कि मुझे तीन सौ रुपये की बहुत
जरुरत है किंतु मैंने पांच हजार रुपये
नहीं लिये और लखनऊ वाला बिक गया। उन्होंने
पूछा - तीन सौ रुपये की क्या जरुरत है? मैने पांव की ओर इशारा कर के हॅसकर कहा- इस ठंड में चप्पल पहने हूँ ।
जूते खरीदने को पैसे नहीं है। अतुल जी भी हॅस पड़े और मुझे समझा दिया ।यही होता है।
मैं लौट आया। काम शुरू हो गया।
एक
बात कहता चलूं कि अतुल जी अपने साथ काम करने वाले हर आदमी की जरूरत समझते थे।उसीके
हिसाब से मदद करते थे।कभी गिनकर पैसे नही दिए।कई बार आपके पास से गुजरते आप के हाथ
में इस तरह रुपये दे जाते की आपके पास खड़े व्यक्ति को पता नहीं होता था।
−−−−−−−−−−−−−−
[2:31 am, 28/05/2021] Ashok Ji: पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी
कहानी -9
जब
मेरा अपहरण हुआ
अमर
उजाला में सिख आतंकवादियों की आपसी टकराव
की खबर छपने से पुलिस अधिकारी मुझसे नाराज
थे। उस समय नेता जी मेरे नजदीक थे। उनके
कहने पर बिजनौर पुलिस क्षेत्राधिकारी बिजनोर के खिलाफ मैने दो-तीन खबर छापी। शायद सीओ साहब का नाम
दिनेश शर्मा था। पहले छोटी - छोटी खबर पर बहुत असर होता था। सीओ साहब का
तबादला हो गया।
उनकी जगह बरेली से केके त्रिपाठी आए। मैं उस उत्तर भारत टाइम्स में बैठता था। वहां काम करने के दौरान अमर उजाला को खबर
भी भेजता था। रात लगभग दस बजे के के त्रिपाठी जी का फोन आया। आदरणीय अतुल जी का
संदर्भ दिया। कहा मेरे मित्र हैं। मैं
बरेली से आया हूं। अभी ज्वाइन किया है। थाने में बैठा हूं ।मिल जाओ।
मैं
और पारेश कश्यप दोनों थाने पहुंच गए। पारेश कश्यप उत्तर भारत टाइम्स के मालिक और
राजेंद्र पाल सिह कश्यप के बेटे
थे।त्रिपाठी थाने के बीच प्रांगण में कुर्सी डाले बैठे थे। हम और पारेश उनके मिले।
उन्होंने बैठा लिया। चाय मंगा ली। हम चाय पी रहे थे। कि हल्के चेचक के मुंह दाग
सांवले रंग का एक दरोगा उनके पास आया। त्रिपाठी जी को उठाकर ले गया।
कोने में वह और त्रिपाठी जी बात करते रहे। मुझे लगा कि मेरी और इशारा कर भी कुछ
बात की। मैंने ध्यान नहीं दिया।
पारेश
कश्यप मेरे घर से कुछ आगे ही रहते थे। लगभग 12 बजे उन्होंने घर के पास छोड़ दिया।
गर्मी के दिन थे। लाइट थी नही। मैं और निर्मल आंगन में लेट रहे थे। लगभग एक
बजे किसी ने दरवाजा खटखटाया।
मैने
दरवाजा खोला। एक सिपाही खड़ा था। उसने कहा कि मंडी में सुभाष बुला रहा है। मैने
कहा कि मैं किसी सुभाष को नहीं जानता। वह चला लगा। कुछ देर बाद आया। कि उसकी तबियत खराब है। वह वहीं बुला रहा है। मैने कहा कि पहले तो मैं उसे जानता नहीं। और अगर
जानता भी हूं तो वह मेरे घर आए। वह चला गया। आधे घंटे बाद फिर आया कि वह
चौराहे पर खड़ा है। मैने कहा -खड़ा होगा।
दरवाजा बंद कर लिया। पता नहीं क्या दिमाग
में आई कि देखूं । कौन हैं। क्या चाहता है।मैरे घर से सटा मंदिर है। मंदिर के
सामने क्रेशर वाले चुन्नी लाल अरोड़ा जी का मकान। इसके बाद सड़क। मैं गली से बाहर आया। चुन्नी लाल के चबुतरे पर खड़ा था । वह सिपाही मुझे दीख गया।
निर्मल भी मेरे पीछे आ गई थी। इतनी देर में तीन -चार पुलिस वाले एकत्र हो गए।
उन्होंने मुझे बातों में लगा लिया। आसपास छिपे
छह -सात पुलिस वाले और निकल आए। फिर क्या था ? मुझे पकड़कर खींचने लगे । मैने शोर
मचाया। निर्मल ने शोर मचाया ।गर्मी उस
रात थी। आसपास के सब जग रहे थे। हमारा शोर
सुनकर चुन्नी लाल अरोड़ा जी और मुहल्ले वाले निकल आए। भीड़ इकट्ठी हो गई। हंगामें
की आंशका देख उनका इंचार्ज आया। पुलिस
वालों से मुझे छुड़ाया । सॉरी कर जाने लगा। मैने गौर से देखा। ये वहीं दरोगा था जो
कुछ देर पहले थाने में मेरे सामने से केके त्रिपाठी को उठाकर ले गया था। अलग में
जाकर मेरी और इशारा कर बात कर रहा था।
खैर
घर आ गए। समझ नहीं आया। क्या मामला था। नींद तो आनी ही नहीं थीं। किसी तरह दिन निकला। मित्रोंं को बताया । कुछ
पत्रकार और मित्र थाने पहुंच गए।
थाने
में मौजूद स्टाफ ने बताया कि वह इस दरोगा
से थाने के सब बहुत परेशान है। पुलिस लाइंस का ट्रेनीज है। अधिकारियों के मुंह
चढ़ा है। नाम है नैपाल सिंह। मैने तहरीर
दी। मैने लिखा था कि अपहरण का प्रयास
किया। हेड मोहर्रिर ने कहा । दुबारा लिखो। कि मुझे लटका लिया। पांच - छह कदम घसीट
कर ले गए। भीड़ इकट्ठा होने पर विरोध देख छोड़कर गए। आपने जो लिखा है, उससे
अपहरण नहीं बनता। ये बढ़ने पर अपहरण बनेगा।
किसी
अधिकारी को क्या थाना इंचार्ज तक को पता
नहीं लगा। रिपोर्ट लिखकर हाथों -हाथ नकल हमें पकड़ा दी गई। रिपोर्ट लिखे जाने
पर पुलिस अधिकारियों को पता लगा। खूब
शोर मचा।भाग -दौड़ शुरु हुई। दबाव
दिया जाने लगा। नैपाल सिंह जाट नहीं था।
किंतु उसके नाम के आगे सिंह लगा था। इसलिए मेरे नजदीकी सारे जाट मित्र उसे जाट समझ सब अलग हो गए।जबकि वह
पिछड़ी जाति से था।कोई मेर साथ उस समय
खड़े रहे तो मेरे मित्र विरेश बल । विरेश बल सिविल के वकील हैं। लंबे समय तक नव भारत टाइम्स के रिपोर्टर रहे।
उनकी
मेरी बात हुई। उन्होंने कहा। अशोक आज तुम शून्य हो। शुरूआत कर रहे हो । पुलिस
अधिकारी तुमसे भले ही नाराज हों। थाना पुलिस तुम्हारे साथ है। खोने को तुम्हारे
पास कुछ नही। जीत गए तो जय -जय । बाद में श्री नरेंद्र मारवाड़ी भी साथ आए। ये
श्रमजीवी पत्रकार यूनियन की जिला इकाई के
अध्यक्ष थे। मेरे पक्ष कुछ बयान जारी किए । हालाकि ये बयान बिजनौर के
पत्रों ने नहीं छापे ।
बिजनौर
में पत्रकारों की और से कुछ नहीं
हुआ।अधिकतर पत्रकार पुलिस के दबाव में मेरा
साथ छोड़ गए। जो मेरे अपने थे। वह भी।
इस घटना की अमर उजाला में खबर छपते ही मुरादाबाद के पत्रकार उमेश पी कैरे मेरे संकट
मोचन बनकर सामने आए। मुरादाबाद में पत्रकारों ने प्रदर्शन किया। दो -तीन दिन
डीआईजी का घेराव हुआ ।आदरणीय अतुल जी ने मुझे बरेली बुलाया। बरेली के साथी अरविंद उप्रेती, लक्ष्मण सिंह भंडारी,विपिन धूलिया और सुनील शाह मुझे लेकर
आई जी के पास गए। आई जी ने सारा प्रकरण सुना। कहा - आप निश्चित होकर बिजनौर जाए।
आपका कुछ नहीं होगा। इन साथियों में आज सुनील शाह हमारे बीच नहीं हैं।
अतुल
माहेश्वरी सदा अपने स्टाफॅ के साथ रहे। पत्रकार उमेश डोभाल की मृत्यु की
सीबीआई जांच होने और उनके हत्यारोपियों की गिरफ्तारी तक वे
सक्रिय रहे।
मैं बिजनौर पहुंचा। सब अखबार में पुलिस का स्पष्टीकरण था कि पुलिस अशोक मधुप के भाई की तलाश में उनके
घर गई थी। भाई की जगह गलती से उन्हें उठा
लिया। गलती का पता चलने पर छोड़ना पड़ा। बताता चलें कि उस समय मेर छोटे भाई की उम्र 15 साल के आसपास होगी। वह अपराध की और
बढ़ रहा था। कई साल से मेरे साथ नहीं रहता था। 17 साल की उम्र में उसकी मौत हो गई।
नैपाल
से नाराज थाना पुलिस ने कहा कि अधिकारियों
से पूछो -किसी मुलजिम को पकड़ने जाती तो थाना पुलिस
जाती। पुलिस लाइन्स का ट्रेनीज सब इंस्पैक्टर पुलिस लाइस फोर्स के साथ कैसे गया?
हम
इस मांग को ही आगे बढ़ाते रहे। नैपाल मेरे घर लिखा -पढ़त में नहीं आया
था। न आ सकता था। अधिकारियों ने अपने को
घिरते देख नैपाल सिंह के विरूद्ध जांच शुरु करा दी। पुलिस ऐसा विभाग है कि फंसने पर सब अधिकारी बच जातें हैं । आगे आने वाला ही झेलता है।
दो
-तीन दिन बाद थाना पुलिस ने नैपाल सिंह को
शक्ति चौक पर वाहनों से वसूलयाबी करते
पकड़ लिया गया। उसके खिलाफ
कार्रवाई शुरू हुई। इसके 10- 15
दिन बाद नजीबाबाद बस स्टैंड के सामने
एक वर्कशाप पर नैपाल सिंह ने मोटर साइकिल
मरम्मत कराई थी। मरम्मत के पैसों को लेकर
विवाद हुआ । धक्का मुक्की हुई । नैपाल के खिलाफ
रिपोर्ट हुई।
सारे प्रकरण की जांच हुई।मेरे और वाहनों से वसूलयाबी को लेकर
नेपाल को दो बैड एंट्री लगी। उसका ट्रेनिंग पीरियड़ छह माह के लिए बढ़ गया। ये घोषणा
तत्कालीन एसपी को प्रेस बुलाकर करनी पड़ा। नैपाल सिंह को जनपद से जाना पड़ा । कहां गया फिर पता नहीं चला। के के त्रिपाठी
बिजनौर कुछ समय रहे ।उन्होंने चाहा कि मैं
ये किस्सा भुला दूं पर मैं नही भुला पाया।
बरेली के साथियों ने इतना जरूर बताया कि त्रिपाठी का यह रहा है कि अपने पूर्व
साथियों का विरोध करने वालों को जाते ही
सबक सिखाने का प्रयास करता है।
अशोक
मधुप
[पत्रकारिता
जीवन की भूली बिसरी कहानी
पत्रकारिता
जीवन की भूली बिसरी कहानी -9
जब
मेरा अपहरण हुआ
अमर
उजाला में सिख आतंकवादियों की आपसी टकराव
की खबर छपने से पुलिस अधिकारी मुझसे नाराज
थे। उस समय नेता जी मेरे नजदीक थे। उनके
कहने पर बिजनौर पुलिस क्षेत्राधिकारी बिजनोर के खिलाफ मैने दो-तीन खबर छापी। शायद सीओ साहब का नाम
दिनेश शर्मा था। पहले छोटी - छोटी खबर पर बहुत असर होता था। सीओ साहब का
तबादला हो गया।
उनकी जगह बरेली से केके त्रिपाठी आए। मैं उस उत्तर भारत टाइम्स में बैठता था। वहां काम करने के दौरान अमर उजाला को खबर
भी भेजता था। रात लगभग दस बजे के के त्रिपाठी जी का फोन आया। आदरणीय अतुल जी का
संदर्भ दिया। कहा मेरे मित्र हैं। मैं
बरेली से आया हूं। अभी ज्वाइन किया है। थाने में बैठा हूं ।मिल जाओ।
मैं
और पारेश कश्यप दोनों थाने पहुंच गए। पारेश कश्यप उत्तर भारत टाइम्स के मालिक और
राजेंद्र पाल सिह कश्यप के बेटे
थे।त्रिपाठी थाने के बीच प्रांगण में कुर्सी डाले बैठे थे। हम और पारेश उनके मिले।
उन्होंने बैठा लिया। चाय मंगा ली। हम चाय पी रहे थे। कि हल्के चेचक के मुंह दाग
सांवले रंग का एक दरोगा उनके पास आया। त्रिपाठी जी को उठाकर ले गया।
कोने में वह और त्रिपाठी जी बात करते रहे। मुझे लगा कि मेरी और इशारा कर भी कुछ
बात की। मैंने ध्यान नहीं दिया।
पारेश
कश्यप मेरे घर से कुछ आगे ही रहते थे। लगभग 12 बजे उन्होंने घर के पास छोड़ दिया।
गर्मी के दिन थे। लाइट थी नही। मैं और निर्मल आंगन में लेट रहे थे। लगभग एक
बजे किसी ने दरवाजा खटखटाया।
मैने
दरवाजा खोला। एक सिपाही खड़ा था। उसने कहा कि मंडी में सुभाष बुला रहा है। मैने
कहा कि मैं किसी सुभाष को नहीं जानता। वह चला लगा। कुछ देर बाद आया। कि उसकी तबियत खराब है। वह वहीं बुला रहा है। मैने कहा कि पहले तो मैं उसे जानता नहीं। और अगर
जानता भी हूं तो वह मेरे घर आए। वह चला गया। आधे घंटे बाद फिर आया कि वह
चौराहे पर खड़ा है। मैने कहा -खड़ा होगा।
दरवाजा बंद कर लिया। पता नहीं क्या दिमाग
में आई कि देखूं । कौन हैं। क्या चाहता है।मैरे घर से सटा मंदिर है। मंदिर के
सामने क्रेशर वाले चुन्नी लाल अरोड़ा जी का मकान। इसके बाद सड़क। मैं गली से बाहर आया। चुन्नी लाल के चबुतरे पर खड़ा था । वह सिपाही मुझे दीख गया।
निर्मल भी मेरे पीछे आ गई थी। इतनी देर में तीन -चार पुलिस वाले एकत्र हो गए।
उन्होंने मुझे बातों में लगा लिया। आसपास छिपे
छह -सात पुलिस वाले और निकल आए। फिर क्या था ? मुझे पकड़कर खींचने लगे । मैने शोर
मचाया। निर्मल ने शोर मचाया ।गर्मी उस
रात थी। आसपास के सब जग रहे थे। हमारा शोर
सुनकर चुन्नी लाल अरोड़ा जी और मुहल्ले वाले निकल आए। भीड़ इकट्ठी हो गई। हंगामें
की आंशका देख उनका इंचार्ज आया। पुलिस
वालों से मुझे छुड़ाया । सॉरी कर जाने लगा। मैने गौर से देखा। ये वहीं दरोगा था जो
कुछ देर पहले थाने में मेरे सामने से केके त्रिपाठी को उठाकर ले गया था। अलग में
जाकर मेरी और इशारा कर बात कर रहा था।
खैर
घर आ गए। समझ नहीं आया। क्या मामला था। नींद तो आनी ही नहीं थीं। किसी तरह दिन निकला। मित्रोंं को बताया । कुछ
पत्रकार और मित्र थाने पहुंच गए।
थाने
में मौजूद स्टाफ ने बताया कि वह इस दरोगा
से थाने के सब बहुत परेशान है। पुलिस लाइंस का ट्रेनीज है। अधिकारियों के मुंह
चढ़ा है। नाम है नैपाल सिंह। मैने तहरीर
दी। मैने लिखा था कि अपहरण का प्रयास
किया। हेड मोहर्रिर ने कहा । दुबारा लिखो। कि मुझे लटका लिया। पांच - छह कदम घसीट
कर ले गए। भीड़ इकट्ठा होने पर विरोध देख छोड़कर गए। आपने जो लिखा है, उससे
अपहरण नहीं बनता। ये बढ़ने पर अपहरण बनेगा।
किसी
अधिकारी को क्या थाना इंचार्ज तक को पता
नहीं लगा। रिपोर्ट लिखकर हाथों -हाथ नकल हमें पकड़ा दी गई। रिपोर्ट लिखे जाने
पर पुलिस अधिकारियों को पता लगा। खूब
शोर मचा।भाग -दौड़ शुरु हुई। दबाव
दिया जाने लगा। नैपाल सिंह जाट नहीं था।
किंतु उसके नाम के आगे सिंह लगा था। इसलिए मेरे नजदीकी सारे जाट मित्र उसे जाट समझ सब अलग हो गए।जबकि वह
पिछड़ी जाति से था।कोई मेर साथ उस समय
खड़े रहे तो मेरे मित्र विरेश बल । विरेश बल सिविल के वकील हैं। लंबे समय तक नव भारत टाइम्स के रिपोर्टर रहे।
उनकी
मेरी बात हुई। उन्होंने कहा। अशोक आज तुम शून्य हो। शुरूआत कर रहे हो । पुलिस
अधिकारी तुमसे भले ही नाराज हों। थाना पुलिस तुम्हारे साथ है। खोने को तुम्हारे
पास कुछ नही। जीत गए तो जय -जय । बाद में श्री नरेंद्र मारवाड़ी भी साथ आए। ये
श्रमजीवी पत्रकार यूनियन की जिला इकाई के
अध्यक्ष थे। मेरे पक्ष कुछ बयान जारी किए । हालाकि ये बयान बिजनौर के
पत्रों ने नहीं छापे ।
बिजनौर
में पत्रकारों की और से कुछ नहीं
हुआ।अधिकतर पत्रकार पुलिस के दबाव में मेरा
साथ छोड़ गए। जो मेरे अपने थे। वह भी।
इस घटना की अमर उजाला में खबर छपते ही मुरादाबाद के पत्रकार उमेश पी कैरे मेरे संकट
मोचन बनकर सामने आए। मुरादाबाद में पत्रकारों ने प्रदर्शन किया। दो -तीन दिन
डीआईजी का घेराव हुआ ।आदरणीय अतुल जी ने मुझे बरेली बुलाया। बरेली के साथी अरविंद उप्रेती, लक्ष्मण सिंह भंडारी,विपिन धूलिया और सुनील शाह मुझे लेकर
आई जी के पास गए। आई जी ने सारा प्रकरण सुना। कहा - आप निश्चित होकर बिजनौर जाए।
आपका कुछ नहीं होगा। इन साथियों में आज सुनील शाह हमारे बीच नहीं हैं।
अतुल
माहेश्वरी सदा अपने स्टाफॅ के साथ रहे। पत्रकार उमेश डोभाल की मृत्यु की
सीबीआई जांच होने और उनके हत्यारोपियों की गिरफ्तारी तक वे
सक्रिय रहे।
मैं बिजनौर पहुंचा। सब अखबार में पुलिस का स्पष्टीकरण था कि पुलिस अशोक मधुप के भाई की तलाश में उनके
घर गई थी। भाई की जगह गलती से उन्हें उठा
लिया। गलती का पता चलने पर छोड़ना पड़ा। बताता चलें कि उस समय मेर छोटे भाई की उम्र 15 साल के आसपास होगी। वह अपराध की और
बढ़ रहा था। कई साल से मेरे साथ नहीं रहता था। 17 साल की उम्र में उसकी मौत हो गई।
नैपाल
से नाराज थाना पुलिस ने कहा कि अधिकारियों
से पूछो -किसी मुलजिम को पकड़ने जाती तो थाना पुलिस जाती। पुलिस लाइन्स का ट्रेनीज सब
इंस्पैक्टर पुलिस लाइस फोर्स के साथ कैसे गया?
हम
इस मांग को ही आगे बढ़ाते रहे। नैपाल मेरे घर लिखा -पढ़त में नहीं आया
था। न आ सकता था। अधिकारियों ने अपने को
घिरते देख नैपाल सिंह के विरूद्ध जांच शुरु करा दी। पुलिस ऐसा विभाग है कि फंसने पर सब अधिकारी बच जातें हैं । आगे आने वाला ही झेलता है।
दो
-तीन दिन बाद थाना पुलिस ने नैपाल सिंह को
शक्ति चौक पर वाहनों से वसूलयाबी करते
पकड़ लिया गया। उसके खिलाफ
कार्रवाई शुरू हुई। इसके 10- 15
दिन बाद नजीबाबाद बस स्टैंड के सामने
एक वर्कशाप पर नैपाल सिंह ने मोटर साइकिल
मरम्मत कराई थी। मरम्मत के पैसों को लेकर
विवाद हुआ । धक्का मुक्की हुई । नैपाल के खिलाफ
रिपोर्ट हुई।
सारे प्रकरण की जांच हुई।मेरे और वाहनों से वसूलयाबी को लेकर
नेपाल को दो बैड एंट्री लगी। उसका
ट्रेनिंग पीरियड़ छह माह के लिए बढ़ गया।
ये घोषणा तत्कालीन एसपी को प्रेस बुलाकर करनी पड़ा। नैपाल सिंह को जनपद से जाना पड़ा । कहां गया फिर पता नहीं चला। के के त्रिपाठी
बिजनौर कुछ समय रहे ।उन्होंने चाहा कि मैं
ये किस्सा भुला दूं पर मैं नही भुला पाया।
बरेली के साथियों ने इतना जरूर बताया कि त्रिपाठी का यह रहा है कि अपने पूर्व
साथियों का विरोध करने वालों को जाते ही
सबक सिखाने का प्रयास करता है।
अशोक
मधुप
अशोक मधुप
सोमवार को मैं दफ्तर में बैठा था कि एक फोन ने मुझे स्तब्ध कर दिया।
समझ नहीं आया कि क्या हुआ?, कैसे हुआ? कुछ देर मेरी चेतना शून्य सी हो
गई। एक ऐसा व्यक्ति जिसमें नेतृत्व का गुण था। मार्गदर्शन और निर्देशन की काबिलियत
थी। कभी मन भटका तो उनसे बात की और चुटकियों में समस्या का हल करने वाले अमर उजाला
के एमडी अतुल माहेश्वरी नहीं रहे, सुन कर यकीन नहीं हुआ। अतुलजी के
अचानक चले जाने की सुन गहरा आघात लगा। मेरे से उम्र में छोटे थे, लेकिन मेरे लिए एक अभिभावक
के रूप में रहे। मैंने 1977-78 के आसपास अमर उजाला बरेली में काम शुरू किया। उस समय एक
स्थानीय दैनिक में काम करता था। किसी बात पर बिजनौर के पे्रस कर्मचारी हड़ताल पर
चले गए,
इससे बिजनौर में निकलने वाले सभी समाचार पत्रों का प्रकाशन बंद हो
गया। हड़ताल 26 दिन तक चली। तब बिजनौर में अमर उजाला की 125 प्रतियां आती थीं। अखबार
के विस्तार को बेहतर मौका था। मैने आदरणीय अतुलजी से बात की। मैंने कहा कि प्रेस
एंपलाइज संकट में हैं। हम श्रमिकों की मदद कर अन्य अखबारों को ठप कर सकते हैं!
इससे हड़ताल लंबी चलेगी और हमारी प्रसार संख्या बढ़ जाएगी। उन्होंने मुझे समझाया
कि अखबार के प्रसार के लिए यह हथकंडा ठीक नहीं हैं। अतुलजी ने कहा कि हमें दूसरों
को नुकसान पहुंचा कर आगे नहीं बढ़ना चाहिए। हम बिजनौर मुख्यालय से निकलने वाले
अखबार के बंद होने पर प्रयास करें तो बेहतर है, लेकिन किंतु श्रमिकों को
धन देकर हड़ताल को लंबा चलाना ठीक नहीं है। ऐसा ही उस समय हुआ जब बिजनौर में श्री
सूर्यप्रताप सिंह डीएम थे। तहसील दिवस में जूस पीने से उनकी तबियत खराब हुई। एक
समाचार पत्र ने प्रकाशित किया की डीएम को मारने की कोशिश की गई। समाचार प्रकाशित
करने वाला स्थानीय दैनिक उस समय बिजनौर में सर्वाधिक प्रसार संख्या में था। इस प्रकरण
में कुछ कर्मचारियों पर कार्रवाई होनी तय थी। उस समाचार पत्र ने सिर्फ डीएम के
पक्ष को प्रकाशित किया। दूसरे पक्ष की उपेक्षा की गई। हमने दोनों पक्षों की आवाज
को लोगों के सामने लाने का प्रयास किया। हमनेजहर देने के प्रकरण की उच्च स्तरीय
जांच की आवाज उठाई। समाचार छापने का क्रम चल ही रहा था कि स्थानीय दैनिक ने अमर
उजाला परिवार से जुड़े आईएएस दीपक सिंघल के विरुद्घ समाचार प्रकाशित कर दिया। मेरी
अतुलजी से बात हुई। मैंने कहा कि हम भी उनके खिलाफ छापेंगे। अतुलजी ने स्पष्ट रूप
से इंकार कर दिया। बोले, अपनी लाइन लंबी करो, दूसरों की छोटी करने में
मत लगो। समय बीत गया। आज उस समाचार पत्र की प्रसार संख्या सिमट चुकी है। एक दिन
किरतपुर से लौटते समय अतुलजी मेरे साथ बिजनौर कार्यालय आ गए। वह जब मिलते थे, सभी परिचित और जानकारों के
बारे में पूछा करते थे। स्थानीय समाचार पत्र के बारे में चर्चा हुई। मैंने बताया
कि 400
या 500 प्रतियां ही छप रही हैं। उन्होंने कहा-याद है मैंने कहा
था कि अपनी लाइन बड़ी करते रहो।
यादों में लौटता हूं तो याद आता है कि मैं आज जिस मकान में रहता हूं
मकान मालिक उसे बेच रहे थे। उनका पहला ऑफर मेरे लिए था। मेरे पास इतने पैसे नहीं
थे। मैं बरेली गया था अतुलजी से बात हुई । मैंने कहा कुछ रुपयों की जरूरत होगी।
उन्होंने कहा बैनामा होने से एक दिन पहले बता देना। मैंने फोन किया तो रात को
टैक्सी से ड्राफट मिल गया।
बरेली से प्रकाशित होने वाले अमर उजाला में उर्दू शायर स्व. निश्तर
खानकाही व्यंग्य लिखते थे, मेरठ संस्करण में व्यंग्य छपना बंद हो गया। अतुलजी ने इस
बारे में मुझसे जानकारी मांगी। निश्तर खानकाही से मैंने पूछा तो उन्होंने कहा कि
कुछ लेख का पारिश्रमिक नहीं मिला है। मैने अतुलजी को बताया। अतुलजी ने शीघ्र ही
उन्हें पारिश्रमिक भिजवाया। अतुलजी के साथ बिताए गए छोटे से सफर में उनकी मदद करने
की फेहरिस्त बहुत लंबी है। अतुलजी ने कितने लोगों की मदद की, शायद यह उन्हें भी याद
नहीं होगा।
अतुलजी बहुत ही सरल और विनम्र थे। उनके साथ काम करते हुए कभी ऐसा
महसूस नहीं हुआ कि हम मालिक के साथ हैं। हमेशा उन्होंने दोस्ताना व्यवहार कायम
रखा। एक बार मै बरेली गया था। देर रात को टेलीपि्रंटर पर खबर आ गई कि रूस के
राष्ट्रपति नहीं रहे। कार्यालय के पत्रकार साथी गोपाल विनोदी वामपंथी विचारधारा के
थे। अतुलजी ने विनोदीजी एवं अन्य सभी साथियों को बुलाया। अतुलजी ने कहा कि रूस के
राष्ट्रपति का निधन हो गया है। शायद विनोदजी को मौका मिल जाए।
5december 2011 ke amar ujala me prakashit
सोमवार।करवा चौथ से ठीक एक दिन पहले। निर्मल गंगा अविरल प्रवाह 2010। अभियान में 30 बोटशामिल थीं। बड़ा काफिला
था।हरिद्वार से शुरू इस कारवां को गढ़मुक्तेश्वर पहुंचना था।काफिले में आईजी
इंटेलीजेंस आदित्य कुमार मिश्रा भी थे। एकाएक एक बोट का फ्यूल खत्म हो गया। हम भटक
गए। सात घंटे ‘गंगा मैया’-‘गंगा मैया’ करते बीते। अमर उजाला से जुड़े अशोक मधुप भी इसी बोट में थे। उन्हीं
की जुबानी पूरी कहानी...
बिजनौर।रात के 11 बजे थे। चारों ओर पानी ही
पानी।जाएं तो जाएं कहां? फ्यूल खत्म हो चुका था, हम रास्ता भटक गएथे। करें
तो क्या करें? इन सवालों को लेकर हर कोई नौकायान के समय भयभीत था।
स्वामी अच्युतानंद मिश्र और पीएसी उत्तर प्रदेश के द्वारा चलाए जा
रहे निर्मल गंगा अविरल प्रवाह यात्रा के साथ सोमवार को गंगा में बिताए आठ से
ज्यादा घंटे किसी रोमांचक यात्रा से कम नहीं। रात के 11 बजे तक गंगा में घुप
अंधेरे में नौकायन के महारथ की बदौलत रात साढे़ ग्यारह बजे गढ़मुक्तेश्वर के गंगा
घाट पर सकुशल पंहुचना एक करिश्मा जैसा ही है। वह तो उस हालत में जब एक-एक कर वोट
के पेट्रा्रल टैंक खाली होते जा रहे थे। इस यात्रा में हमारे एक साथी की तो तबियत
बहुत ज्यादा खराब हो गई और उसे रास्ते के एक गांव में परिवार में शरण लेनी पड़ी ।
बिजनौर गंगा बैराज से सोमवार की शाम साढे़ तीन बजे हमने जब यात्रा
शुरू की तो हमने सोचा भी नहीं था कि गंगा के बीच में घुप अंधेरे में हमें कई घंटे
ऐसे भी बिताने होंगे । हम यह सेचकर यात्रा की एक मोटर वोट में सवार हुए थे कि
चांदपुर क्षेत्र में बनने वाले मकदूमपूर सेतु पर उतर कर शाम पांच बजे तक बिजनौर आ
जांएगे। वैसे यात्रा को गढमुक्तेश्वर शाम पांच बजे तक पंहुचना था। मेरे साथ एक
पत्रकार अमित रस्तौगी और कांगे्रस के सीनियर नेता सुधीर पाराशर थे। वे बालावाली से
यात्रा के साथ आए थे। उन्होंने हमारे अनुरोध पर मकदूमपुर तक चलना स्वीकर कर लिया
था। वहां से लौटने के लिए अपनी गाड़ी मकदूमपुर बुला ली थी। बिजनौर से बैराज से 12 नाव का बेड़ा शाम साढे़
तीन बजे गढमुक्तेश्वर के लिए रवाना हुआ।
यात्रा को पांच बजे शाम गढमुक्तेश्वर पहुंचना था किंतु विदुर कुटी और
गंज दारानगर पहुंचने में ही शाम पांच बज जाने पर हमें चिंता हुई। मकदूमपुर पुल के
सामने से निकलते समय दिन छिपने लगा था। हमें यहां से छोटी धार से होकर अपनी गाड़ी
तक पहुंचना था किंतु अंधेरा बढ़ता देख हम अपने नाविकों से बेडे़ से अपनी नाव को
अलग धार में डालने का अनुरोध नही कर सके और गढ़मुक्तेश्वर से लौट आने का निर्णय
लिया। (संबंधित खबरें और फोटो पेज छह पर भी)
![]()
1)निर्मल गंगा अविरल प्रवाह दल की एक नाव सूर्यास्त के समय गंगा से
गुजरती हुई। (2) नाव से गुजरते महाराज अच्युतानंद।
निर्मल गंगा अविरल प्रवाह दल की नाव में गंगा से होकर गुजरते महाराज
अच्युतानंद।
ऐसा तो कभी भी नहीं सोचा था!
बिजनौर। निर्मल गंगा अविरल यात्रा के साथ सफर करते समय यह कभी नहीं
सोचा था कि सुबह पांच बजे घर वापसी होगी। इरादा यह था कि गंगा के बीच से जनपद के
नजारे देखकर शाम पांच बजे तक बिजनौर लौट आया जाएगा। कल दुपहर दो बजे अमर उजाला के
संवाददाता कुछ पत्रकार साथियों के कहने पर
मकदूमूपुर तक चलने को तैयार हो गए।
लंबे समय से मेरा इरादा गंगा के मध्य से
जनपद को देखने का था। उसके प्रस्ताव आने पर मैं इंकार न कर सका। कांगे्रस के
वरिष्ठ नेता सुधीर पाराशर स्वामी अच्युता नंद के नजदीकी है, वे पीछे से यात्रा के साथ
आए थे। सो हमने मकदूमपुर तक उन्हें साथ चलने के लिए तैयार कर लिया और कहा कि अपनी
गाड़ी वहीं मंगा ले, उससे लौट आएंगे। यात्रा बिजनौर से चलकर शाम पांच बजे गढ़मुक्तेश्वर
पहुंची थी तो हम यह सोचकर यात्रा के साथ हो गए कि अब चलकर पांच बजे तक बिजनौर आ
जाएंगे। बिजनौर गंगा बैराज पर स्वामी अच्युतानंद और अन्य ढाई बजे गंगा घाट पर आ गए, लेकिन चलने में साढे़ तीन
बज गए। मकदुमपुर से पहले एक जगह बोट रुकी तो एक पत्रकार साथी नौका दल के लीडर
पीएसी के आईजी की बोट में उनका इंटरव्यू करने को बैठ गया। सुधीर पाराशर के चालक ने
बताया कि पुल के सामने से मेन धार की जगह छोटी धार में आए। यहां पहुंचते ही अंधेरा
छाने लगा था, अत: हम चालकों से यह न कह सके कि गु्रप छोड़कर वे अपनी वोट छोटी धार
में ले चले। कार्यालय को विलंब हो रहा था। परिजनों को बिना बताए आने की चिंता भी थी, लेकिन बेडे़ को छोड़ने का
हम नाविकों से आग्रह न कर पाए और यह सोचकर बैठ गए कि यहां प्रतिवर्ष बनने वाले नाव के पुल का
रास्ता छोड़ने पर उतर जाएंगे। इस रास्ते के सामने गंगा में कुछ व्यक्तियों को ले
जाती एक नाव दिखाई दी। हम उसमें सवार होना भी चाहते थे, लेकिन एक साथी के दूसरे
नाव में होने के कारण नहीं उतरे और तय कर लिया कि गढ़मुक्तेश्वर से लौट आएंगे।
सुधीर पाराशर ने अपनी गाड़ी के चालक को गढमुक्तेश्वर पहुंचने को कह भी दिया।
अंधेरा होने पर एक साइड में सब बोट रोकी गई और एक साथ चलने के निर्देश दिए गए।
इससे पहले अंधेरा होते देख किसी अनहोनी की आशंका को रोकने और इसका सामना करने के
लिए मैने और सुधीर ने लाइफ सेविंग जैकेट पहन ली थी। जैकेट पहनते समय मेरा इरादा
अंधेरा होने के साथ बढ़ती ठंड से खुद को बचाने का था।
दल में थी 12 बोट
यात्रा दल में 12 बोट थे। प्रत्येक बोट में तीन, चार यात्री और तीन तीन
पीएसी के नाविक थे। एक बोट में यात्रा के संरक्षक स्वामी अच्युतानंद अपने शिष्यों
के साथ थे। एक में पीएसी के आईजी आदित्य मिश्रा अपने अन्य अधिकारियों के साथ थे।
अन्य नावों में टीम के अन्य सदस्य हमें मिली वोट में तीनों चालक थे। रेत में फंसने
पर मोटर चलाने वाला दूसरे चालकों से चप्पू चलाने को कहता। अन्य दोनों चालकों की
हालत यह थी कि वह चप्पू एक साथ नहीं चलाते थे। कभी नाव बाएं भागती तो कभी दाएं और
मोटर चालक के टोकने पर वह सुधार करते। अंधेरे में कुछ भी न दिखाई देने पर मन में
भय था और चिंता भी। किंतु उनकी बातों से यह सब भय खत्म हो रहा था और उनकी बातों
में आनंद आ रहा था। रेत आने पर नाविक पानी में डंडा डालकर उसका जल स्तर नापते।
पानी मिलने पर मोटर चला दी जाती, जबकि रेत मिलने पर नाविक नाव चप्पू
से खेते या उतरकर पानी में खींचते।
रेत आने पर मोटर बंद कर ऊपर उठा दी जाती और पानी मिलने पर स्टार्ट कर
दी जाती।
द्
रास्ता भूल गए और गोल-गोल घूमने लगे
बिजनौर।अंधेरा होने पर हम एक जगह रास्ता भूल गए और गोल-गोल घूमने
लगे। सब वोट आमने-सामने पानी में फैल गई। इस नौकायान के समय मुझे याद आ गया
महाभारत सीरियल का दृश्य। इसमें भी गीता उपदेश के समय भी सारे महारथी ऐसे ही खडे़
दिखाये गए थे।
रात होने पर दिखाई देना बंद हो गया। दूर दूर तक जल ही जल नजर आ रहा
था। आकाश में चांद चमक रहा था किंतु तनाव और चिंता के माहौल में उसे निहारने में
किसी की रूचि नही थी। पानी कम होने पर मोटर बंद कर वोट खींचकर पानी में लाने और
उसे आगे बढा़ने का सिलसिला रात साढे़ 11 बजे तक तक जारी रहा।
रात नौ बजे से स्टीमर के पेट्रेल खत्म होने का भय सताने लगा। थोड़ी
देर में एक मोटर वोट के तेल खत्म होने की सूचना आ गई। हालत यह कि कहीं कोई रोशनी
भी नजर नही आ रही। सब चारों ओर टकटकी लगाए देखते जा रहे थे। गढ़मुक्टेश्वर की लाइट
देखने को आखें फाड़ रहे थे। एक जगह रोशनी और कुछ मंदिर दिखाई दिए। यहां घट पर
मौजूद हमारे एक साथी ने बात की और गढ़ के छह सात किलोमाटर दूर बताने पर हमारा
काफला आगे चल दिया। 11 बजे के आसपास गढ़मुक्टेश्वर के रेलवे पुल की लाइट दिखाई
देने पर सफर का पड़ाव नजर आने लगा । आधा किलोमीटर पहले हमारे वोट का भी पेट्रोल
खत्म हो गया ।
अब तक पांच वोट के इंजिन बंद हा चुक थे । हम एक वोट को खींचकर ला रहे
थे। हमारे चालक नें बंद इंजिन वाली वोट के चालक से एक बार इंजिन चलाकर देखने को
अनुरोध किया। कोशिश पर वोट का इंजिन चल गया और अब उसने हमारी वोट को घाट तक
पंहुचाया। शाम पांच बजे बिजनौर पंहुचने वाले हम सबेरे पांच बजे ट्रकों से बैठकर
किसी तरह बिजनौर पंहुचे।
गढ़मुक्तेश्वर पहुंचे 11.30 बजे
हम साढे़ ग्यारह बजे गढ़मुक्तेश्वर घाट पर पहुंच गए। स्वामी जी तथा
नौकाएं दल के पीएसी के जवानों का स्वागत चल रहा था। हम सुधीर पाराशर और उनके साथी
को खोज रहे थे। पता लगा कि वह उस नाव में है, जिसका तेल सबसे पहले खत्म
हुआ। हम उनके आने का इंतजार करने लगे। इनकी गाड़ी भी नहीं मिली। एक बजे एसपी पीएसी
एक दुकान पर चाय पीते मिले। उन्होंने बताया कि सुधीर पाराशर व उनके साथी तिगरी में
उतर गए हैं और वहीं पर उन्होंने गाड़ी मंगा ली है
![]()
![]()
![]()
मेरा यह
यात्रा संस्मरण सत्ताइस
अक्तूबर के
अमर उजाला मेरठ में छपा
है
धनाभाव से जूझते रहे पर टूटेे नहीं
गगन के हिंदुस्तानी मुुसलमान नंबर ने उन्हें मशहूर कर दिया
फोटो
अशोक मधुप
उर्दू के जाने माने पत्रकार- लेखक शम्स कंवल
1925 में बिजनौर के एक मुस्लिम जमींदार ख़ानदान में पैदा हुए । बचपन
में सुंदर होने के कारण उनके दादा शम्सुद्दीन को
जमील कह कर बुलाते थे। 1945 में बिजनौर के गवर्मेंट हाई
स्कूल से मैट्रिक पास किया। शम्स कवंल का स्कूल की किताबों से अधिक साहित्यिक
पुस्तकों में मन लगता था। 1945
में मुरादाबाद इंटर काॅलेज से इंटर तथा लखनऊ से 1951
ग्रेजुएट किया। अपना नाम शम्स कंवल रख लिया । इसी नाम से कोमी आवाज़ लखनऊ में फिल्म
एडिटर के तौर पर नौकरी करने लगे।
1952 में उन्होंने लखनऊ से अपनी फ़िल्मी 15 दिवसीय पत्रिका ‘ साज़‘ निकाली।
क़रीब डेढ़ साल के बाद ये पत्रिका बंद हो गई। 1953 में दिल्ली
आ गए और ‘फ़िल्मी दुनिया‘ में
सहायक संपादक बने ।1954 में ‘ रियासत‘ साप्ताहिक में असिटेंट एडिटर नियुक्त हुए।
रोटी रोज़ी के लिए कई अख़बार व रिसालों में आलेख लिखे।
1954 में मुंबई
चले गए। यहां उनको इंक़लाब अख़बार में फ़िल्म एडिटर की नौकरी मिल गई।1956 में उन्होंने फ़नकार साप्ताहिक अख़बार में संपादक हो गए। क़रीब डेढ़ साल के
बाद शम्स जी फ़नकार से अलग हो गए।1959 में उन्होंने अपना
साप्ताहिक फ़िल्म रिपोर्ट प्रकाशित किया । पैसों की तंगी में ये बंद हो गया। 1962
तक लगातार वे फिल्मी अख़बारों और रिसालों में आलेख, फिल्मी शख़्सियतों पर लेख, फ़िल्मों पर समीक्षा आदि
लिखते रहे।पाठक उनके लेखन के आनंद में मग्न रहते और नई तहरीरों के
मुंतज़िर रहते। उनकी आश्चर्यजनक संवेदनशील अभिव्यक्ति
उनके गहन और गौण अध्ययन के द्वारा पाठकों के मन पर हुकूमत करने लगी।
गगन का प्रकाशन और सफर
मुबई के बड़े साहित्यकार और शम्स साहब के लंबे समय तक नजदीकी रहे
असीम काव्यानी के अनुसार उन्होंने अपनी अथक मेहनत और विद्वता के बल पर उल्हास नगर से
‘गगन‘ मासिक का फ़रवरी 1963 में प्रकाशन शुरू किया। वे इसके संपादक ,
पैकर और पोस्ट करने वाले ख़ुद ही थे। उनकी पत्नी शहनाज़ कंवल एक
अच्छी और प्रसिद्ध कहानीकार है।ख़र्च में बचत के लिए उन्होंने
किताबत सीखी और गगन की किताबत लगीं। शम्स साहब ने 22
साल के सफर में गगन के दो विशेषांक
निकाले।1975 में ‘हिंदुस्तानी
मुसलमान नंबर‘ 618 पृृष्ठ और 1984 में
मज़ाहिबे आलम नंबर 1240 पृृष्ठ।
हिंदुस्तानी मुसलमान नंबर में हर फ़िरक़े व हर
ख़्याल और नज़रिए के क़लमकारों के आलेख इकट्ठा किए गए हैं। इसमें मुसलमानों की
एतिहासिक, राजनैतिक, सामाजिक और
धार्मिक मुद्दों पर बहस की गई है। ये एक एंसाइक्लोपीडिया का दर्जा रखता है।
मुस्लिम राजनैतिक आंदोलन, धार्मिक संस्थाएं, मुस्लिम बुद्धिजीवियों की जीवनियां व लिस्ट,उनके
भाषणों के अंश आदि के साथ ख़ुद शम्स कंवल का आलेख
शामिल हैं।बाल ठाकरे,कृृष्ण चंद्र,कुंवर
महेंद्र सिंह बेदी,गोपाल मित्तल, प्रो
डब्लू बी स्मिथ, बसंत कुमार चटर्जी आदि के आलेख संकलित हैं।
इस विशेषांक की धूम चारों ओर मची। कई वर्षों तक ये
विशेषांक लोगों के ज़हनों में हलचल मचाता रहा। आज भी इस संकलन की चर्चा अक्सर होती
रहती है।
मज़ाहिबे आलम नंबर आम पाठकों को रूचिकर न लगा। न ही लागत का पैसा
वापस आ सका । मजबूरन
गगन का प्रकाशन बंद हो गया।
दिल्ली की लेखिका
रकशंन्दा रूही मेहंदी के अनुसार शम्स जी 1985 में अपने
वतन बिजनौर वापस आ गए। मुंबई में 30 वर्ष में 30
किराए के मकान बदले। कुछ दिन बिजनौर में गुज़ारने के बाद पुश्तैनी
मकान में से अपने हिस्से की रक़म से 1985 में अलीगढ़ में अपना घर ‘सलामा‘ तामीर
करवाया और वहीं बस गए।
लेखन चलता रहा, बड़े व प्रसिद्ध रिसालों में उनके आलेख प्रकाशित
होते रहे।अक्तूबर 1994 में एक बार फिर मासिक रिसाला ‘उफ़क़ ता उफ़क़ का प्रकाशन शुरू किया। इसके छह अंक
ही निकल सके । उनकी सेहत ख़राब होने लगी। । अंत समय
में सपत्नीक बिजनौर आ गए। आठ अक्तूबर 1995 को बिजनौर में
अपने मकान में आखिरी सांस ली।
चाय के रसिया थे शम्स कंवल
शम्स साहब के जानकारों के अनुसार शम्स
कंवल चाय के रसिया थे। 40 सिग्रेट रोज़ पीना उनका शौक था।
लगभग शाकाहारी थे। 40 वर्ष की उम्र में खुद ही सिग्रेट
छोड़ दी। वो बदला लेने में यक़ीन रखते थे। माफ़ करना उन्हें नापसंद था।
उनके इस बर्ताव ने उनके बहुत से दुश्मन पैदा कर दिए थे। घूमने फिरने से उन्हें
दिलचस्पी न थी। किताबें पढ़ने से उनको बेपनाह दिली ख़ुशी मिलती थी।वे एक तरह से
नास्तिक थे। आदर्शवादी नज़रिए के वे मानने वाले थे। उर्दू
ज़बान को सही पढ़ने और लिखने पर ज़ोर दिया। एमर्जेंसी के
वो तरफ़दार थे। वे सदा अपने बनाए नज़रियात पर क़ायम रहे।
अशोक मधुप
मेरा यह लेख अमर उजाला मेरठ
के 25वें साल में प्रवेष पर मेरठ के सभी संसकरण में छपा
है
सच के लिए दी कुर्बानी, किसी को मौत तो किसी को मिली जेल
हर मुश्किल वक्त की कसौटी
पर खरा उतरा अमर उजाला,
दफ्तर में आग लगी तब भी
अखबार का प्रकाशन नहीं होने दिया प्रभावित
अमर उजाला सदैव सत्य का
पक्षधर रहा है। चाहे उसके पत्रकारों को एनएसए लगाकर जेल डालने का प्रयास किया गया
हो या फिर सचाई को उजागर करने वाले पत्रकारों की हत्या की गई हो, अमर उजाला के कदम हर मुश्किल वक्त में निर्बाध रूप से आगे बढ़ते रहे।
24 वर्ष के स्वर्णिम सफर में समाज को जागरूक करने के
साथ-साथ अमर उजाला अपने अंदर भी कई बदलाव लाया है। इस सफर में अमर उजाला को कई
खट्टे-मीठे उतार चढ़ाव का भी सामना करना पड़ा है।
अमर उजाला मेरठ के प्रकाशन
के कुछ समय बाद ही उत्तरांचल के साथी उमेश डोभाल की वहां के शराब माफियाओं ने
हत्या कर दी, तो एक रात आफिस से कार से घर लौटते समय ट्रक से
टकराने पर डेस्क के साथी नौनिहाल शर्मा काल के गले में चले गए। अमर उजाला के गंगोह
के साथी राकेश गोयल पर प्रशासन के विरुद्ध खबर लिखने पर एनएसए लगी। भाकियू के
आंदोलन में स्वामी ओमवेश के साथ लेखक को भी एनएसए में निरुद्ध करने का प्रयास
किया।
_____________________________________________________________________
सच के लिए दी कुर्बानी, किसी को मौत तो किसी को मिली जेल
हर मुश्किल वक्त की कसौटी पर
खरा उतरा अमर उजाला, दफ्तर में आग लगी तब भी अखबार का प्रकाशन नहीं होने
दिया प्रभावित
बिजनौर में बरेली से अमर
उजाला आता था। बरेली की दूरी ज्यादा होने के कारण समाचार समय से नहीं जा पाते थे।
सीधी फोन लाइन बरेली को नहीं थी। कभी मुरादाबाद को समाचार लिखाने पड़ते तो कभी
लखनऊ को। एक-दो बार दिल्ली भी समाचार नोट कराने का मौका मिला। ऐसे में तय हुआ कि
बिजनौर को सीधे टेलीपि्रंटर लाइन से जोड़ा जाए। इसके लिए कार्य भी प्रारंभ हो गया।
एक दिन श्री राजुल माहेश्वरी जी का फोन आया कि टीपी लाइन बरेली से नहीं मेरठ से
देंगे। वहां से नया एडीशन शुरू होने जा रहा है।
मेरठ में कहां, क्या हो रहा है?, यह जानने
की उत्सुकता थी तो मै और मेरे साथी कुलदीप सिंह एक दिन बस में बैठ मेरठ चले गए।
मेरठ में वर्तमान आफिस की साइड में पुराना आफिस होता था। उसके हाल में एक मेज पर
राजेंद्र त्रिपाठी बैठे मिले। राजेंद्र त्रिपाठी ने पत्रकारिता बिजनौर से ही शुरू
की थी, इसलिए पुराना परिचय था। उन्होंने मेरठ के
प्रोजेक्ट की पूरी जानकारी दी और पूरी यूनिट लगाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।
12 दिसंबर 1986 का दिन आया और समाचार पत्र का पूजन के साथ शुभारंभ हुआ। बिजनौर के
लिए समाचार पत्र नया नहीं था। पूरा नेटवर्क भी बना था सो परेशानी नहीं आई। बिजनौर
में समाचार पत्र लाने-ले जाने के लिए बरेली की ही टैक्सी लगी। बिजनौर-बरेली रूट पर
एंबेसडर गाड़ी लगी । इसका चालक लच्छी था। कई दिन उसके साथ अखबार मेरठ से लाना
पड़ा। फरवरी 87 में हरिद्वार लोकसभा क ा उपचुनाव हुआ। चूंकि अमर
उजाला का नेटवर्क पूरी तरह नहीं बना था, इसलिए
मुझे उस चुनाव का कवरेज करने के लिए भेजा गया और मैने पूरे चुनाव के दौरान रुड़की
और हरिद्वार से चुनाव कवरेज भेजी।
तब टाइपराइटर से अखबार छापा
गया
अमर उजाला मेरठ को इन 24 साल में कई खट्टे-मीठे अनुभव का सामना करना पड़ा। पहले समाचार टाइप
होते । उनके पि्रंट निकलते और उन्हे पेज के साइज के पेपर पर चिपकाया जाता था। अब
यह काम कंप्यूटर करता है। समाचार के पि्रंट निकालने के लिए दो पि्रंटर होते थे। एक
पि्रंटर खराब हो गया। उसे ठीक करने इंजीनियर दिल्ली से आया किंतु वह खराबी नहीं
पकड़ पाया। उसने खराब प्रिंटर को सुधारने के लिए चालू दूसरे प्रिंटर को खोल दिया, जिससे चालू प्रिंटर भी खराब हो गया। ऐसे में समस्या पैदा हो गई कि
कैसे अखबार निकले? तय किया गया कि खबरें टाइपराइटर पर टाइप करवाई
जाएं। सो कुछ पुरानी खबरें , कुछ
इधर-उधर से आए समाचार लगाकर अखबार निकाला गया। इस अंक की विश्ेष बात यह रही कि
इसमें अधिकतर खबरें और उनके हैडिंग टाइपराइटर से टाइप किए थे।
आग भी नहीं रोक पाई संस्करण
को
ऐसे ही एक रात शॉर्ट सर्किट
से अमर उजाला मेरठ के कार्यालय में आग लग गई । करीब सौ कंप्यूटर जल गए। ऐसी हालत
में अखबार निकालना एक चुनौती थी। किंतु अगले दिन का अंक पूर्ववत: निकला और अखबार
पर इस घटना का कोई असर दिखाई नहीं दिया। अमर उजाला का विस्तार क्षेत्र कभी
गाजियाबाद नोएडा दिल्ली,
बुलंदशहर और पूरे गढ़वाल
में था। प्रसार बढ़ने के साथ नए-नए संस्करण निकलते चले गए।
श्याम-श्वेत से रंगीन तक का
सफर
24 साल में अमर उजाला में बहुत परिवर्तन आया आठ पेज
का अखबार आज औसतन 20 पेज पर आ गया। श्याम-श्याम में छपने वाला अमर
उजाला आज पूरी तरह रंगीन हो गया। पहले स्थानीय महत्वपूर्ण समाचार अंतिम पेज पर
छपते थे और बाकी उसी के पिछले के पेपर पर छपती थी। इसके बाद पेज पांच से स्थानीय
समाचार छपने लगे और अब ये पेज दो से शुरू होने लगे। अनेक प्रकार के झंझावात और
परेशानी को झेलते हुए अमर उजाला मेरठ 25 साल में
प्रवेश कर रहा है। किंतु वह अपने रास्ते से नहीं भटका। जनसमस्या उठाने से कभी मुंह
नहीं मोड़ा। समय के साथ कदम से कदम मिलाने में कभी झिझक नहीं महसूस की। समाचार
पत्र नए जमाने के तेवर और तकनीक से तालमेल बनाने के प्रयास हमेशा जारी रहे।
• अशोक मधुप

दो दशक तक मुझे अमर
उजाला नहटौर में संवाददाता के रूप में काम करने का मौका मिला।इसका सारा श्रेय अशोक
मधुप जी जिला प्रभारी को जाता है। उनके
सानिध्य और
छत्रछाया में रहकर पत्रकारिता के गुर सीखे और खबरों की दुनिया के कटु अनुभव को आत्मसात
किया।खबरों के संकलन और लेखन
में उनकी नसीहत सदैव मार्गदर्शक बनीं।परन्तु पत्रकार साथियों के साथ समय− समय
पर होने वाली शत्रुवत हिंसक घटनांए सबको विचलित कर डालतीं। उक्त घटनाओं को ज्यादा दिनों तक महत्ता देना हमारे अखाबार
का ट्रेड भी नहीं था।इन विषम परिस्थितियों में मधुप जी अपने आला अफसर से अपने पसर्नल संबंध, सूझबूझ और अथक प्रयास से कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेते। इससे पत्रकार साथी का मान सम्मान बच जाता।
जिले के अफसर में मधुप जी का बेहद सम्मान और रूतबा था। अधिकारी उनके मुंह से निकले शब्दों
का पूराकरने में गर्व महसूस करते थे।
ऐसे अनेक मसलों का लेखक स्वयं साक्षी रहा है।ऐसा ही एक वाक्या अचानक मुझे याद आ गया।
बोर्ड परीक्षाओं में नकल की खाबर उस जमाने में आम थीं। मगर उस
वर्ष नहटौर के एक शिक्षक नकल की खबर न
छपने की पेशाबंदी पर उतर आए। मेरे एक रिशतेदार ने मुझे
उनकी धमकियों से अवगत कराया और मुझे इस मामले से दूर रहने की सलाह दी। इस धमकी
को मैं शांत मन से सुनकर सहन कर गया, मगर पत्रकारी जहन ने अपने आंख कान खुले रखे।
उधर शिक्षक दूसरे काँलेज के छात्रों का सैंटर अपने काँलेज में लगाकर नकल कराने के
कार्य में लग गए।बोर्ड परीक्षा से कई माह
पहले ये काम पूरा हो गया। इन खबर को अमर उजाला में न छपा देख शिक्षक ने इसे अपनी धमकियों का असर माना। उसने
जमकर अपनी पीठ थापथापाई।
बोर्ड परीक्षा की पूर्व
संध्या पर मेरे द्वारा ये सारा मामला मधुप जी संज्ञान में लाया गया। उन्होंने जिला विद्यालय निरीक्षक से इस बारे में बात की। उनका
फोन जाते ही उक्त काँलेज पर कक्ष निरीक्षकों
की डयूटी रातों रात बदल दी गई।अगले दिन सवेरे ही सचल दल की जीप शिक्षक महोदय के घार के सामाने
जाकर खड़ी हो गई। जीप का हार्न सुन परीक्षा डयूटी के लिए जाने को तैयार शिक्षक घर
से बाहर आए।डीआईओएस का नया आदेशा पाकर उनके हाथ के तोते उड़ गए।
आदेश मे अपरिहार्य कारणों से उनकी डयूटी कक्ष निरीक्षक से हटाकर सचल दल में लगाई गई थी।
मजबूरन उन्हें सचल दल के
साथ जाना पड़ा।उसी साल नहीं ,कई साल
लगातार वह सचल दल में शामिल रहकर परीक्षा
काल में पूरे जिले में घूमते फिरे।
ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब मधुप जी अपने पत्रकार साथी
पर आने वाली आंच से पहले ही ढाल बन गए।खबरों
की दुनिया से हटकर भी उन्होंने अपने साथियों की समस्या,
मुसीबत और बुरे काम में हमेशा संकट
मोचक की भूमिका निभाई। उस समय अमर उजाला
में सीनियर्स को भाई साहब कहने का चलन था।, परंतु भाई साहब के फर्ज और गरिमा को जिस अपनत्व और जिम्मेदारी के साथ अशोक मधुप जी ने निभाया,उसको
जीते जी भुलाया नहीं जा सकता।
एम असलम सिद्दीकी, नहटौर

Comments
Post a Comment