पत्रकार संतोष वर्मा

 

पत्रकार संतोष वर्मा

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो जीते जी तो कष्ट देते हैं , मरने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ते ।ऐसे ही एक  पत्रकार थे संतोष वर्मा ।संतोष वर्मा पतले −दुबले लंबे कुर्ता पजामा पहनते थे। मवाना मेरठ के रहने वाले मेरठ अमर उजाला में बिजनौर डैस्क पर काम करते थे। डैक्स से परिचय हुआ तो पता लगा उनकी ससुराल नहटौर में हैं। अवकाश के दिन उनका ससुराल आना− जाना रहता । ससुराल आते  तो ऑफिस भी आते ।  ऑफिस आते तो सदा कुछ ना कुछ उल्टा−सीधा बताते। कभी  कहते कि अमर उजाला के   मालिक तुमसे नाराज है। तुम्हारी बहुत शिकायत हैं ।तुम्हें हटाने जा रहा हैं। जब भी  आते  एक नया तनाव देकर जाते। एक बार इसी दौरान मेरा  मेरठ जाना हुआ। मेरठ में  मैं अमर उजाला के मालिक  अतुल माहेश्वरी के सामने बैठा था। उन्होंने कहा  कि आजकल आप मन से काम नहीं कर रहे। सब ठीक तो है। मैंने कहा कि मैं तो आपके आदेश का इंतजार कर रहा हूं ।उन्होंने कहा  कैसा आदेश। मैंने कहा −अमर उजाला से हटाने का ।वह बोले कि यह बात आपसे किसने कही तो मैंने साफ-साफ बता दिया की अवकाश के दिन संतोष शर्मा नहटौर ससुराल  हैं । ससुराल जाते तो कुछ देर बिजनौर रूकते ।सदा उनका यही कहना रहता कि आपसे अतुल जी बहुत नाराज हैं। कभी भी हटा सकते  हैं।उस समय संतोष शर्मा की एक्सीडेंट में टांग टूटी हुई थी ।वह ऑफिस नहीं आ रहे थे ,इसलिए अतुल जी ने कुछ कहा  नहीं।  सिर्फ मेरे से कहा कि फालतू का तनाव लेने की क्या जरूरत थी ।एक बार मुझे टेलीफोन तो कर लेते । जब कभी कुछ ऐसी बात सामने आए  तो मुझसे बात कर लिया करो। बात आई गई हो गई। संतोष शर्मा का आना−जाना  कम हो गया। वे हमारे साथ श्रमजीव पत्रकार यूनियन के टूर में   पांडिचेरी गए तो  उनके बहुत से गुण पता  चले। बिजनौर के एक  परिवार  हमारे साथ उस टूर में थे।  उकी तीन बेटी भी साथ थी।ये  पत्रकार पीने – खाने के शौकीन थे। संतोष शर्मा पूरे टूर  में इस परिवार के साथ रहे ।उन्ही के साथ  पीते− खाते रहे।  उस परिवार पर पैसा लगाते  रहे। वापिस लखनऊ पहुंचने पर मुझसे कहा यार पैसे खत्म हो गया।  मवाना  तक जाना है।  200 चाहिएं। मन नही था किंतु मैंने रुपए दे  दिए। इसके बाद संतोष वर्मा जी का उस परिवार में आना −जाना शुरू हो गया। हमारे पास आना  बंद हो गया। अब तो  अवकाश में वे वही आते , वही खाते −पीते आराम करके चले जाते हैं ।इसके बाद भी यदा कदा आए  तो फिर जरूरत में रूपये लेने के लिए। मेरी यह पहले से आदत रही कि मैं किसी भी हालत में किसी को मना नहीं करता ,जितना बन पड़ा ,उन्हें दे देता।

वक्त ऐसे ही चल रहा था कि संतोष शर्मा का अपनी पत्नी से झगड़ा हो गया ।पत्नी बच्चों को लेकर अपने मायके आ गई ।उनकी पत्नी ने  जो बातें बताईं वह बड़ी कष्ट कर थीं। उनका कहना था कि वह वर्मा जी की दूर की साली  है ।वह कई बार हमारे घर आती   है। जब तक वह आती है  तो वर्मा जी बहुत प्रसन्न रहतें हैं।साली शराब के पैग  बनाकर देती है,वर्मा जी पाते रहते हैं। वह पत्नी विरोध  करती है तो वर्माजी उससे  बुरी तरह मारपीट करते।उनकी पत्नी का कहना था कि उनके जो हाथ लग जाता, वह मारते।लाठी− डंडा जो भी। पीटते− पीटते  वह गिर जाती तो पेट  पर पैर रख लेते और कहते उठ− उठ । न उठने पर उठाने के लिए स्तन पकड़कर खींचते।  इसमें कई बार कपड़े फट जाते।बच्चों को भी बुरी तरह से मारपीट करते।

इससे  मुझे  याद आया कि पांडिचेरी टूर में उनके साथ  तीन चार साल का एक बेटा भी था।एक जगह हम खड़े  थे। वह बेटे का हमारे से कुछ दूर खड़ा  करके चले  गए।  वर्मा जी आधे घंटे में लौटे। हमने  उनके बेटे को कई  बार आने पास बुलाया किंतु  वह खड़ी की  जगह से जरा भी नही हिला।कुछ समय बाद में उन्होंने  अमर उजाला छोड़ दिया।  पता  चला कि मोदीनगर चले गए। वहां किसी अखबार में काम कर रहे हैं।फिर सूचना  मिली की नहटौर आए थे और गोद की अपनी बेटी को  उठकर ले गए।  उनके विरूद्ध मुकदमा  दर्ज हुआ।  पुलिस ने पकड़कर जेल भेज दिया।हालाकि आदरणीय अतुल जी उनसे बहुत नाराज थे, किंतु वर्मा जी की मां अतुल जी के पास जाकर रोई−धोई  तो  उनका फोन  आया कि संतोष की जमानत करा लो।

ये सन 2000  क मामला है।  मैंने जमानत कराली।संतोष वर्माजी ने गाजियाबाद कोर्ट में  तलाक का मामला डाल दिया। इसमें जजमेंट की तारीख लग गई।  पता चला कि उत्तरांचल में उन्होंने कहीं शादी तै कर ली।तलाक के केस में निर्णय से अगले दिन शादी होनी निर्धारित हो गई। निर्णय के दिन जज अवकाश पर चले गए।इन्होंने शादी कर ली। बिना तलाक दूसरी शादी पर लड़की का परिवार अकड़ गया।कहा कि मुकदमें से  बचना है तो  सब हमारे नाम कर दो।सब कुछ नाम करने के बाद वर्मा जी का पीछा छूटा।  

इस दौरान वर्मा जी देहरादून आकर किसी अखबार में नौकरी कर रह थे। सात दिसंबर 2012 को उनकी देहरादून के दून अस्पताल में मौत हो गई।  हालत यह रही कि पूरे परिवार वाले  व्यक्ति की मौत लावारिस के  रूप में हुई।  कोई शव को लेने वाला भी नही था।  मेरे कहने पर उनकी पहली नहटौर की पत्नी और बेटे ने जाकर शव का अंतिम संस्कार किया। वर्मा जी 2012 में मर गए किंतु उनकी भूत अभी तक पीछा नही छूट गया। अब लडकी के अपहरण वाला केस शुरू हुआ तो  वर्मा जी का कुछ पता नही चला।  मुरादनगर पुलिस ने लिखकर भेज दिया कि इस नाम का यहां कोई  नही रहता।मजबूरन कोर्ट ने मुझ  जमानती को खोजा। मैंने और मेरे  कहने पर बिजनौर के शिव ओम उर्फ मुन्ना  बंदूक वालों ने 15− 15 हजार की जमानत ली थी। अब कोर्ट का हम पर सम्मन आया कि जमानती को पेश  करो।  वर्मा  जी मुलजिम के समय मोदीनगर में रहते थे। पेपर मे  उनका  वहां का  पता है। अस्पताल में देहरादून का। साथी कुलदीप सिंह बोले कैसे साबित होगा कि ये एक ही व्यक्ति है?  इसलिए जमानत की रकम जमाकर पीछा छुड़ाओ। संतोश वर्मा 2012 में मर गए कितुं  उनकी भूत अब भी पीछा  नही छोड़ रहा। मरने  के बाद भी खून चूंस रहा है।   तीस हजार का खर्च है। मैने साथी कुलदीप सिंह से कहा कि जमा तो करना ही है, देख लो कुछ कम हो जाए  तो। 11 नवंबर तारीख लगी है।देखिए वर्मा जी  का भूत  कितने में मानता है।

तीन नवंबर 2023

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