बहुत बलिदानी रहा है बिजनौर का पत्रकारिता का इतिहास
पत्रकारिता दिवस पर
बहुत बलिदानी रहा है बिजनौर का
पत्रकारिता का इतिहास
अशोक मधुप
बिजनौर,
जनपद के पत्रकारों का भी बहुत बलिदानी इतिहास रहा
है।इन्हें जेल में बंद किया गया हो या गोलीमारी गई हो किंतु जुल्म के आगे इन्होंने
घुटने नहीं टेके। पत्रकारों ने सच्चाई के रास्ते से मुंह नहीं मोड़ा और अपनी कलम
की ताकत से समझौता नही किया।
आजादी की लड़ाई में जनपद के समाचार पत्र मदीना का
क्रांतिकारी इतिहास रहा है। मौलवी मजीद हसन ने 1912 में
उर्दू मदीना त्रिदिवसीय की स्थापना की थी। स्थापना के बाद से ही यह अंग्रेजों की आंख
का कांटा बन गया। मदीना का प्रत्येक संपादक जेल गया। मदीना प्रबंधन संपादक के जेल
रहने के दौरान उनका पूरा वेतन तो देता ही था, इस
दौरान संपादक के परिवार का पूरा खर्च उठाता था। जब जनपद में बिजली नहीं थी, उस
समय इस पत्र की पूरी दुनिया में मांग थी। मदीना की 50 हजार
प्रतियां छपती थी। कुछ दिन यह दैनिक भी रहा। महात्मा गांधी और नेहरू तक मदीना
अखबार के कार्यालय आए थे।
जलियावालां बाग कांड के बाद मदीना के प्रशासन पर
सरकार ने रोक लगी दी। मौलवी माजिद हसन ने मदीना बंद होने के बाद यसरक नाम से
दिल्ली से त्रिदिवसीय उर्दू अखबार शुरू किया। लगभग एक साल तक ये अखबार चला। मदीना
पर कई बार प्रतिबंध लगा।
साप्ताहिक रहे चिंगारी में सीएमओ के खिलाफ समाचार
छापने पर संपादक मुनीश्वरानंद त्यागी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक मुकदमा चला।
सुप्रीम कोर्ट की बैंच के माफी मांगने का सुझाव देने पर भी त्यागी जी ने माफी नही
मांगी और छह माह की जेल काटना मंजूर किया।
पर्सनाल्टी अंग्रेजी साप्ताहिक के संपादक स्वामी
सच्चिदानंद को समाज विरोध तत्वों के विरूद्ध लिखने, प्रशासन
के भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ करने के कारण उनके खारी स्थित आश्रम में पांच अप्रैल 1971 को
गोली मारकर हत्या कर दी गई। स्वामी सच्चिदानन्द विनोवा भावे आंदोलन से जुड़े एक
कांतिकारी विचारक थे।पर्सनाल्टी साइक्लोटाइल मशीन पर छपता था।
बिजनौर से प्रथम हिंदी दैनिक बिजनौर टाइम्स का 14 नवंबर
1963 से
प्रकाशन प्रारंभ हुआ।भूखा मानव क्या करेगा नामक समाचार पर इस पत्र के संपादक बाबू
सिंह चौहान को 25
जुलाई 1964 मीसा
के अंतर्गत जेल जाना पड़ा।
नांगल सोती में पुलिस के विरूद्घ चल रहे आंदोलन की
खबरें छापने पर वहां के पत्रकारों से पुलिस नाराज हो गई। थाने पर दो जून 1985 को
हुए प्रदर्शन और लाठी चार्ज में पत्रकार उमाकांत और अमर उजाला के तत्कालीन
संवाददाता मुकेश सिंहा के विरूद्घ मुकदमें दर्ज हुए। कई साल तक इन्हें कोर्ट कचहरी
के चक्कर लगाने पड़े।
पुलिस के खिलाफ लिखने पर नजीबाबाद के पत्रकार
जितेंद्र जैन को पुलिस ने 20
दिसंबर 1989 को
गिरफ्तार ही नहीं किया बल्कि थाने में बुरी तरह मारा गया। किवाड़ की चौखट में देकर
हाथों की उंगलियां कुचली गईं। प्लास से उंगलियों के नाखून खींच लिए गए। जनपद के
पत्रकारों के आंदोलन के आगे पुलिस को नतमस्तक होना पड़ा और उनकी बिना शर्त रिहाई
हुई ।
पुलिस और लाटरी माफियाओं के गठजोड़ के खिलाफ लिखने
का खामियाजा नगीना के पत्रकार प्रदीप जैन का भुगतना पड़ा। 26 जून
1995 को
पुलिस ने उन्हें तमंचे के साथ पकड़ा दिखाया । सरेआम पिटाई करते नगर में जुलूस
निकाला। पत्रकारों के दबाव पर यह प्रकरण समाप्त हुआ और पत्रकार एकता के आगे पुलिस
को नगीना के सीओ और थानाध्यक्ष को भी हटाना पड़ा। प्रदीप जैन की रिहाई हुई।
धामपुर के पत्रकार सुशील अग्रवाल को भी राजनैतिक
और पुलिस उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा।धामपुर के ही पत्रकार महेंद्र सलूजा, सुशील
अग्रवाल पर कुछ लोगों पर प्राणघातक हमला किया। बसपा सरकार थी। मामला दलित का था।
दोनों पत्रकारों के विरूद्ध मुकदमें भी दर्ज हुए। पत्रकारों की एकता के आगे
प्रशासन का झुकना पड़ा। मुकदमेँ खारिज हुए। इन दोनों पत्रकारों को प्रशासन ने
सुरक्षा उपलब्ध करायी।
जिले के इस पत्रकार( अशोक मधुप) के विरूद्ध दो बार
एनएसए लगाने का प्रशासन ने प्रयास किया किंतु पत्रकारों एंव सामाजिक संगठनों के
दबाव के कारण वह कामयाब न हो सका।स्वर्ण मंदिर आपरेशन के तुरंत बाद कोड़िया छावनी
से नौ सिख सैनिक भाग गए। सैनिक भागने का कोड़िया छावनी का भेजा यह मैसेज कहीं से
(अशोक मधुप )को मिला। इनके भागने का समाचार छापने पर अमर उजाला बरेली और इस
पत्रकार (अशोक मधुप) के विरूद्घ सेना में विद्रोह फैलाने का कोटद्वार पुलिस में
मुकदमा दर्ज हुआ। बाद में जांच में समाचार सही पाए जाने पर पुलिस ने मामले को
खारिज कर दिया।समय -समय पर अनेक पत्रकार उत्पीड़न के मामले सामने आए किंतु पत्रकार
एकता के आगे सभी को मुहकी खानी पड़ी।
चौहान साहब एक माह जेल में रहे
चिंगारी सांध्य दैनिक के संपादक और स्वगीय बाबू
सिंह चौहान के पुत्र सूर्यमणि रघुवंशी बतातें हैं कि बिजनौर अनाज मंडी के एक
व्यापारी के यहां एक रिकशावाला दो किलो आटा लेने आया।दुकानदार से कहा कि उसका
परिवार तीन दिन से भूखा है,
उसके पास पैसे नहीं है। वह उधार दे दे। आटे के
पैसे के लिए वह उसके लिए रिकशा चलाएगा। दुकानदार नहीं माना। इसपर रिक्शावाला आटे
का पैकेट छीनकर भाग गया।उस समय अनाज की बहुत मारामारी थी।
व्यापारियों ने बुरी तरह जमाखोरी कर रखी थी। यह
समाचार बिजनौर टाइम्स में छपा । समाचार के नीचे दिया गया कि आखिर भूखा मानव क्या
करेगा?
इसी पर प्रशासन ने कार्रवाई की । चौहान साहब को
गिरफ्तार कर दिया। उनकी गिरफ्तारी के विरोध में जन आंदोलन हुआ। आखिर मजबूर हो , प्रशासन
को उन्हें एक माह बाद रिहा करना पड़ा।
प्रस्तुति -अशोक मधुप

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