अवसर हाथ से निकला


एक अवसर हाथ में आया। बिना बताए आया और निकल गया। आज भी इसका मलाल है। इस बात का पता न चलता तो ज्यादा ठीक रहता।

आदरणीय अतुल माहेश्वरी जी के परिवार में शादी थी। अमर उजाला बरेली के प्रांगण में कार्यक्रम का था। इसी प्रांगण मे  इनकी कोठी थी। कार्यक्रम का अब पूरा याद नहीं। शायद अतुल जी की  बहिन की शादी थी।पंजाब से बारात आई थी।

बारात अंदर आ रही थी। एक साइड में धामपुर के अमर उजाला के पत्रकार विजय शर्मा और मैं

आती बारात देख रहे थे ।इतने में सुनील छैंयाजी हमारे पास आ गए।सुनील  छैंया मुरादाबाद के रहने वाले थे। वे अमर उजाला के मुरादाबाद कार्यालय में वहां के प्रभारी उमेश कैरे जी के साथ  फोटोग्राफर थे।बाद में ये मेरठ अमर उजाला में भी लंबे समय रहे। यहां से छोड़ा तो प्रभात मेरठ के संपादक भी बने।

कद छोटा। भारी शरीर। मस्त मौला।कई बार चुनाव में बरेली अमर उजाला के लिए फोटो खींचने बिजनौर आ चुके थे।

बात चल निकली।सुनील छैंया मुझसे बोले− मैंने आपका नुकसान करा दिया।  एक अच्छा अवसर आपके हाथ से निकल गया।

उनकी बात सुन मैं  और विजय शर्मा  दोनों चौंके। बोले क्या हुआ।सुनील छैंया बोले− कुछ दिन पूर्व हरिद्वार में कुंभ था।अतुज जी ने मुझसे कहा था कि बिजनौर से अशोक मधुप को लेकर कुंभ की कवरेज को चले जाओ। दोनों कुंभ में वहीं रहो। कुंभ को कवर करो। बढिया अवसर था, पर मैंने टाल दिया।

ये सुन मैं छैयां को कुछ देर देखता  रह गया।सोचता रहा कि कुंभ कई माह चलता है। विश्व का बड़ा मेला होता है। इसका कवरेज करते। नए तजुरबे होते। नए लोंगो से परिचय होता।  आगे बढ़ने का अच्छा अवसर था। इसके बावजूद मैंने कहा − जो बीत गया,उसे याद करने से क्या लाभ। इसके बावजूद  कोफ्त बहुत हुआ।एक  बड़ा अवसर हाथ से निकल गया। पत्रकारिता में  आगे जाने का बड़ा अवसर हाथ से फिसल गया।

अवसर के हाथ से जाने का जितना मलाल रहा। उससे ज्यादा यह कि काश ये न बताता। मलाल तो न होता। जो मिलना था, मिला नहीं। उसका पता ही न चलता तो अब अफसोस तो न होता। अवसर हाथ से निकल जाने का मलाल तो न रहता।  

अशोक मधुप

 

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