रात में साढ़े पांच घंटे गंगा में नौकायन
अशोक मधुप
बिजनौर,स्वामी अच्युतानंद मिश्र और पीएसी उत्तर प्रदेश के द्वारा चलाए जा रहे निर्मल गंगा अविरल प्रवाह यात्रा के साथ सोमवार को गंंगा में बिताए आठ से ज्यादा घंटे किसी रोमांचक यात्रा से कम नहीं। रात के छह बजे से ११ बजे तक गंगा में घुंप अधेरे में नौकायन के महारथ की बदौलत रात साढ़े ग्यारह बजे ं गढ़मुक्टेश्वर के गंगा घाट पर सकुशल पंहुचना एक करिश्मा जैसा ही है। वह तो उस हालत में जब एक एक कर वोट के पेट्राल टैँक खाली होते जा रहे थे। इस यात्रा में हमारे एक साथी की तो तबियत बहुत ज्यादा खराब हो गई और उसे रास्ते के एक गंाव के एक परिवार में शरण लेनी पड़ी ।
बिजनौर गंगा बैराज से साढ़े तीन बजे हमने जब यात्रा शुरू की तो हमने सोचा भी नहीं था कि गंगा के बीच में घुप अंधेरे मेंं हमें कई घंटे ऐसे भी बिताने होंगे , जब पल पल मोटर वोट के पेट्राल के खत्म होने का भय लगा हो।
एक जगह तो रास्ता भटकने पर हम गोल गोल घूमने लगे और सब वोट आमने सामने पानी में फैल गई। मुझे याद आ गया महाभारत सीरियल का दृष्य। इसमें भी गीता उपदेश के समय भी सारे महारथी ऐसे ही खड़े दिखाये गए थे।
रात होने पर दिखाई देना बंद हो गया। दूर दूर तक जल ही जल नजर आ रहा था। गंगा के दोनों छोर पर कोई रोशनी भी तो नही चमक रही थी जिससे कुछ आइडिया लगाया जा सके । नाविक गंगा की धार के साथ साथ चल रहे थे। पानी कम होने पर मोटर बंद कर वोट खंीचकर पानी में लाने और उसे आगे बढाऩे का सिलसिला रात साढ़े ११ बजे तक तक जारी रहा जब हम मंजिल पर न पंहुच गए।
रात नौ बजे से स्टीमर के पेट्रेाल खत्म होने का भय सताने लगा । थोड़ी देर में एक मोटर वोट के तेल खत्म होने की सूचना आ गई। क्योंकि सभी वोट में लगभग बराबार तेल था तो लगने लगा के धीरे धीरे सभी इंजिन की गंूज बंद हो जाएगी और चंपू के सहारे आगे बढऩा होगा। हालत यह कि कहीं कोई रोशनी भी नजर नही आ रही। सब चारों ओर टकटकी लगाए देखते जा रहे थे। ११ बजे के आसपास गढ़मुक्टेश्वार के रेलवे पुल की लाइट दिखाई देने पर सफर का पड़ाव नजर आने लगा । आधा किलोमीटर पहले हमारे वोट का भी पेट्रोल खत्म हो गया और दूसरे वोट ने उसे खंीचकर अपने साथ ही घाट पर पंहुचाया।
मधुप
Comments
Post a Comment