नहटौर के पत्रकार एम असलम सिद्दीकी के विचार
दो दशक तक मुझे अमर
उजाला नहटौर में संवाददाता के रूप में काम करने का मौका मिला।इसका सारा श्रेय अशोक
मधुप जी जिला प्रभारी को जाता है। उनके
सानिध्य और छत्रछाया में रहकर पत्रकारिता के गुर सीखे और खबरों की दुनिया
के कटु अनुभव को आत्मसात किया।खबरों के
संकलन और लेखन
में उनकी नसीहत सदैव मार्गदर्शक बनीं।परन्तु पत्रकार साथियों के साथ समय− समय
पर होने वाली शत्रुवत हिंसक घटनांए सबको विचलित कर डालतीं। उक्त घटनाओं को ज्यादा दिनों
तक महत्ता देना हमारे अखबार का ट्रेड भी नहीं था।इन विषम परिस्थितियों में
मधुप जी अपने आला अफसर से अपने पसर्नल संबंध, सूझबूझ और अथक प्रयास
से कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेते। इससे पत्रकार साथी का मान सम्मान बच जाता।
जिले के अफसर में मधुप जी का बेहद सम्मान और रूतबा था। अधिकारी उनके मुंह से निकले शब्दों का पूरा करने में गर्व महसूस करते थे।ऐसे अनेक मसलों का लेखक स्वयं साक्षी रहा है।ऐसा ही एक वाक्या अचानक मुझे याद आ गया।
बोर्ड परीक्षाओं में नकल की खबर उस जमाने में आम थीं। मगर उस
वर्ष नहटौर के एक शिक्षक नकल की खबर न
छपने की पेशबंदी पर उतर आए। मेरे एक रिश्तेदार ने मुझे
उनकी धमकियों से अवगत कराया और मुझे इस मामले से दूर रहने की सलाह दी। इस धमकी
को मैं शांत मन से सुनकर सहन कर गया, मगर पत्रकारी जहन ने अपने आंख कान खुले रखे।
उधर शिक्षक दूसरे काँलेज के छात्रों का सैंटर अपने काँलेज में लगाकर नकल कराने के
कार्य में लग गए।बोर्ड परीक्षा से कई माह
पहले ये काम पूरा हो गया। इन खबर को अमर उजाला में न छपा देख शिक्षक ने इसे अपनी धमकियों का असर माना। उसने
जमकर अपनी पीठ थप थपाई।
बोर्ड परीक्षा की पूर्व संध्या
पर मेरे द्वारा ये सारा मामला मधुप जी संज्ञान में लाया गया। उन्होंने जिला विद्यालय निरीक्षक से इस बारे में बात की। उनका
फोन जाते ही उक्त काँलेज पर कक्ष निरीक्षकों की डयूटी रातों −रात बदल दी गई।अगले दिन सवेरे ही
सचल दल की जीप शिक्षक महोदय के घर के
सामाने जाकर खड़ी हो गई। जीप का हार्न सुन परीक्षा डयूटी के लिए जाने को तैयार
शिक्षक घर से बाहर आए।डीआईओएस का नया आदेश पाकर
उनके हाथ के तोते उड़ गए। आदेश मे अपरिहार्य कारणों से उनकी डयूटी कक्ष
निरीक्षक से हटाकर सचल दल में लगाई गई थी।
मजबूरन उन्हें सचल दल के
साथ जाना पड़ा।उसी साल नहीं ,कई साल
लगातार वह सचल दल में शामिल रहकर परीक्षा काल
में पूरे जिले में घूमते फिरे।
ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब मधुप जी अपने पत्रकार साथी
पर आने वाली आंच से पहले ही ढाल बन गए।खबरों
की दुनिया से हटकर भी उन्होंने अपने साथियों की समस्या, मुसीबत और बुरे काम में हमेशा संकट मोचक की भूमिका निभाई।
उस समय अमर उजाला में सीनियर्स को भाई साहब कहने का चलन था।, परंतु भाई साहब के
फर्ज और गरिमा को जिस अपनत्व और जिम्मेदारी के साथ अशोक मधुप जी ने निभाया,उसको
जीते जी भुलाया नहीं जा सकता।
एम असलम सिद्दीकी, नहटौर
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