Posts

जब आशा ने की भूख हड़ताल

  जब आशा ने की भूख हड़ताल प्रेस एम्प्लाइज यूनियन के साथ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने बिजनौर चीनी मिल में   चीनी मिल मजदूर यूनियन का गठन किया ।इस समय यहां कांग्रेस की यूनियन ही सक्रिय थी। हमारे यूनियन के गठित करने के साथ कांग्रेस की     यूनियन के दबाव पर चीनी मिल प्रबंधन ने हमारी यूनियन के पदाधिकारियों के वेतन रोकने शुरू कर दीजिए। उधर एक सफाई कर्मचारी आशा को बर्खास्त कर दिया। बताया जाता है   मिल में सक्रिय दूसरी यूनियन के दलित नेता आशा को रात को अपने कमरे पर बुलाते थे। आशा के उनके कमरे पर ना जाने पर   यह कारवाई की गई। हमने यूनियन की सक्रियता दिखाने के लिए मिल प्रबंधन को भूख हड़ताल का नोटिस दे दिया। यूनियन के कहने पर एक दिन आशा भूख हड़ताल पर बैठ गयी। भूख हड़ताल पर नींबू –पानी−शहद   आंदोलनकारी इस्तेमाल करते रहे हैं। पर आशा ने    कुछ भी लेने से मना कर दिया। उसने घोषणा की कि भूख हड़ताल है तो पूरी भूख हड़ताल है। इस निर्णय से जहां यूनियन के पदाधिकारी परेशानी महसूस करने लगे , वही प्रशासन भी सकते में आ गया। गर्मी काफी थी । तीसरे दिन आशा की हा...

जब बढ़ापुर के पत्रकार शराफत हुसैन का कत्ल होते बचा -

 पत्रकारिता की भूली बिसरी कथाएं -- जब बढ़ापुर के पत्रकार शराफत हुसैन का कत्ल होते बचा - बिजनौर में पुलिस अधीक्षक दिलीप त्रिवेदी का समय था।वह एक ईमानदार अधिकारी का कार्यकाल था। उनके कुछ किस्सेे आज भी याददाश्त से नहीं निकलते। जबकि अब वह सीआरपीएफ के डीजी पद से सेवानिवृत हो चुके हैं।‌त्रिवेदी जी का  आदेश था कि डांस कंपनी नहीं चलेंगी। बढ़ापुर  से उस समय 'अमर उजाला' के लिए शराफत हुसैन कार्य  कर रहे थे।  वहां डांस कंपनी चल रही थी।शराफत हुसैन द्वारा भेजी गयी रिपोर्ट  हमने फोटो के साथ छापी। दिलीप त्रिवेदी साहब ने छापा लगवाया। चलती कंपनी पकड़ ली गयी। मजबूरन  थानाध्यक्ष महोदय को उसे बंद कराना पड़ा। उनका बहुत आ‌र्थिक नुकसान हुआ।  एक ईमानदार अधिकारी की नजर में इमेज भी खराब हुई।शराफत कम्युनिष्ट पार्टी से जुड़े थे। वे पुलिस की ज्यादती समय- समय पर उठाते रहते थे।ईद से पहली रात को  मैं  आराम से सोया था। तीन बजे दरवाजा खड़कने पर आंख खुली । बढ़ापुर के दो कम्युनिष्ट साथी थे। मैँ उन्हें रात को तीन बजे देख कर चौंका ।उन्हें  बैठाया। ठंड थी। वे दोनों कंबल ल...

--प्रदीप जैन पर पुलिस का जुल्म

 पत्रकारिता की भूली बिसरी कथाएं -2 --प्रदीप जैन पर पुलिस का जुल्म  वर्ष  1995 । मैं श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के पांडिचेरी सम्मेलन में भाग लेने परिवार सहित गया था। 25 दिन के अवकाश पर निकला था । सफर में पता चला कि नगीना के हमारे साथी पत्रकार  प्रदीप जैन को पुलिस ने पकड़ लिया है। पूरे शहर में पिटाई करते हुए जुलूस भी  निकाला गया । तमंचे के साथ उनकी गिरफ्तारी दिखा दी गयी है।प्रदीप जैन नगीने की अपनी ठसक के लिए मशहूर थे ।सम्मान बहुत था।  यद‌ि कहीं  प्रशासन उन्हें ले जाता तो   एसडीएम की गाड़ी में प्रदीप जैन अकेले जाते। एसडीएम सीओ की गाड़ी में होते। नगीना में प्रदीप ने अलग तरह की पत्रकारिता पैदा की।अलग हटकर पत्रकारिता की। इंस्पेक्टर की वहां के लाटरी माफियाओं उठ-बैठ थी।ये माफिया प्रदीप जैन से नाराज थे।उन्हें सबक सिखाना चाहते थे। मैं लखनऊ पहुॅचा तो ऑफिस  के साथी शैलेंद्र का  फोन आया। अतुल जी (अमर उजाला के मालिक अतुल माहेश्वरी जी) का आदेश है कि तुंरत बिजनौर आओ। कई  दिन का अवकाश बकाया था।  परिवार का लखनऊ  घूमने का मन था। मैंने भी ढ...

जब देहरादून प्रशासन ने मुझ पर लगानी चाही एनएसए---

 पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी 4 जब देहरादून प्रशासन ने मुझ पर लगानी चाही एनएसए--- कौन? कब? , यहाँ पर काम आ जाता है, कुछ पता नहीं चलता। हम सोच भी नहीं सकते कि ऐसा भी हो सकता है। ऐसा  मेरे साथ तो कईं बार हुआ। कवि मनोज अबोध मेरे छोटे भाई की तरह से हैं। उनकी पत्रकारिता में रुचि शुरू से ही रही है। उत्तर भारत टाइम्स में काम करने के दौरान उनकी ,पोस्ट आफिस में नौकरी लग गई। सरकारी नौकरी के बाद भी उनका मन पत्रकारिता में रमा रहा। अपना शौक पूरा करने के लिए मनोज ने 'मंथन फीचर' नाम से फीवर सर्विस शुरू की। संपादक अपनी पत्नी इंदु भारद्वाज को बनाया।उसने मुझ से एक लेख मांगा। उस समय उत्तरांचल आंदोलन जोरों पर था। समय की मांग देखते हुए मैने इस आंदोलन के समर्थन में एक लेख लिख दिया। मनोज ने उसे संपादित किया। समाचार पत्रों को भेज दिया। उसने भेजी प्रति मुझे दिखाई। मैंने देखा कि उसमें एक वाक्य गलत हो गया है । यह वाक्य पहाड़ के रहने वालों के लिए भारी आपत्ति जनक था।मैंने उसे गलती से अवगत कराया। मनोज ने जब तक संशोधन भेजा तब तक  विश्व मानव सहारनपुर में लेख छप चुका था। लेख छपने के बाद पहाड़ के र...

जब मेरे विरूद्ध दर्ज हुआ सेना में विद्रोह फैलाने के प्रयास का मामला

 जब मेरे विरूद्ध दर्ज हुआ  सेना में विद्रोह फैलाने के  प्रयास का  मामला -5 -अमृतसर के स्वर्ण मंदिर पर सेना ने धावा बोलकर आतंकवादियों को मार दिया था। काफी को  गिरफ्तार कर लिया था।आपरेशन हो  चुका था। इसे लेकर देश के सिखों में बहुत गुस्सा था। शाम के समय बिजनौर पुलिस कंट्रोल से मैसेज  आया कि कोडिया छावनी से एक ट्रक में सवार होकर नौ  सिख जवान भागे हैं।  उस समय आज के 'स्वतंत्र आवाज वेब पोर्टल' के संपादक दिनेश शर्मा  यहां उत्तर भारत टाइम्स में कार्यरत थे। उन्हें यह मैसेज हाथ  लगा। उन्होंने उत्तर भारत टाइम्स के लिए  खबर की। मैंने अमर उजाला में भेज दी।उत्तर भारत टाइम्स ,बिजनौर लोकल तक  सीमित था। बाहर ज्यादा नही जाता था। उसपर कुछ फर्क  नही पड़ा।      उस समय बरेली का अमर उजाला बिजनौर आता था। यह खबर सुबह के अमर उजाला  में छप गई। इससे अगले दिन खबर छपी कि कोडिया छावनी के कमांडिग आफिसर  ने मेरे (अशोक मधुप) और अमर  उजाला के संपादक- प्रकाशक स्वामी के  विरुद्ध सेना में विद्रोह फैलाने के प्रयास का मुकद...

जब सलूजा पर हुआ हमला ।उनपर ही दर्ज हुआ हत्या का मुकदमा

 पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी -6 जब सलूजा पर हुआ हमला ।उनपर ही दर्ज हुआ हत्या का मुकदमा 11 मार्च  19 94 । बिजनौर सूचना आई कि धामपुर में अमर उजाला के पत्रकार महेंद्र सलूजा के खिलाफ  धारा 302 में मुकदमा दर्ज  हुआ है। कुछ लोगों से सलूजा को हमला कर घायल कर दिया है। मैँ  और वरिष्ठ साथी जनसत्ता  संवाददाता ओपी गुप्ता जी टैक्सी कर धामपुर पंहुच गए। यहां के के शर्मा  इंस्पैक्टर थे। के के शर्मा अलग तरह के पुलिस  अधिकारी रहे। ऐसे अधिकारी जो बड़े - बड़े अधिकारी के दबाव के आगे भी नहीं झुके। वे दंगा रोकने के स्पेशलिस्ट थे। संभल दंगों के लिए मशहूर था। वे संभल में छह  साल तैनात रहे। जबकि तीन साल से ज्यादा पुलिस अधिकारी का एक स्थान पर तैनाती का नियम नहीं था। के के शर्मा    हमारे बहुत नजदीक थे। सलूजा धामपुर ‌थाने में ही मिले। डीएम  अशोक कुमार चतुर्थ  और कप्तान निरंजन लाल भी मौजूद थे।  पता  लगा कि एक  दलित युवक को कहीं से सांप मिल गया था। युवक नसेड़ी था।वह उससे खेल रहा था। जैतरा के पास तालाब में उसे एक और सांप मिल गया। व...

एक नेक्सलाइड के साथ बाढ़ में एक दिन

 पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी -7 एक नेक्सलाइड के साथ बाढ़ में एक दिनआज देश के कई भाग में नेक्सलाइड का जोर है। सुरक्षा दलों पर ये घात लगाकर हमला करते रहें हैं। इस माहौल में सन् 84 के आसपास का एक नक्सली नेता के साथ बाढ़ में एक दिन बिताने का संस्मरण याद आ रहा है। कॉलेज के समय से मैं मार्क्सवादी कम्युनिष्ट आंदोलन से जुड़ गया था। इसी दौरान वामपंथी आंदोलन की अलग -अलग विचारधाराओं से परिचय हुआ।कुछ समय शिक्षण कर पूर्णकालिक पत्रकारिता से जुड़ गया। लगभग 45 साल पूर्व अमर उजाला से जुड़ा। 80 के आसपास मैं घर  से समाचार भेजता था। घर ही एक तरह से मेरा कार्यालय था। एक दिन कुर्ता पायजामा पहने कंधे पर थैला लटकाए एक साहब घर आए। उन्होंने अशोक कुमार के रुप में अपना परिचय दिया। अपने को सीपीआईएमएल की प्रदेश कार्यकारिणी का सदस्य बताया। सीपीआईएमएल भारत की कम्युनिष्ट पार्टी मार्क्सवादी लेलिनवादी है।इसके कई भाग हो गए। अधिकतर सत्ता प्राप्त‌ि के लिए सशस्त्र  आंदोलन के रास्ते पर निकल गए। इन्हे की नेक्सलाईड कहा गया ।   अपने घर पर एक नेक्सलाईड को देख कर अचकचा गया। लगा कि इसके बैग में हैंड ग्रे...