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Showing posts from August, 2021

जब आशा ने की भूख हड़ताल

  जब आशा ने की भूख हड़ताल प्रेस एम्प्लाइज यूनियन के साथ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने बिजनौर चीनी मिल में   चीनी मिल मजदूर यूनियन का गठन किया ।इस समय यहां कांग्रेस की यूनियन ही सक्रिय थी। हमारे यूनियन के गठित करने के साथ कांग्रेस की     यूनियन के दबाव पर चीनी मिल प्रबंधन ने हमारी यूनियन के पदाधिकारियों के वेतन रोकने शुरू कर दीजिए। उधर एक सफाई कर्मचारी आशा को बर्खास्त कर दिया। बताया जाता है   मिल में सक्रिय दूसरी यूनियन के दलित नेता आशा को रात को अपने कमरे पर बुलाते थे। आशा के उनके कमरे पर ना जाने पर   यह कारवाई की गई। हमने यूनियन की सक्रियता दिखाने के लिए मिल प्रबंधन को भूख हड़ताल का नोटिस दे दिया। यूनियन के कहने पर एक दिन आशा भूख हड़ताल पर बैठ गयी। भूख हड़ताल पर नींबू –पानी−शहद   आंदोलनकारी इस्तेमाल करते रहे हैं। पर आशा ने    कुछ भी लेने से मना कर दिया। उसने घोषणा की कि भूख हड़ताल है तो पूरी भूख हड़ताल है। इस निर्णय से जहां यूनियन के पदाधिकारी परेशानी महसूस करने लगे , वही प्रशासन भी सकते में आ गया। गर्मी काफी थी । तीसरे दिन आशा की हा...

जब बढ़ापुर के पत्रकार शराफत हुसैन का कत्ल होते बचा -

 पत्रकारिता की भूली बिसरी कथाएं -- जब बढ़ापुर के पत्रकार शराफत हुसैन का कत्ल होते बचा - बिजनौर में पुलिस अधीक्षक दिलीप त्रिवेदी का समय था।वह एक ईमानदार अधिकारी का कार्यकाल था। उनके कुछ किस्सेे आज भी याददाश्त से नहीं निकलते। जबकि अब वह सीआरपीएफ के डीजी पद से सेवानिवृत हो चुके हैं।‌त्रिवेदी जी का  आदेश था कि डांस कंपनी नहीं चलेंगी। बढ़ापुर  से उस समय 'अमर उजाला' के लिए शराफत हुसैन कार्य  कर रहे थे।  वहां डांस कंपनी चल रही थी।शराफत हुसैन द्वारा भेजी गयी रिपोर्ट  हमने फोटो के साथ छापी। दिलीप त्रिवेदी साहब ने छापा लगवाया। चलती कंपनी पकड़ ली गयी। मजबूरन  थानाध्यक्ष महोदय को उसे बंद कराना पड़ा। उनका बहुत आ‌र्थिक नुकसान हुआ।  एक ईमानदार अधिकारी की नजर में इमेज भी खराब हुई।शराफत कम्युनिष्ट पार्टी से जुड़े थे। वे पुलिस की ज्यादती समय- समय पर उठाते रहते थे।ईद से पहली रात को  मैं  आराम से सोया था। तीन बजे दरवाजा खड़कने पर आंख खुली । बढ़ापुर के दो कम्युनिष्ट साथी थे। मैँ उन्हें रात को तीन बजे देख कर चौंका ।उन्हें  बैठाया। ठंड थी। वे दोनों कंबल ल...

--प्रदीप जैन पर पुलिस का जुल्म

 पत्रकारिता की भूली बिसरी कथाएं -2 --प्रदीप जैन पर पुलिस का जुल्म  वर्ष  1995 । मैं श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के पांडिचेरी सम्मेलन में भाग लेने परिवार सहित गया था। 25 दिन के अवकाश पर निकला था । सफर में पता चला कि नगीना के हमारे साथी पत्रकार  प्रदीप जैन को पुलिस ने पकड़ लिया है। पूरे शहर में पिटाई करते हुए जुलूस भी  निकाला गया । तमंचे के साथ उनकी गिरफ्तारी दिखा दी गयी है।प्रदीप जैन नगीने की अपनी ठसक के लिए मशहूर थे ।सम्मान बहुत था।  यद‌ि कहीं  प्रशासन उन्हें ले जाता तो   एसडीएम की गाड़ी में प्रदीप जैन अकेले जाते। एसडीएम सीओ की गाड़ी में होते। नगीना में प्रदीप ने अलग तरह की पत्रकारिता पैदा की।अलग हटकर पत्रकारिता की। इंस्पेक्टर की वहां के लाटरी माफियाओं उठ-बैठ थी।ये माफिया प्रदीप जैन से नाराज थे।उन्हें सबक सिखाना चाहते थे। मैं लखनऊ पहुॅचा तो ऑफिस  के साथी शैलेंद्र का  फोन आया। अतुल जी (अमर उजाला के मालिक अतुल माहेश्वरी जी) का आदेश है कि तुंरत बिजनौर आओ। कई  दिन का अवकाश बकाया था।  परिवार का लखनऊ  घूमने का मन था। मैंने भी ढ...

जब देहरादून प्रशासन ने मुझ पर लगानी चाही एनएसए---

 पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी 4 जब देहरादून प्रशासन ने मुझ पर लगानी चाही एनएसए--- कौन? कब? , यहाँ पर काम आ जाता है, कुछ पता नहीं चलता। हम सोच भी नहीं सकते कि ऐसा भी हो सकता है। ऐसा  मेरे साथ तो कईं बार हुआ। कवि मनोज अबोध मेरे छोटे भाई की तरह से हैं। उनकी पत्रकारिता में रुचि शुरू से ही रही है। उत्तर भारत टाइम्स में काम करने के दौरान उनकी ,पोस्ट आफिस में नौकरी लग गई। सरकारी नौकरी के बाद भी उनका मन पत्रकारिता में रमा रहा। अपना शौक पूरा करने के लिए मनोज ने 'मंथन फीचर' नाम से फीवर सर्विस शुरू की। संपादक अपनी पत्नी इंदु भारद्वाज को बनाया।उसने मुझ से एक लेख मांगा। उस समय उत्तरांचल आंदोलन जोरों पर था। समय की मांग देखते हुए मैने इस आंदोलन के समर्थन में एक लेख लिख दिया। मनोज ने उसे संपादित किया। समाचार पत्रों को भेज दिया। उसने भेजी प्रति मुझे दिखाई। मैंने देखा कि उसमें एक वाक्य गलत हो गया है । यह वाक्य पहाड़ के रहने वालों के लिए भारी आपत्ति जनक था।मैंने उसे गलती से अवगत कराया। मनोज ने जब तक संशोधन भेजा तब तक  विश्व मानव सहारनपुर में लेख छप चुका था। लेख छपने के बाद पहाड़ के र...

जब मेरे विरूद्ध दर्ज हुआ सेना में विद्रोह फैलाने के प्रयास का मामला

 जब मेरे विरूद्ध दर्ज हुआ  सेना में विद्रोह फैलाने के  प्रयास का  मामला -5 -अमृतसर के स्वर्ण मंदिर पर सेना ने धावा बोलकर आतंकवादियों को मार दिया था। काफी को  गिरफ्तार कर लिया था।आपरेशन हो  चुका था। इसे लेकर देश के सिखों में बहुत गुस्सा था। शाम के समय बिजनौर पुलिस कंट्रोल से मैसेज  आया कि कोडिया छावनी से एक ट्रक में सवार होकर नौ  सिख जवान भागे हैं।  उस समय आज के 'स्वतंत्र आवाज वेब पोर्टल' के संपादक दिनेश शर्मा  यहां उत्तर भारत टाइम्स में कार्यरत थे। उन्हें यह मैसेज हाथ  लगा। उन्होंने उत्तर भारत टाइम्स के लिए  खबर की। मैंने अमर उजाला में भेज दी।उत्तर भारत टाइम्स ,बिजनौर लोकल तक  सीमित था। बाहर ज्यादा नही जाता था। उसपर कुछ फर्क  नही पड़ा।      उस समय बरेली का अमर उजाला बिजनौर आता था। यह खबर सुबह के अमर उजाला  में छप गई। इससे अगले दिन खबर छपी कि कोडिया छावनी के कमांडिग आफिसर  ने मेरे (अशोक मधुप) और अमर  उजाला के संपादक- प्रकाशक स्वामी के  विरुद्ध सेना में विद्रोह फैलाने के प्रयास का मुकद...

जब सलूजा पर हुआ हमला ।उनपर ही दर्ज हुआ हत्या का मुकदमा

 पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी -6 जब सलूजा पर हुआ हमला ।उनपर ही दर्ज हुआ हत्या का मुकदमा 11 मार्च  19 94 । बिजनौर सूचना आई कि धामपुर में अमर उजाला के पत्रकार महेंद्र सलूजा के खिलाफ  धारा 302 में मुकदमा दर्ज  हुआ है। कुछ लोगों से सलूजा को हमला कर घायल कर दिया है। मैँ  और वरिष्ठ साथी जनसत्ता  संवाददाता ओपी गुप्ता जी टैक्सी कर धामपुर पंहुच गए। यहां के के शर्मा  इंस्पैक्टर थे। के के शर्मा अलग तरह के पुलिस  अधिकारी रहे। ऐसे अधिकारी जो बड़े - बड़े अधिकारी के दबाव के आगे भी नहीं झुके। वे दंगा रोकने के स्पेशलिस्ट थे। संभल दंगों के लिए मशहूर था। वे संभल में छह  साल तैनात रहे। जबकि तीन साल से ज्यादा पुलिस अधिकारी का एक स्थान पर तैनाती का नियम नहीं था। के के शर्मा    हमारे बहुत नजदीक थे। सलूजा धामपुर ‌थाने में ही मिले। डीएम  अशोक कुमार चतुर्थ  और कप्तान निरंजन लाल भी मौजूद थे।  पता  लगा कि एक  दलित युवक को कहीं से सांप मिल गया था। युवक नसेड़ी था।वह उससे खेल रहा था। जैतरा के पास तालाब में उसे एक और सांप मिल गया। व...

एक नेक्सलाइड के साथ बाढ़ में एक दिन

 पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी -7 एक नेक्सलाइड के साथ बाढ़ में एक दिनआज देश के कई भाग में नेक्सलाइड का जोर है। सुरक्षा दलों पर ये घात लगाकर हमला करते रहें हैं। इस माहौल में सन् 84 के आसपास का एक नक्सली नेता के साथ बाढ़ में एक दिन बिताने का संस्मरण याद आ रहा है। कॉलेज के समय से मैं मार्क्सवादी कम्युनिष्ट आंदोलन से जुड़ गया था। इसी दौरान वामपंथी आंदोलन की अलग -अलग विचारधाराओं से परिचय हुआ।कुछ समय शिक्षण कर पूर्णकालिक पत्रकारिता से जुड़ गया। लगभग 45 साल पूर्व अमर उजाला से जुड़ा। 80 के आसपास मैं घर  से समाचार भेजता था। घर ही एक तरह से मेरा कार्यालय था। एक दिन कुर्ता पायजामा पहने कंधे पर थैला लटकाए एक साहब घर आए। उन्होंने अशोक कुमार के रुप में अपना परिचय दिया। अपने को सीपीआईएमएल की प्रदेश कार्यकारिणी का सदस्य बताया। सीपीआईएमएल भारत की कम्युनिष्ट पार्टी मार्क्सवादी लेलिनवादी है।इसके कई भाग हो गए। अधिकतर सत्ता प्राप्त‌ि के लिए सशस्त्र  आंदोलन के रास्ते पर निकल गए। इन्हे की नेक्सलाईड कहा गया ।   अपने घर पर एक नेक्सलाईड को देख कर अचकचा गया। लगा कि इसके बैग में हैंड ग्रे...

किरतपुर के व्यापारी का अपहरण

 यादें पत्रकारिता  लगभग 22 साल पुरानी बात होगी रात के लगभग 12:30 बजे फोन की घंटी बजी। फोन  पत्रकार साथी ज्योति लाल का था ।उन्होंने बताया किरतपुर के दो व्यापारी  का अपहरण हो गया है  ।  किरतपुर का रहने उत्तरांचल पुलिस का  निलंबित सिपाही इन दोनों को कार से लेकर जमींन दिखाने उत्तरांचल लेकर जा रहा था। काशीपुर बॉर्डर के पेड़ निलंबित सिपाही राणा ने इनसे कहा। तुम्हारा अपहरण हो गया है।घर बतादो रुपये का इंतजाम कर लें।कितने रुपये की बात थी ,ये अब याद नहीं।  उन्होंने अपने घर बता दिया था।निलंबित सिपाही राणा कई गम्भीर अपराधों में उत्तरांचल में वांछित था। राणा का नम्बर सर्विलांस पर लगा था।वह मोबाइल के नम्बर बदलता था।मोबाइल नही।इसीलिए पुलिस को उसकी लोकेशन मिल रही थी। काशीपुर बार्डर पर काफी तादाद में उत्तराचल पुलिस उसे घेरने को लगी थी। बॉर्डर पर जाते ही पुलिस ने कार घेरली दोनों व्यापारियों को मुक्त करा लिया सिपाही राणा ने भागने का प्रयास किया।वह एनकाउंटर में मारा गया। घटना चक्र काशीपुर की थी पुलिस कुछ कंफर्म नही कर रही थी।।। मैंने किरतपुर के रिपोर्टर श्रीविश्वास गि...

कालागढ़ थानाध्यक्ष सुरेंद्र सिंह मलिक और कालागढ में सेना का आपरेशन

 पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी -8 कालागढ़ थानाध्यक्ष सुरेंद्र सिंह मलिक और कालागढ में सेना का आपरेशन                       1984 के आसपास कालागढ़ के थानाध्यक्ष सुरेंद्र सिंह   मलिक होते थे। वे बिजनौर आते तो मिलते जरुर। हर बार अनुरोध होता - कालागढ़ घूमने आओ। तब कालागढ़ बिजनौर में होता था।मैं  कहता -जब आना होगा तब आपको फुरसत नहीं होगी। समय  निकलता रहा। 1984 का मध्यावधि चुनाव  हो चुका था।  चुनाव में कांग्रेस की मीरा कुमार विजयीं हुईं । उन्होंने राम विलास पासवान को हराया था। तीसरे नंबर पर मायावती रही थीं। ये मायावती का पहला चुनाव था।र‌िजल्ट घोषणा के तीन -चार  दिन बाद रविवार पड़ा।  उस सयम रविवार को रामायण सीरियल आता था। हमारे घर टीवी नहीं था।पड़ौस में एक परिवार में मैं  रामायण देख रहा था। पत्नी निर्मल ने आकर बताया। मुरादाबाद से कैरे साहब का फोन है। उमेश कैरे  मुरादाबाद के प्रत‌िष्ठित  पत्रकार हैं। पीटीआई  समेत अंग्रेजी के कई  अखबार के   वे रिपोर्टर हैं। ...

जब मेरा अपहरण हुआ

 पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी  -9 जब मेरा अपहरण  हुआ  अमर उजाला में सिख  आतंकवादियों की आपसी टकराव की खबर छपने से पुलिस  अधिकारी मुझसे नाराज थे। उस समय  नेता जी मेरे नजदीक थे। उनके कहने पर बिजनौर पुलिस क्षेत्राधिकारी बिजनोर के खिलाफ  मैने दो-तीन खबर छापी। शायद सीओ साहब का  नाम  दिनेश शर्मा था। पहले छोटी - छोटी खबर पर बहुत असर होता था। सीओ साहब का तबादला हो गया।  उनकी जगह बरेली से केके त्रिपाठी आए। मैं  उस उत्तर भारत टाइम्स में बैठता  था। वहां काम करने के दौरान अमर उजाला को खबर भी भेजता था। रात लगभग दस बजे के के ‌त्रिपाठी जी का फोन आया। आदरणीय अतुल जी का संदर्भ दिया। कहा मेरे मित्र हैं। मैं  बरेली से आया हूं। अभी ज्वाइन किया है। थाने में बैठा हूं ।मिल जाओ। मैं और पारेश कश्यप दोनों थाने पहुंच गए। पारेश कश्यप उत्तर भारत टाइम्स के मालिक और राजेंद्र पाल सिह कश्यप के  बेटे थे।त्रिपाठी थाने के बीच प्रांगण में कुर्सी डाले बैठे थे। हम और पारेश उनके मिले। उन्होंने बैठा लिया। चाय मंगा ली। हम चाय पी रहे थे। कि हल्के च...

मैंने खबर रोकने के लिए रिश्वत नहीं ली

 पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी  दस मैंने खबर रोकने के लिए रिश्वत नहीं ली  1990  गल्फ  वॉर। इराक की सद्दाम  सरकार के खिलाफ  34 राष्ट्र  युद्ध  कर रहे थे। अमेरिका इनका अगुआ था।ये ल़ड़ाई  लगभग  सात माह चली।   पूरी दुनिया को तेल खाड़ी के देश आपूर्ति  करते हैं। युद्ध होने के कारण तेल की  आपूर्ति  रुक गई।इस लड़ाई में दुनिया में तेल का संकट पैदा हो गया। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा।सरकार  के आदेश पर देश भर में पेट्रोल और डीजल के परमिट जारी हुए।अपने जनपद में भी ऐसा ही हुआ। नगर क्षेत्र में एसडीएम  और देहात में बीडीओ को पेट्रोल डीजल के परमिट देने के  अधिकार  दिये गए।  व्यवसायिक वाहनों के लिए डीजल की मासिक सीमा निर्धारित कर दी गई। कोतवाली देहात में जबर सिंह बीडीओ हुआ करते थे।उन्होंने विश्वास में कोरे परमिट पर अपने हस्ताक्षर कर स्टाफ  को दे दिए। ताकि उनकी अनुपस्थिति में भी किसी वाहन चालक को परेशानी न हो। उनके स्टॉफ  ने व्यवसायिक वाहनों के लिए जारी होने वाले ये खाली हस्ताक्षर किये मुहर ...

पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी -12

  पत्रकारिता जीवन की भूली बिसरी कहानी -12 1984 का मध्यावधि चुनाव होना था। इस चुनाव में कांग्रेस की प्रत्याशी मीरा कुमार ,दमकीपा  से राम विलास पासवान और बसपा से मायावती चुनाव लड़ रहीं थीं । चुनाव की खास बात यह थी कि रामविलास पासवान की बड़ी हवा थी। पूरे क्षेत्र में धूम थी। वे स़ड़क पर दो मिनट को खड़े हो जाते  तो भीड़ एकत्र हो जाती।उनकी शाम को  पहली सभा होती थी और उसमें ही  घोषणा होती कि अगली सभा कहां होगी। इस सभा की भीड़  नारे लगाती हुई  उनकी गाड़ी के पीछे -पीछे जाती।  हालत यह रहती कि पहली सभा की भीड़  रात 11 बजे की अंतिम सभा तक साथ -साथ रहती।   रामविलास पासवान का चुनाव लड़ाने के लिए  बिजनौर में शरद यादव और मुलायम सिंह आए थे। ये दोनों नेता पूरे  चुनाव में बिजनौर ही रहे।रामविलास पासवान का कार्यालय रेलवे स्टेशन के सामने बना जानी भाई का होटल था। आज इसमें ऊपर के हिस्से में लोगों  के आवास  हैं । नीचे दुकान हैं। उस समय होटल के नीचे सड़क के किनारे पर  एक टूटा खटोला पड़ा रहता था। मुलायम सिंह प्रायः इस पर लेटे रहते थे।...

ट्रेन हादसे की कवरेज और मैं

 ट्रेन हादसे की कवरेज और  मैं बात बहुत पुरानी हो गई।उस समय परमेश्वरन अय्यर बिजनौर के डीएम थे । लगभग 12 बजे  उनकी प्रेस कांफ्रेस खत्म करके में  उनके कक्ष से  बाहर निकला । डीएम के स्टेनों ने बुलाकर कहा -आपका फोन है। मेरठ कार्यालय से श्री राजेंद्र  त्रिपाठी का फोन था । बताया कि चंदक से ह‌रिद्वार जा रही  ट्रेन के डिब्बे में बम फटा है। श्री  राजेंद्र त्रिपाठी आज वाराणसी  संस्करण के संपादक है। उस समय मोबाइल नहींं होते थे।संभवतः श्री त्रिपाठी ने कार्यालय फोन किया होगा। वहां से यह बताने पर कि डीएम के कार्यालय में हैं, उन्होंने यहां का नंबर मिला लिया। मैने बिजनौर से एक जीप  किराए पर ली। ट्रेन के पीछे चल दिए। आज के आजतक ओर आईवीएन 7 के जिलाा प्रभारी संजीब शर्मा उस समय मेरे साथ  काम करते थे। मैने उन्हें भी साथ ले लिया।। हरिद्वार पंहुचे  तो पता लगा कि ट्रेन ज्वालापुर स्टेशन पर खड़ी है। लगभग अस्सी किलो मीटर ट्रेन का पीछा  किया। हम ज्वालापुर पंहुच गए। घटना की जानकारी की। फोटो लिए। वहां तब तक कोई  रिपोर्टर नहीं पंहुचा था। तभी डीआरएम ...